गुप्तकालीन धर्म - Gupta religion

गुप्तकालीन धर्म - Gupta religion


ब्राह्मण धर्म और संस्कृति का नवोत्थान


गुप्तकाल का स्वर्ण युग, ब्राह्मण नवाभ्युत्थान या पुनर्जागरण का काल नहीं, परंतु ब्राह्मणों का पूर्ण विकसित परिप्लावित दैदीप्यमान युग था सर्व विदित है कि भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को स्वर्ण युग कहा गया है। यह काल नवोत्थान काल या पुनर्जागरण युग के नाम से भी प्रख्यात है और यूरोपीय लेखकों ने यूनान देश के इतिहास में पेरीक्लीज के युग से इसकी तुलना की है, क्योंकि इस युग में ही राष्ट्रीय अंतरात्मा को जिसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति राष्ट्रीय जीवन के राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, आर्थिक, कला आदि प्रत्येक क्षेत्र में हुई, अत्यधिक प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। जैसा ऊपर कहा गया है, राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय अंतरात्मा हिंदू शासन का पुनर्जागरण कर प्रस्फुटित हुई थी।

शक क्षत्रय, कुषाण और यूनानी जैसे विदेशी शासकों की राजनीतिक प्रभुता और प्रधानता नष्ट कर गुप्त सम्राटों की छत्रछाया में राष्ट्रीय स्वतंत्रता दृढ़तापूर्वक स्थापित कर दी गयी व हिंदू साम्राज्यवाद की नींव डाली गयी। राष्ट्रीय प्रवृत्ति का यह एक अंग था। इसका दूसरा महत्वशाली स्वरूप ब्राह्मण संस्कृति और धर्म का पुनरुद्धार था।


 धार्मिक सहिष्णुता का वातावरण


गुप्त सम्राट वैष्णव होने पर भी अंय धर्मों के प्रति अत्यधिक उदार और सहिष्णु थे। उनके 'शासनकाल में विभिन्न मतावलंबियों को अपने-अपने धार्मिक विश्वास और पूजा-उपासना तथा अनुष्ठान आदि करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी।

धार्मिक विषयों में गुप्त सम्राट अत्यंत उदार थे। समुद्र गुप्त ने वैष्णव होने पर भी राजकुमारों की शिक्षा के लिए बौद्ध आचार्य बसुबंधु को नियुक्त किया था। गुप्त सम्राट नरसिंहगुप्त बुधगुप्त और तथागत बौद्ध थे सम्राट कुमार गुप्त शैव था उसका ज्येष्ठ पुत्र बौद्ध था और छोटा पुत्र स्कंदगुप्त वैष्णव था। धर्मों में विभिन्नता होने पर भी गुप्त सम्राट शैव, वैष्णव और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को राजसेवा और शासन में उदारतापूर्वक बिना किसी धार्मिक भेदभाव और विद्वेष के नियुक्त करते थे। शैव मतावलंबी मंत्री हरिषेण साव और वीरसेन साव तथा बौद्ध वसुबंधु की नियुक्ति इसके उदाहरण हैं। गुप्त सम्राट बौद्ध मठों, बिहारों, जैन मंदिरों, ब्राह्मणों तथा हिंदू देव स्थानों की, विभिन्न संप्रदायों को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के उदारता से दान देते थे। नालंदा के प्रसिद्ध बौद्ध बिहार का शिलान्यास और उसके वैभव का सूत्रपात वैष्णव गुप्त सम्राटों के दान से ही हुआ था।