गुप्तकालीन मूर्तिकला - Gupta sculpture

 गुप्तकालीन मूर्तिकला - Gupta sculpture


यह एक निर्विवाद तथ्य है कि गुप्त साम्राज्य के विकास के आरंभिक दिनों में मथुरा मूर्ति-कला का प्रमुख केंद्र था। यह भी एक मान्य तथ्य है कि कुमारगुप्त प्रथम के शासन काल में बनी बुद्ध की मूर्ति, जो मानकुवर (जिला इलाहाबाद) से प्राप्त हुई है, मथुरा से निर्यात की हुई है। उसका मूर्तन कर्रा के लाल चित्तीदार पत्थर में हुआ है। यह मथुरा से नियतित अंयतम ज्ञात मूर्ति है। इस मूर्ति को बुद्ध की मूर्ति केवल इसलिए कहा जाता है कि उस पर अंकित अभिलेख में उसे इसी नाम से अभिहित किया गया है, अयथा उसमें वे दोनों ही विशेषताएँ पायी जाती हैं, जो कुषाणकालीन कही जानेवाली मथुरा की जिन (तीर्थंकर) की मूर्तियों में पायी जाती हैं अर्थात् उसका सिर कपर्दिन के समान मुंडित है और हाथ अभय मुद्रा में है।

यही नहीं, इस मूर्ति का अनुपात, वक्ष का गढ़न, मुंह के भाव, आदि भी मथुरा की कुषाण मूर्तियों से किसी प्रकार भिन्न नहीं है, उसके आसन के नीचे के सिंह चक्र आदि भी उसके किसी भिन्न पहचान में सहायक नहीं होते। निष्कर्ष यह कि मानकुवर से प्राप्त यह मूर्ति इस बात का उदाहरण अथवा प्रमाण है कि मथुरा के मूर्तिकार, कम से कम इस मूर्ति के निर्माणकाल (पाँचवीं शती ई. के मध्य) तक कुषाणकालीन मूर्तन परंपरा का पालन कर रहे थे और वे किसी अंय मूर्तन शैली से परिचित न थे।


इस प्रकार मथुरा की गुप्तकालीन मूर्तियों की स्पष्ट दो धाराएँ हैं।

पूर्ववर्ती गुप्तकालीन मूर्तियाँ (कुमारगुप्त प्रथम के काल और उससे पूर्व की मूर्तियाँ) कुषाण शैली की अनुगामिनी हैं। इन्हें आभिलेखिक प्रमाण के अभाव में कुषाण काल की मूर्तियों से किसी प्रकार अलग नहीं किया जा सका है। इसी प्रकार उत्तरवर्ती गुप्तकाल (कुमारगुप्त प्रथम और उनके बाद) की मूर्तियाँ काशिका शैली की अनुगामिनी हैं। काशिका शैली को प्रत्यारोपण मथुरा में कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल में कब और किस प्रकार हुआ स्पष्ट रूप से नहीं जाना जा सकता। किंतु इस संबंध में यह बात द्रष्टव्य है कि कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल का एक अभिलेख मथुरा क्षेत्र में स्थित एटा जिले के विलसड़ नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।

यह अभिलेख जिन स्तंभों पर अंकित हुआ है, उन पर कनिंघम की सूचना के अनुसार कुछ उच्चित्रण हैं। ये उच्चित्रण कला - इतिहास के इस ऊहापोह में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। पर इनकी ओर कला-मर्मज्ञों का ध्यान कदाचित् अभी तक नहीं गया है, इन उच्चित्रों की चर्चा कहीं भी प्राप्त नहीं है। कनिंघम ने उनकी जो प्रतिच्छाया उपस्थित की है, वे बहुत संतोषजनक नहीं कहे जा सकते, फिर भी उनसे उन स्तंभों में काशिका - शैली की मूर्तन कल्पना उभरती हुई दिखाई पड़ती है। किंतु उनमें उस सुधरता का अभाव है। जो गुप्तकालीन कही जानेवाली कला में दिखाई पड़ता है। उसका अंकन भी बहुत सुडौल नहीं है। इसके आधार पर यह कल्पना की जा सकती है कि कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल के आरंभ में काशिका-शैली का प्रसार मथुरा क्षेत्र की ओर होने लगा था। इस प्रकार कदाचित् कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल के आरंभ से ही मथुरा क्षेत्र में मथुरा-कुषाण शैली और काशिका-शैली दोनों समानांतर रूप से प्रचालित थीं।

फिर भी आश्चर्य की बात है कि वे एक दूसरे को तनिक भी प्रभावित नहीं करतीं। कम-से-कम अभी तक ऐसी कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है जिससे मथुरा में प्रचलित पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती इन दोनों कला- धाराओं के संगम को देखा जा सके।


मथुरा के बाद काशी (सारनाथ) गुप्तकला का केंद्र कहा जाता है और साथ ही यह भी कहा जाता है कि मथुरा कला की ही एक धारा नयी ताजगी लेकर यहाँ फूटी है। वस्तुतः मथुरा कला शैली के विकास से बहुत पूर्व से ही काशिका प्रदेश कला केंद्र रहा है। यह तथ्य अशोक के स्तंभों तथा मौर्यकालीन अं कला-कृतियों के चुनार के बालू-पत्थर में बने होने से स्वतः प्रमाणित है।

मौर्योत्तरकाल में यह कला किस रूप में जीवित थी, इसका ऊहापोह अभी तक करने की चेष्टा नहीं की गयी है। इस प्रकार के ऊहापोह के लिए न तो यह अवसर है और न स्थाना अतः इतना ही कहा जा सकता है कि सारनाथ में कुषाणकाल में मथुरा से कुछ मूर्तियाँ निर्यात हुई थी, जो कदाचित् इस बात का संकेत देती हैं कि उस समय यहाँ की स्थानीय कला बहुत उद्बुद्ध न थी। किंतु साथ ही यह भी द्रष्टव्य है कि सारनाथ से ही कुछ ऐसी भी मूर्तियाँ भी मिली है जो मथुरा-कुषाण-शैली में बनायी गयी हैं पर उसका पत्थर चुनार का है। इस प्रकार वे निस्संदेह स्थानीय कला के नमूने हैं। उसका निर्माण कुषाणकाल में ही हुआ था या मथुरा की तरह यहाँ भी वे मथुरा-कुषाण- शैली में पूर्व गुप्तकाल में बनीं, यह निश्चयपूर्वक कहने के लिए कोई आधारभूत सामग्री नहीं है। इन मूर्तियों में से कुछ पर लाल रंग पुते होने के चिह्न प्राप्त हुए हैं, वे उनके रंगीन होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। उनके रंगने का उद्देश्य उन्हें मथुरा के मूर्तियों के रंग में उपस्थित करना था वह काशी की किसी अपनी परंपरा में था, यह भी स्पष्ट नहीं है। वस्तु-स्थिति जो भी हो, इस कला-शैली की मूर्तियाँ बहुत कम प्राप्त हुई हैं।