गुप्तकालीन चित्रकला - Gupta painting

 गुप्तकालीन चित्रकला - Gupta painting


चित्र आदिम काल से ही मानव की आंतरिक अभिव्यक्ति का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम रहा है। अतः लोगों ने संसार में सर्वत्र चित्रकला के विकास की खोज प्रागैतिहासिक गुहा चित्रों में की है और चित्रकला के विकासक्रम को व्यवस्थित रूप दिया है। किंतु इस प्रकार की भारतीय चित्रकला की ऐतिहासिक कड़ियों को अभी व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाना संभव नहीं हो पाया है।


भारतीय चित्रकला के इतिहास की जो व्यवस्थित कड़ी आज हमें उपलब्ध है, वह अजंता के लयणों में प्राप्त होती है। वहाँ के कुछ लयणों में ऐसे भित्ति चित्रों के अवशेष मिले हैं,

जिनका समय ईसा- पूर्व की दूसरी शती के आस-पास अनुमान किया जाता है और वे चित्रकला के अत्यंत विकसित परंपरा के प्रतीक हैं। यह चित्रकला सहसा प्रादुर्भूत न हुई होगी, उस परंपरा तक पहुँचने के लिए निस्संदेह कलाकारों ने बहुत बड़ी साधना की होगी और उस साधना में अवश्य ही शताब्दियाँ लगी होंगी, पर उनकी आज कोई जानकारी नहीं है।


इन पुरानी बातों को छोड़ दिया जाय और केवल गुप्तकालीन चित्रों की ही चर्चा की जाय तो सहज रूप से यह कहा जा सकता है

कि उसकी चित्रकला की परंपरा की कड़ी उससे लगभग छः सौ बरस पहले से मिलने लगी थी। गुप्त काल में चित्रकला ने पूर्ण विकसित वैभव प्राप्त कर लिया था। तत्कालीन तकनीकी और ललित, दोनों प्रकार के साहित्य से ज्ञात होता है कि उन दिनों लोग चित्रकला को केवल शौकिया ही नहीं सीखते थे, वरन् नागरिक समाज के उच्च वर्ग और राजमहलों की स्त्रियों और राजकुमारियों के बीच चित्रकला का ज्ञान एक अनिवार्य सामाजिक गुण माना जाता था और सामान्य जन में भी उसका प्रचार-प्रसार काफी था। कामसूत्र में चित्रकला का उल्लेख न केवल नागरक कला के रूप में हुआ है, वरन् उसमें उसके उपकरण, यथारंग, ब्रश, फलक आदि की भी चर्चा है और उन्हें नागरक के निजी कक्ष में होना आवश्यक कहा है। राजमहलों और धनिक घरों में चित्रशाला अथवा चित्रसद्य होने का उल्लेख साहित्य में यत्र-तत्र मिलता है। वह लोगों के चित्रकला के प्रति रुचि का परिचायक है।


यही नहीं, गुप्तकालिक साहित्य से यह भी ज्ञात होता है कि चित्रकला का व्यवहारिक रूप का प्रचुर विकास तो हुआ ही था, उसके सिद्धांत और तकनीक पर भी गंभीरता से सोचा जा चुका था और चित्रकला संबंधी सिद्धांत निर्धारित हो चुके थे। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में चित्रकला संबंधी पूरा एक अध्याय है। उसमें उसके एक अध्याय में सिद्धांतों पर विचार किया गया है। उसमें चित्र के सत्य (यथावत छवि), वैनिक (छंदयुक्त), नागर (संस्कृत) और मिश्र चार भेद कहे गये हैं। साथ ही वर्णरेखा, वर्ण-पूजन, अवयवों के परिमाण, अंगों के गठन, तनुता स्थूलता, भावना, चेतना आदि की भी विशद् रूप से चर्चा की गयी है। वात्स्यायन के कामसूत्र पर यशोधर ने जो टीका की है, उसमें संभवत: विष्णुधर्मोत्तर के कथन के आधार पर ही चित्रकला के छः अंगो रूपभेद (विधा अथवा प्रकार), प्रमाण ( उचित अनुपात), लावण्य-योजन (सौंदर्य निरूपण), सादृश्य (तद्रूपता) और वर्णिकभंग (रंग-व्यवस्था) का उल्लेख हुआ है।