गुप्तकालीन संगीत कला - Gupta musical art

 गुप्तकालीन संगीत कला - Gupta musical art


गायन, वादन और नृत्य, संगीत के तीन मुख्य अंग कहे गये हैं और उनका पारस्परिक घनिष्ठ संबंध है। गायन और वादन स्वतंत्र भी होते हैं। पर उन दोनों का संयोग ही विशेष महत्त्व रखता है। इसी प्रकार नृत्य के साथ भी गायन और वादन का घनिष्ठ संबंध है। गुप्तकालीन साहित्य में हँसी-खुशी, आमोद-प्रमोद की जहाँ भी चर्चा हुई है वहाँ संगीत के इन सभी रूपों का उन्मुक्त रूप से उल्लेख हुआ है। तत्कालीन साहित्य के देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि तत्कालीन नागरिक जीवन संगीत से आप्लावित था। संगीत चरम सुख का प्रतीक था और वह लोकरंजन का प्रमुख साधन था। स्त्री-पुरुष सभी संगीत के प्रेमी थे और उसमें समान रूप से रस लेते थे। राज घरानों में दिन-रात निरंतर संगीत होता रहता था।

नगर संगीत-ध्वनि से सदा प्रतिध्वनित होते रहते थे। नगरों में संगीत-शिक्षा के निमित्त संगीत-शालाएँ थीं, जहाँ संगीताचार्य लड़के-लड़कियों को संगीत-कला की शिक्षा दिया करते थे। राजमहलों में इसकी स्वतंत्र व्यवस्था होती थी।


गुप्तकालीन गायन कला


गुप्तकालीन गायन के रूप-स्वरूप पर प्रकाश डालनेवाला कोई सिद्धांत ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं है, पर कालिदास के उल्लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय तक गायन ने एक व्यवस्थित सिद्धांत का रूप धारण कर लिया था।

मालविकाग्निमित्र के आरंभिक दो अंकों के कथनोपकथनों में संगीत संबंधी प्रविधि की पर्याप्त चर्चा है। उनसे ज्ञात होता है कि संगीतशास्त्री कतिपय सिद्धांतों का अनुसरण करते, उनको प्रमाण मानते तथा उनके अनुसार अपने गायन का प्रदर्शन करते थे। कालिदास ने अपनी रचनाओं में ताल, लय, स्वर, उपगान, मूच्छना आदि अनेक पारिभाषिक शब्दों का उल्लेख किया है। कई स्थलों पर राग की भी चर्चा है और संगीत के प्रसंग में उन्होंने सारंगु ललित आदि रागों के नाम भी दिये हैं। यही नहीं, उन्होंने बेसुरे राग को ताइन के समान बताया है। राग से पूर्व, वर्ण-परिचय, स्वरालाप,

तत्पश्चात् गायन की विधि की भी चर्चा की है। इनसे जहाँ तत्कालीन संगीत के प्राविधिक रूप का कुछ परिचय मिलता है, वहीं यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि कालिदास ने जहाँ भी गीतों का उल्लेख किया है, वहाँ उन्होंने प्रायः सभी गीत प्राकृत में दिये हैं। इनसे ऐसा अनुमान होता है कि प्राविधिक संगीत के साथ-साथ लोक-संगीत का भी व्यापक प्रचार था अथवा कदाचित् दोनों में कोई विशेष अंतर न था। 3.3.6 गुप्तकालीन वादन कला


गायन के साथ-साथ वादन का उल्लेख प्रायः गुप्तकालीन साहित्य में मिलता है। कदाचित् उन दिनों तंत्रगत वाद्यों में वीणा का ही प्रमुख रूप से प्रयोग होता था। कालिदास ने उसी का उल्लेख विशेष किया है। लोग प्रायः वीणा के साथ गायन करते थे। समुद्रगुप्त और कुमारगुप्त प्रथम दोनों का ही अन उनके स्वयं के सोने के सिक्कों पर वीणावादक के रूप में हुआ है। वीणा के अतिरिक्त वल्लकी, परिवादिनी,

तंत्री आदि तंत्रीगत वाद्यों का भी उल्लेख तत्कालीन साहित्य में मिलता है। संभवतः वे वीणा के ही रूप थे। तत्कालीन साहित्य में सुषिर वाद्यों के रूप में वेणु (बाँसुरी), कीचक, शंख और तूर्य का उल्लेख हुआ है। शंख और तुर्य मांगलिक अवसरों तथा रण के समय काम आते थे। संगीतसाधन के रूप में कदाचित् उनका प्रयोग नहीं होता था। लोक-रंजन के रूप में वेणु का ही उपयोग होता था। चर्मवाद्यों में मुरज, पुष्कर, मृदंग, दुदुभि, मर्दल आदि का उल्लेख मिलता है। इनमें परस्पर किस प्रकार का भेद था, यह किसी प्रकार ज्ञात नहीं है। भूमरा के शिव मंदिर के फलकों पर शिव के गण अनेक प्रकार के वाद्य बजाते अंकित किये गये हैं। अजंता की 17वीं गुफा में भी अनेक वाद्य यंत्रों का अंकन हुआ है जिनसे तत्कालीन वाद्य रूपों का बहुत कुछ अनुमान किया जा सकता है।