हर्ष कालीन नारी - happy woman
हर्ष कालीन नारी - happy woman
हर्ष-कालीन समाज में उच्च वर्ग की स्त्रियों में शिक्षा का प्रचार था। राजकुमारी राज्यश्री को संगीत एवं नृत्य की शिक्षा दी गई थी। हर्षचरित प्रियदर्शिका' नाटिका में राजा अपनी रानी को दासी प्रियदर्शिका के लिये नृत्य एवं संगीत की व्यवस्था करने का कार्यभार सौंपता है। स्त्रियाँ चित्रकला में पटु होती थीं। 'रत्नावली' की नायिका वर्तिका एवं समुद्रक में रखे रंगों की सहायता से चित्रफलक पर अपने प्रेमी का चित्र बनाती हुई प्रदर्शित की गई है। इन नाटिकाओं में चित्रशालाओं एवं गंधर्वशालाओं का भी उल्लेख हुआ है। हर्षचरित में बाण ने थानेश्वर नगर-निवासिनी नारियों का सुंदर वर्णन प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार वे गजगामिनी, शीलवती, ऐश्वर्य में अनुरक्ता, गौरवर्ण वाली, लाल मणियों के आभूषण धारण करने वाली,
यामा (साँवली) चंद्रमा के समान सुंदर शरीर और शिरीष के फूल के समान कोमलांगी कंचुक धारण करने वाली, लावण्यवती, मधुरभाषिणी, प्रमाद-शून्या एवं प्रसन्न चित्त वाली थीं। उन सुंदरियों की आँखें ही सिर की सहज फूलमाला बन जातीं, मुख पर छितराये हुये बालों के प्रतिबिंब ही क्लेश न देने वाले कर्णावतंस बन जाते और अपने प्रिय की कथा ही उनके लिये कान का सुंदर आभूषण बन जाती। उनके कपोल ही निरंतर आलोक उत्पन्न करते और उनकी सुगंधित साँसों पर उलझते हुये भौर ही उनके मुख पर सुंदर घूँघट-पट का काम करते थे। वीणा के तारों से निकलने वाली ध्वनिसदृश्य उनकी मधुर वाणी थी, उनकी मुस्कानें ही सुगंधित पटवास का काम देती थीं।
माता के रूप में स्त्री बड़े प्रेम, श्रद्धा एवं सम्मान से देखी जाती थी, क्योंकि मातृत्व में ही भारतीय स्त्रीत्व का पूर्ण विकास होता था।
जब अपनी माता यशोमती के आत्मदाह के संकल्प से कातर हर्ष ने उन्हें ऐसा न करने का आग्रह किया, उस समय उनकी माता के उद्वार भारतीय नारीत्व के चरम गौरव की अभिव्यक्ति करते हैं उन्होंने हर्ष को संबोधित करते हुये कहा, "वत्स, तुम मेरे प्रिय नहीं हो, ऐसी बात नहीं है और निर्गुण एवं परित्याग के योग्य भी नहीं हो। दूध के साथ ही तुमने मेरे हृदय को पी लिया है। अवश्य ही इस समय अत्यधिक पति-भक्ति से अंतरित हो जाने के कारण मेरी दृष्टि तुम्हें नहीं देख पा रही है और भी हे प्यारे पुत्र, पर-पुरुष को देखने का व्यसन रखने वाली राज्य का उपकरण मात्र एवं करूणा -विहीन राज्यलक्ष्मी या पृथ्वी भी मैं नहीं हूँ। मैं तो कुलकलत्र हूँ, चरित्र ही हमारा धन है
और धर्म से उज्जवल कुल में मैंने जन्म लिया है। इस प्रकार जब मेरे सब अंग कृतकृत्य हो गये हैं, तो क्षीण पुण्योंवाली मैं अब और किसकी चाह करूँ ? इसीलिये अविधवा ही रह कर मरना चाहती हूँ। विधवा रति की भाँति मैं जले हुये अपने पति के शोक में निरर्थक प्रलाप नहीं कर सकती। तुम्हारे पिता के पैर की धूल के समान आकाश में अपने गमन को पहले ही सूचित करती हुई शूरानुरागिणी देवांगनाओं के आदर का पात्र बनूँगी। वस्तुतः बाण के ही शब्दों में वे स्त्रीत्व की पवित्रता की साक्षात् अवतार थीं।
समाज में पर्दा की प्रथा शिथिल जान पड़ती है, क्योंकि राज्यश्री कन्नौज की धर्म-परिषद् में अपने भाई हर्ष के पीछे बैठी हुई युआन च्वांग के भाषण सुना करती थीं।
बाण के अनुसार अंत:पुर में प्रवेश पर प्रतिबंध अवश्य था और कंचुकी प्रतीहार तथा षंडों को छोड़कर और दूसरे को प्रवेशाधिकार नहीं था, परंतु संभवत: साधु-सन्यासी इस प्रतिबंध से मुक्त थे। हर्षचरित में थानेश्वर की कुल-वधुओं का वर्णन करते हुये बाण ने बतलाया है कि वे सदा अपने मुँह पर घूँघट डाले रहती थीं। स्त्रियाँ संतान के जन्म के समय, विवाह या अयशुभ अवसरों पर अनेक प्रकार के व्रत रखतीं, उत्सव मनातीं तथा नाना प्रकार के मांगलिक अनुष्ठान करती थीं। सती की प्रथा प्रचलित थी और हर्ष की माता यशोमति ने प्रभाकरवर्धन की मृत्यु को समीप आया जानकर सधवावस्था में ही वैधव्य के दाह से बचने के लिये सरस्वती तट पर आत्मदाह कर लिया था। राज्य श्री भी वैधव्य की दारूण ज्वाला से ऊब कर विन्ध्य के जंगलों में अग्नि प्रवेश करने ही जा रही थी कि हर्ष ने समय से पहुँच कर उसे ऐसा करने से रोक लिया था। हर्ष की 'प्रियदर्शिका' नाटिका में भी विन्ध्यकेतु की स्त्री के सती होने का उल्लेख है।
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