गुप्तकालीन समाज - Gupta Society
गुप्तकालीन समाज - Gupta Society
गुप्तकालीन समाज की विशेषतायें निम्नलिखित हैं-
(1) वर्ण व्यवस्था और जातिप्रथा
गुप्तकाल में समाज की आधारशिला वर्ण-व्यवस्था थी। समाज में वर्णाश्रम धर्म का महत्व बढ़ने लगा था। सामाजिक संगठन में चार वर्गुणों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) तथा चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) की महत्ता पुनः स्थापित हो गई थी। सभी वर्ण के लोग अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते थे। ब्राह्मण वर्ण के लोग अध्ययन-अध्यापन और यजनयाजन करने में, बौद्धिक और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने में, "सिद्धी” और मोक्ष हेतु चिंतन-मनन और तप करने में रत रहते थे। वे वैदिक ज्ञान, मंत्रों, सूत्रों भाष्यों और प्रवचनों में प्रवीण होते थे। इसलिए समाज में अंय वर्णों की अपेक्षा वे अधिक सम्मानित होते थे।
क्षत्रिय वर्ग के लोग भी प्रजा पालन और प्रजारक्षण के कार्य बड़ी निष्ठा और तत्परता से करते थे। वैश्य वर्ण के लोग वाणिज्य और व्यापार, उद्योग और व्यवसाय, कृषि और पशु-पालन के कार्य करके देश को समृद्ध बना रहे थे। शूद्र भी अंय व्यवसाय करके अपनी शक्ति के अनुसार समाज सेवा के कार्य करते थे।
समाज में विदेशियों के विलीनीकरण का प्रभाव पड़ा और जातियों की विविधता बढ़ गयी। भारत में हूण बड़ी संख्या में प्रविष्ट हो गये और वे आक्रांता और शासक होने से क्षत्रियों की श्रेणी में आ गये थे। बाद में विदेशी गुर्जर भी क्षत्रिय वर्ग में सम्मिलित हो गये।
इससे क्षत्रिय जाति की वृद्धि हुई। वनों में रहने वाली पिछड़ी जातियों को भी स्थिर वर्ण समाज में आत्मसात कर लिया गया। इससे शूद्रों और अछूतों की संख्या में वृद्धि हुई। शिल्पियों और कारीगरों के भी उनके व्यवसाय के अनुसार श्रेणी या संघ थे। जब ये शिल्पी संघ स्थायी हो गये तो उनके धंदे और संघों से अलग-अलग जातियाँ हो गयीं और इनके निवास गृहों से इनके अलग-अलग मुहल्ले बन गये। भूमि हस्तान्तरण व भूमि राजस्व व्यवस्था से और सरकारी अभिलेखों के रखरखाव के कार्यों से कायस्थों (लेखकों) की एक नवीन जाति बन गयी । कायस्थों ने ब्राह्मणों के लेखन संबंधी एकाधिकार को समाप्त कर दिया। उत्तर भारत के विशेषकर उत्तरप्रदेश और बिहार में ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव के सामतों और मुखियों की एक नवीन जाति उभर कर आयी। ये महत्तर कहलाये। कालांतर में वे एक जाति में परिणित हो गये।
(2) सामंत वर्ग, बेगार प्रथा और कृषि दासता
गुप्त युग में मंदिरों को, विद्वानों को और ब्राह्मण पुजारियों को और संभवतया अधिकारियों को भूमिखंड और गाँव दान अनुदान में दिये जाते थे। भूमि अनुदान के साथ-साथ राजस्व की सुविधाएँ भी दी जाती थीं। जिनको ऐसे भूमिदान और सुविधाएँ प्राप्त होती थीं, वे वृत्तिभोगी के समान थे और कालांतर में इनसे सामंत वर्ग उभरा। ये वृत्तिभोगी अपने क्षेत्र में करों की वसूली भी करते थे और मुकद्मों की सुनवाई और न्याय भी करते थे। भूमि अनुदानों की प्रथा से भारत में सामंती व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त हो गया। वृत्तिभोगियों को भूमि दान में दिये जाने के बाद भी कृषक उनकी भूमि से जुड़े रहते थे। यदि कृषकों की भूमि आन्य को अनुदान में दे दी जाती थी तो भी वे उसके अधीन रहकर कृषि करते थे। इससे देश के कुछ भागों में कृषकों की स्वतंत्र स्थिति की उपेक्षा की गयी और वे कृषि दास या अर्द्ध कृषि दास बन जाते थे।
गुप्तकाल में बिना पारिश्रमिक दिये कृषकों से या अंय लोगों से कार्य कराने की बेगार प्रथा प्रारंभ हो गयी थी। वाकाटक शिलालेखों से विदित होता है कि जब सेना या उच्च अधिकारी किसी गाँव में पड़ाव डालते थे या किसी ग्राम से गुजरते थे तब उस गाँव के निवासियों को सैनिकों तथा उच्च अधिकारियों के लिए धन और रसद की व्यवस्था करनी पड़ती थी। गाँव वाले सैनिकों के लिए फल और दूध की, सामान ढोने के लिए पशुओं की व्यवस्था करते थे। इसके लिए कोई पारिश्रमिक नहीं था।
(3) अस्पृश्यता की स्थिति
इस युग में चांडाल और नीच तथा हेय धंदे करने वाले घुमक्कड़ जंगली, अर्द्धसभ्य जातियाँ जिन्हें चांडाल और श्वपच कहते थे, नगर और गाँव के बाहर रहते थे। जब ये नगर या गाँव में प्रवेश करते थे,
तब इन्हें लकड़ी बजाते हुए चलना पड़ता था जिससे लोगों को इनके आगमन की सूचना प्राप्त हो जाय, वे मार्ग से हट जाये और उनको स्पर्श न कर सकें। इससे प्रतीत होता है कि समाज में छूआ-छूत थी। चांडालों को अपवित्र झूठा, असनातनी, झगड़ालू क्रोधी व लोभी माना गया।
(4) व्यवसाय की परिवर्तनशीलता
• गुप्त काल में वर्णों तथा व्यवसायों का परिवर्तन संभव था। ब्राह्मण और शिल्पी जातियों के लोग सैनिक का कार्य करते थे, क्षत्रिय जाति के लोग व्यापारी का काम करते थे और शूद्र लोग सेवा कार्यों के अतिरिक्त व्यापारी,
शिल्पी और कृषक का काम भी करते थे। कुछ शूद्र सैनिक और सेना के पदाधिकारी भी थे। लोग अपनी सुविधा, शक्ति और प्रतिभा के अनुसार अपने वर्ण या जाति के प्रतिकूल भी व्यवसाय चुन लेते थे। इस प्रकार यद्यपि समाज में जातिप्रथा विद्यमान थी, परंतु इस प्रथा में अभी वह अपरिवर्तनशीलता और दृढ़ता नहीं आ पायी थी जो मध्ययुग में थी।
(5) संयुक्त परिवार तथा व पारिवारिकजीवन
समाज में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। परिवार का मुखिया पिता व वयोवृद्ध व्यक्ति होता था। वह परिवार के समस्त सामाजिक और धार्मिक कार्य करता था। पारिवारिक जीवन सुखी था।
समाज में छुआछूत और दासप्रथा प्रचलित थी। हीन व्यवसाय करने वाले और आहार-बिहार तथा आचार-विचार में हेय और अर्द्धसभ्य लोग अछूत थे। उनके संपर्क और संसर्ग से छूआ-छूत मानी जाती थी। युद्धबंदी या वे लोग जिन्होंने अपने स्वयं को बेच दिया हो या जो खरीदे हुए हों अथवा जिसे दास बनाने का दंड मिला हो या वे जो अपना ऋण न चुका सके हों या जो जुए में हार गए हों दास बना लिये जाते थे, परंतु दासों के साथ कठोर नृशंसता का व्यवहार नहीं किया जाता था । यद्यपि सती प्रथा यत्र- तत्र राजवंशों में प्रचलित थी, पर इसका व्यापक प्रचार और धार्मिक महत्व नहीं था। पर्दे की प्रथा कुछ सीमा तक प्रचलित थी। सामान्यतः नारियाँ बिना पर्दे के स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण करती थीं परंतु उच्च कुलों की नारियाँ गृहों से बाहर निकलने पर घूँघट अथवा पर्दे का उपयोग करती थीं और अपने वसनों पर एक प्रकार का आवरण धारण करती थीं।
(7) नारी की स्थिति
पूर्व युगों की अपेक्षा गुप्त युग में स्त्रियों की दशा कुछ बेहतर एवं विकसित प्रतीत होती है। सामान्यतया समाज में स्त्रियों को अच्छा सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। वे पुरुषों और अपने पतियों के साथ समान रूप से सामाजिक और धार्मिक कार्यों में भाग लेती थी। स्त्रियों की शिक्षा की ओर ध्यान दिया जाता था। साधारणतया कन्याएँ गायन, नृत्य, गृहकार्य आदि में प्रवीण होती थीं। अपनी उच्च सांस्कृतिक और साहित्यिक शिक्षा के कारण कतिपय स्त्रियाँ लेखकों और कवित्रियों के रूप में भी प्रख्यात थीं, जैसे शीला, भट्टारिका आदि। सांस्कृतिक कार्यों में उच्च जाति और वर्गों की स्त्रियाँ रुचिपूर्वक भाग लेती थीं और शासन संचालन में भी योग देती थीं। कुछ प्रांतों में विशेषकर कन्नड़ प्रदेश में स्त्रियाँ प्रांतीय प्रशासन में और गाँवों में मुखिया का काम भी करती थीं। दक्षिण भारत में स्त्रियाँ न केवल संगीत और ( नृत्य में प्रवीण होती थीं, अपितु वे सार्वजनिक रूप से इन कलाओं में अपनी निपुणता का प्रदर्शन भी करती थीं।
त्रियों को संपत्ति रखने का अधिकार था और वे अपने "स्त्री धन" में से दान-पुण्य करती थीं। कभी-कभी स्त्रियाँ तपस्विनी और भिक्षुणियाँ भी होती थीं।
(8) विवाह
समाज में विवाह महत्वपूर्ण माना जाता था। एक पत्नी प्रथा सर्वमान्य थी, पर धन-संपन्न परिवारों, सामंतों और राजवंशों में बहु-विवाह प्रथा थी। इस युग में तेरह वर्ष के पूर्व ही रजस्वला होने से पहले बाल्यकाल में विवाह करने की प्रथा प्रारंभ की गयी थी. पर स्वयंवर प्रथा विलीन नहीं हो पायी थी। विधवा विवाह और अनमेल वृद्ध-विवाह कुछ अंशों तक प्रचलित थे। विभिन्न जातियों, संप्रदायों और वंशों के लोगों से अंतर्जातीय विवाह होते थे। अनुलोम (उच्चवर्ण के पुरुष के साथ निम्नवर्ण की स्त्री का संबंध और प्रतिलोम (निम्न वर्ण के पुरुष के साथ उच्चवर्ण की स्त्री का संबंध), दोनों प्रकार के विवाह समाज में प्रचलित थे।
(9) खान-पान
गुप्तकाल में शाकाहार और माँसाहार दोनों ही प्रचलित थे। बौद्ध धर्म की प्रधानता और भगवान की भक्ति की प्रबलता से माँस मदिरा का उपयोग कम हो गया था, पर विशिष्ट अवसरों पर माँसाहार होता था। क्षत्रिय और निम्न श्रेणी के तीन मद्यपान करते थे। साधारणतया भोजन और खान-पान में शुद्धता, पवित्रता और सात्विकता थी।
(10) वेशभूषा और आभूषण
सूती, रेशमी और ऊनी वस्त्र का उपयोग होता था। विशेष उत्सवों और समारोहों पर रेशमी वस्त्र पहने जाते थे। ऋतु के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के वस्त्रों का उपयोग किया जाता था।
पुरुष की वेष-भूषा में एक ऊपरी वस्त्र और एक नीचे का वस्त्र धोती रहती थी। खियाँ साड़ी, अंगी और चोली धारण करती थीं। कुछ प्रदेशों में स्त्रियाँ एक छोटा सा घाघरा और उस पर एक साड़ी पहनती थीं। अय प्रदेशों में एक लंबी साड़ी का उपयोग दोनों कार्यों के लिए होता था। समाज में शक लोगों के कोट, ओवरकोट और पजामे प्रचलित हो गये थे। साधारण लोग पगड़ी पहनते थे पर अधिकांश लोग बिना जूते के आते-जाते थे। स्त्री और पुरुष दोनों को ही शृंगार और आभूषण प्रिय थे। मुख और ओठों की सौंदर्य वृद्धि के लिए रंग तथा लेपों का प्रयोग किया जाता था। केशों को विविध प्रकार से संवारने और सजाने की कलाएँ भी उतनी ही थीं जितने कि केशा विविध प्रकार के सुंदर और कलात्मक आभूषण पहने जाते थे। गुप्त युग के आभूषणों में कान की बालियाँ,
विविध प्रकार की मोतियों की मालाएँ और हार, कँदोरे, वक्षस्थल और जंघाओं के आभूषण, रत्नजड़ित चूड़ियाँ, अंगूठियाँ आदि मुख्य थे पर नथ या नाक के काँटे का प्रचलन नहीं था।
(11) मनोरंजन
चैपड़, जूआ, शतरंज, मृगया, गैंडों व मुर्गों की लड़ाइयाँ, भैंसों व हाथियों की लड़ाई प्रमुख मनोरंजन थे। बालकों और महिलाओं में कंदुक-क्रीड़ा लोकप्रिय थी। उद्यानों में सैर और विविध प्रकार के खेल, नृत्य, गायन, वादन और नाटक आमोद-प्रमोद के अंय साधन थे। गणिकाएँ भी वादन, गायन और नृत्यों से मनोरंजन करती थीं। लोग मेलों, धार्मिक उत्सवों और रथ यात्राओं में अधिक आनंद लेते थे।
(12) शिक्षा
गुप्त युग में शिक्षा में भी खूब प्रगति हुई। तीर्थ स्थानों, राजधानियों और विशाल नगरों में प्रसिद्ध आचार्यगण अपने निवास गृहों और आश्रमों में विद्यार्थियों को शिक्षा देते थे। नालंदा, वलभी और कांची ऊँची शिक्षा के केंद्र थे। स्त्री शिक्षा का भी प्रचार हुआ था। पुराण, स्मृति, महाकाव्य, तर्क, दर्शन, न्याय, व्याकरण, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा आदि विषय पढ़ाये जाते थे। तांत्रिक या व्यावसायिक शिक्षा शिल्पियों के परिवारों में दी जाती थी।
(13) विज्ञान
गुप्तकाल में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई। इस काल में दशमलव प्रणाली का आविष्कार व विकास हुआ सूर्य व चंद्रग्रहण के वास्तविक सिद्धांतों की समीक्षा की गई,
नक्षत्रों के चलन का विवेचन किया गया, अपनी धुरी पर पृथ्वी के घूमने का सिद्धांत प्रतिपादन किया गया, ग्रहों व नक्षत्रों की गति पर प्रकाश डाला गया, विशुद्ध सह वर्ष मान निकाला गया, पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का विवेचन किया गया, पृथ्वी के आकार और व्यास की गणना की गई, अणु सिद्धांत का प्रचार किया गया, ज्योतिष के पोलिस और रोमन सिद्धांतों की विशद् व्याख्या की गई। इस युग में गणित, भूमिति, ज्योतिष, खगोल विद्या, नक्षत्र विद्या, वनस्पति विज्ञान, प्राणी-शास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, रसायन शास्त्र, धातु-विज्ञान, शल्य-शास्त्र आदि का खूब विकास और प्रगति हुई। आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ, ज्योतिषाचार्य और नक्षत्र वैज्ञानिक, पांडुरंग लाटदेव और वराहमिहिर जैसे ज्योतिषी, नागार्जुन और वराहमिहिर जैसे धातु वैज्ञानिक, सुश्रुत और चरक जैसे चिकित्सक, वाग्भट्ट और धन्वंतरी जैसे आयुर्वेद के प्रकांड विद्वान और पालकाय जैसे पशु चिकित्सक हुए।
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