शिक्षा के गुरुकुल - gurukul of education

शिक्षा के गुरुकुल - gurukul of education


महाभारत, मनुस्मृति और मुद्रा राक्षस प्राचीन गुरूकुलों पर प्रकाश डालते हैं कि प्राचीन गुरुकुलों में छात्र सामान्यतः गुरुजनों की संरक्षकता में रहते थे। वे वहीं विद्याध्ययन करते थे। अतः इनको अंतेवासिन् कहा गया था। न केवल सामान्य प्रजाजन, अपितु राजपुत्र भी गुरुकुलों में रहकर, गुरु-जनों की सेवा करते हुए विद्या प्राप्त करते थे। 



विद्यार्थी का जीवन


विद्यार्थी को शिष्टाचार और सदाचार का पालन करना पड़ता था। प्रातः समय से उठकर गुरू का अभिवादन करना, सर्वदा उनसे नीचे आसन पर बैठना तथा भड़कीले वस्त्र न पहनना विद्यार्थियों का परम कर्तव्य था।

विद्यार्थी के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य था। अतः उसको ब्रह्मचारी कहा गया। ब्रह्मचारी का यह समय ब्रह्मचर्य आश्रम का था। सहपाठी एक दूसरे को ब्रह्मचारी कहते थे। ब्रह्म का अर्थ ज्ञान भी है। इस प्रकार ब्रह्मचारी का अर्थ हुआ ज्ञान की प्राप्ति के लिए जीवन-विधि का पालन करने वाला। इन गुरुकुलों में विभिन्न वर्णों के छात्र साथ-साथ रहकर विद्योपार्जन करते थे। भारद्वाज के गुरुकुल में ब्राह्मण-बालक द्रोण और क्षत्रिय राजकुमार द्रुपद ने तथा सांदीपनि के गुरुकुल में ब्राह्मण-बालक सुदामा ने क्षत्रिय बालक कृष्ण के साथ-साथ विद्याध्ययन किया था।


गुरुकुल के विद्यार्थियों का जीवन तपोमय होता था। भोग-विलास और आरामपसंदी को विद्या की प्राप्ति के लिए बाधक माना गया था।

ये वर्जित थे। महाभारत' के अनुसार विद्यार्थी का जीवन सुख- भोगों से रहित होना चाहिये। सुख चाहने वाले को विद्या का विचार छोड़ देना चाहिये तथा विद्या चाहने वाले को सुख का विद्यार्थी के लिए दो नियम विशेष रूप से निर्धारित थे स्वाध्याय और संयम । इनका - पालन करता हुआ ही वह विद्याध्ययन की योग्यता प्राप्त करता था।


ब्रह्मचारी के लिए अनिवार्य था कि वह निषिद्ध वस्तुओं का प्रयोग न करे। भोग-विलास तथा ब्रह्मचर्य का विघात करने वाली वस्तुओं का प्रयोग उसके लिए वर्जित था। आचार्य के आदेशों का पालन करना और गुरुकुल आश्रम के सारे कार्य करना ब्रह्मचारियों के कर्तव्य समझे जाते थे। ब्रह्मचारी को क्षमाशील, जितेंद्रिय, विनयी, परिश्रमी, कर्तव्यपरायण और क्रोधरहित होना चाहिये। 


विद्यार्थी के कार्य


मनुस्मृति तथा चरक संहिता के अनुसार राजा माता-पिता और देवताओं की भांति गुरू का सम्मान और आदर करना विद्यार्थी का कर्तव्य माना जाता था। आश्रम के सारे कार्य तथा गुरु की सेवा विद्यार्थी के कर्तव्य थे। वह गुरु की सेवा पुत्रवत्, दासवत् और अर्थिवत् करता था। आचार्यकुल में निवास करता हुआ वह भूमि पर शयन करता था और सूर्योदय से पूर्व उठ जाता था। यदि उठने में देरी हो जाती थी, तो गायत्री का जप करके प्रायश्चित करता था। तदनंतर स्नान आदि नित्यकर्म करके संध्या अग्निहोत्र करता था। आश्रमों में यज्ञशालायें होती थीं, जहाँ यज्ञ कार्य संपन्न होते थे। संध्या अग्निहोत्र के तीन सवनों-प्रातः माध्यंदिन और सायं के उल्लेख मिलते हैं। इसके बाद वह गुरु से विद्या पढ़ता था। मध्याह्न के समय भिक्षा माँगने जाता था। रात्रि में गुरु से आज्ञा पाकर सोने के लिए चला जाता था।


गुरुकुल आश्रम में प्रमुख कार्य थे समिधाओं का लाना, पूजा के लिए पुष्प चुनना, कुशा एकत्रित करना, गौ चराना, गोबर एकत्रित करके उपले बनाना, आश्रम के लिए जल लाना आदि। तपोवनों और गुरुकुलों में समिधायें लाने का कार्य बहुत महत्वपूर्ण था। 'पारस्कर गृह्यसूत्र' के अनुसार समिधायें लाना ब्रह्मचारियों का नित्य का कर्तव्य है। सांदीपनि के शिष्य कृष्ण और सुदामा की कथा बहुत प्रसिद्ध है, जबकि वे वनों में समिधायें लाने गए थे। अनेक बार आचार्य स्वयं भी समिधायें लेने चले जाते थे। 'महाभारत' के शकुंतलोपाख्यान के अनुसार दुष्यंत जब कण्व आश्रम गये, तो उस समय कण्व वनों में समिधायें लेने गये हुए थे। कुशाओं का उपयोग बहुत था। तपोवनों के चारों ओर कुशाओं के उत्पन्न होने के प्रचुर वर्णन हैं। बैठने, लेटने और शयन के लिए आसन बनाने हेतु कुशाओं का उपयोग होता था। कुश घास काटने की दक्षता के कारण ही कुशल पद का प्रयोग रूढ़ हुआ। 'मुद्राराक्षस' नाटक के एक वर्णन के अनुसार चाणक्य की कुटीर के सामने कुशाओं का ढेर लगा हुआ था।


गुरुकुल आश्रम की गौओं को चराने का कार्य छात्र ही करते थे। उपमन्यु द्वारा गौओं को चराने की कथा बहुत प्रसिद्ध है। आवश्यकता पड़ने पर विद्यार्थियों को गुरूओं के वस्त्र और बर्तन भी साफ करने पड़ते थे।


भिक्षावृत्ति का अभ्यास


प्राचीन युग में ब्रह्मचारी के लिए भिक्षा के अन्न की व्यवस्था की गई थी। उपनयन संस्कार के पश्चात ब्रह्मचारी को भिक्षा माँगने का अधिकार प्राप्त होता था। आचार्य उसको जन-समुदाय से भिक्षा माँगने का आदेश देता था। तदनंतर आश्रम में रहते हुए ब्रह्मचारी समीपस्थ ग्रामों से भिक्षा माँगकर लाते थे। इस भिक्षा को वे गुरु को अर्पित करते थे। गुरु विद्यार्थी को उसका अंश देते थे। भोजन करते समय भी ब्रह्मचारी नियमों का ध्यान रखता था। अधिक भोजन करना, बीच-बीच में खाना, जूठे मुख कहीं जाना, ये सब बातें अनुचित थीं।


अति प्राचीन समय में ब्रह्मचारी के लिए यद्यपि भिक्षा के अन्न की व्यवस्था की गई थी तथापि उत्तरवर्ती काल में इस व्यवस्था में अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई। ब्रह्मचारियों का बहुत सा समय, जो अध्ययन के लिए उपयोगी था, भिक्षाटन में निकल जाता था। अनेक बार उनको तिरस्कार का भी अनुभव होता था। कालांतर में गुरुकुलों को प्रचुर धन प्राप्त होने की सुविधा के कारण भिक्षा-चर्या की आवश्यकता नहीं रही। शासन तथा समृद्ध जनों से गुरुकुलों को प्रचुर आर्थिक सहायता मिलने लगी। गुरु-दक्षिणा से भी प्रभूत धन और सामग्री मिलती थी। अतः भिक्षा पर निर्भरता समाप्त होने से ब्रह्मचारियों को गुरुकुल का कार्य करने और अध्ययन के लिए अधिक समय तथा सुविधायें मिलने लगीं। कालांतर में विशाल विद्या- केंद्रों और विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई जिनमें हजारों विद्यार्थी सुकू देशों से अध्ययन के लिए आते थे।


गुरूकुल प्रायः तपोवन में स्थापित किये जाते थे। प्राचीन काल में वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, गौतम, याज्ञवल्कय आदि ऋषियों के आश्रमों में शिक्षण का कार्य चलता था, परंतु सभी गुरूकुलों की स्थापना इन आश्रमों के समान वन में नहीं की जाती थी। कई गुरूकुल नगरों के सन्निकट स्थापित किये जाते थे। वाराणसी और तक्षशिला जैसे नगरों में जिन गुरूकुलों के उल्लेख मिलते हैं, वे वस्तुतः नगर से अविदू ऐसे एकांत उपवनों में निर्मित थे, जहाँ एकाग्रचित हो अध्ययन करने के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध था। नगरों के कोलाहलपूर्ण वातावरण में अध्ययन का कार्य सुचारू रूप से संपन्न होने में विघ्न होने के कारण जनरव से छू एकांत स्थलों में विद्वान् वास करने लगते थे और उनके निवास स्थान गुरुकुलों में परिवर्तित हो जाते थे। इसी तरह वाराणसी और तक्षशिला में प्रसिद्ध शिक्षण केंद्रों की स्थापना हुई। जातकों से विदित होता है कि इन प्रसिद्ध विद्या केंद्रों में विद्यार्थी 14-16 वर्ष की उम्र में गुरू के पास जाते थे।


गुरू शिष्य संबंध


कठोपनिषद के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु की अनिवार्य आवश्यकता है। मुंडकोपनिषद के अनुसार शिष्य को पूर्ण समर्पित होकर गुरू की सेवा में उपस्थित होना चाहिये।


प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में गुरु और शिष्य का संबंध अति पवित्र माना गया है। गुरू शिष्यों के प्रति स्नेह रखते थे और उनको सब प्रकार से योग्य बनाने का प्रयत्न करते थे। गुरू की सेवा करना और उनके आदेशों का पालन करना शिष्य भी अपना कर्तव्य समझते थे। शिक्षण के क्षेत्र में गुरू उनके पिता तुल्य होते थे जो उत्तराधिकार में अपना समस्त ज्ञान शिष्यों को देते थे। अथर्ववेद के अनुसार संबंधकी घनिष्ठता के कारण गुरू को माता भी माना गया है क्योंकि शिक्षण काल में शिष्य, गुरू के गर्भ में रहता है।


शिष्यों का गुरु के प्रति अति विनम्र एवं आदरपूर्ण व्यवहार होता था। वे आश्रम का सारा कार्य करते थे। गुरु के लिए आसन बिछाना, अभ्यागतों का स्वागत करना आदि शिष्यों के कार्य थे। गुरु का निरादर करना महान् पाप था। गुरु का अपमान यदि कोई करता है, तो शिष्य उसको सहन नहीं करता था। मुद्राराक्षस के अनुसार गुरु की निंदा महान् पाप है। जो गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं या उनको अपमानित करते हैं, उन्हें शर्म से डूब जाना चाहिये।


गुरुओं का भी शिष्यों के प्रति स्नेह का व्यवहार था। वे प्रायः कठोरता का व्यवहार नहीं करते थे। ‘आपस्तंब धर्मसूत्र' के अनुसार गुरू को चाहिये कि शिष्य के प्रति स्नेह का व्यवहार करे,


उसे सारी विद्यायें पढ़ावें और कुछ भी न छिपावें, किंतु स्नेह के व्यवहार का यह अर्थ नहीं है कि शिष्य उद्दण्ड हो जावे शिष्य को सुधारने के लिए गुरू उसको कठोरदंड दे सकता था। मनु ने गुरू के लिए कहा है कि वह शिष्य के प्रति मधुर व्यवहार करे।