उच्च शिक्षा केंद्र - higher education center
उच्च शिक्षा केंद्र - higher education center
तक्षशिला
सातवीं सदी ई. पू. में तक्षशिला की ख्याति प्रमुख शिक्षा केंद्र के रूप में दूर-दूर तक व्याप्त हो गयी, जिसका श्रेय वहाँ के आचार्यों को है। वहाँ के दिशाप्रमुख आचार्यों की बड़ी प्रसिद्धि थी और उनके नाम का ही यह प्रभाव हुआ कि सहस्रों मील दूर के प्रदेशों से जिज्ञासु जन तक्षशिला पहुँचने लगे। जातकों में उल्लेख मिलता है कि समग्र भारतवर्ष के क्षत्रिय एवं ब्राह्मण कुमार शिल्प सीखने के लिए तक्षशिला आचार्यों के पास जाते थे। बौद्ध-पिटकों में जिस प्रकार तक्षशिला का उल्लेख उपलब्ध होता है उससे प्रतीत होता है कि वह अपने समय का सर्वाधिक ख्याति प्राप्त विद्या केंद्र था।
वस्तुतः तक्षशिला में आधुनिक महाविद्यालय या विश्वविद्यालय जैसी कोई शिक्षण संस्था नहीं थी। वहाँ तो विद्वानों का आवास ही संस्था था, जहाँ आचार्य अपने वरिष्ठ शिष्यों के सहयोग से शिक्षण- कार्य संपन्न करते थे। वहाँ न तो किसी आचार्य के शिष्यों की निश्चित संख्या थी और न अध्ययन की कोई निश्चित अवधि ही। जितने विद्यार्थी मिल जाते, आचार्य उन्हें विद्यादान देते। जब तक उनकी शिक्षा पूर्ण नहीं हो जाती, विद्यार्थी गुरू के पास रहते। जातकों में उदाहरण मिलते हैं कि तक्षशिला में दिशाप्रमुख आचार्य पाँच-पाँच सौ विद्यार्थियों को पढ़ाया करते थे। एक आचार्य के पाँच सौ शिष्यों का उल्लेख परंपरागत शैली के कारण मिलता है, अतः इस संख्या को विशेष महत्व देना अनावश्यक है।
एक जातक में उल्लेख मिलता है कि एक आचार्य 103 राजकुमारों को धनुर्वेद की शिक्षा प्रदान कर रहे थे। इस संख्या में सत्य का आभास मिलता है और इससे यह अनुमान लगाना सही होगा कि तक्षशिला के प्रमुख आचार्यों से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगभग एक-एक सौ की रही होगी। शिक्षण- कार्य के लिए संभवतः वरिष्ठ शिष्यों का भी उपयोग किया जाता था।
तक्षशिला में अध्ययन करने के लिए यह आवश्यक नहीं था कि सभी विद्यार्थी गुरूकुल में ही वास करते। अनेक राजकुमार अपने रहने की व्यवस्था स्वयं ही करते थे, परंतु यह राजकुल के विद्यार्थियों के लिए ही संभव था।
सामान्यतया सभी विद्यार्थी गुरू के आवास में निवास करते, जहाँ उन्हें निवास, भोजन तथा अध्ययन की सारी सुविधाएँ उपलब्ध होतीं। धनी विद्यार्थी शिक्षा-शुल्क के साथ ही भोजन तथा आवास शुल्क भी दे दिया करते थे। जो विद्यार्थी निर्धन होते, वे शुल्क के बदले दिन में गुरूकुल का कोई काम किया करते। ऐसे विद्यार्थियों के लिए रात्रि में अध्यापन की व्यवस्था की गयी थी।
तक्षशिला मुख्यतः उच्च शिक्षा का केंद्र था, अतः वहाँ अध्ययन के लिए जाने वाले विद्यार्थियों की उम्र प्रायः 16 वर्ष बतलायी गयी है। वहाँ पढ़ने के लिए समाज के विभिन्न जातियों एवं वर्गों के विद्यार्थी जाते थे,
परंतु ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों की संख्या अधिक प्रतीत होती है। एक जातक में पाँच सौ ब्राह्मण विद्यार्थियों को लकड़ी जमा करने में संलग्न दिखलाया गया है। पुनः दूसरे जातक में उल्लेख मिलता है कि 103 राजकुमार एक आचार्य से धनुर्वेद की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। तक्षशिला के आचार्य विद्यादान में बड़े उदार थे। उन्होंने राजकुमारों, ब्राह्मण कुमारों तथा श्रेष्ठिपुत्रों के साथ दर्जी और मछली मारने वालों को भी शिष्य बनाया। उनके गुरूकुलों में केवल चांडालों के प्रवेश पर प्रतिबंध था ।
तक्षशिला में अध्ययन करना महँगा पड़ता था, क्योंकि वह उच्च शिक्षा का केंद्र था और किसी विशेष विषय में विशिष्टता प्राप्त करने के उद्देश्य से ही वहाँ कोई विद्यार्थी जाता था।
जो जिज्ञासु छात्र बहुत दूर से वहाँ जाते, उनके लिए वहाँ की शिक्षा महँगी पड़ती ही थी, परंतु वहाँ की मुहर लग जाने के पश्चात् किसी की योग्यता में संदेह करने का साहस कौन सकता था? अंतः वहाँ के स्नातक होने के लोभ का संवरण भी नहीं किया जा सकता था। धनवानों के लिए तो तक्षशिला में अध्ययन करना कोई बड़ी समस्या न थी, पर निर्धनों के लिए कुछ दिक्कतें थीं। प्राचीन भारत में मेधावी निर्धन छात्रों के मार्ग में भी ऐसी कोई दुर्लभ्य रूकावट नहीं आती थी कि वह विद्याध्ययन से वंचित रह जाता। तक्षशिला में पढ़ने वाले धनाढ्य छात्र एक सहस्र कार्षापण तक गुरूदक्षिणा दिया करते थे, परंतु निर्धन छात्र इतनी बड़ी धनराशि देने में असमर्थ होने के कारण श्रम के रूप में गुरूदक्षिणा चुकाते । गुरूदक्षिणा की राशि संग्रह करने के लिए कई विद्यार्थियों को भिक्षा का सहारा लेना पड़ता था।
प्राचीन भारत में सातवीं सदी ई. पू. से लेकर तीसरी सदी ई. पू. तक तक्षशिला, शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र रहा। यहाँ विभिन्न विद्याओं और शिल्प कलाओं की शिक्षा दी जाती थी। बौद्ध जातक ग्रंथों में तक्षशिला के विद्यापीठों का विशद विवरण है। कौशल नरेश प्रसेनजित, बुद्ध के प्रसिद्ध चिकित्सक जीवक और चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री तथा अर्थशास्त्र के विद्वान लेखक चाणक्य ने तक्षशिला में ही शिक्षा प्राप्त की थी। किंतु गुप्तकाल के प्रारंभ होते होते अर्थात चौथी सदी के पूर्वार्द्ध में शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र तक्षशिला का महत्व बहुत कम हो गया था।
नालंदा
वर्तमान बिहार के पटना जिले में बड़गाँव नामक ग्राम के निकट प्राचीन गिरिव्रज नगर था।
इससे बारह किलोमीटर उत्तर में नालंदा महाविहार था। गुप्त नरेश शक्रादित्य ने सर्वप्रथम नालंदा में एक बौद्ध विहार बनवाया था। यशोवर्मन के नालंदा अभिलेख से ज्ञात होता है कि यहाँ ऊँचे मंदिर और कई मंजिल वाले भव्य विशाल विहार थे जो बादलों को छूते थे।
ह्वेनसांग के अनुसार यहाँ दस सहस्र विद्यार्थी थे किंतु इत्सिंग के अनुसार यहाँ साढ़े तीन सहस्र विद्यार्थी थे। बौद्धसंघ के द्वारा यहाँ निवास करने वाले भिक्षुओं और विद्यार्थियों के निवास,
वस्त्र, भोजन और अंय आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था की जाती थी । अग्रहार दान के अभिलेखों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यहाँ अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को हर प्रकार की सुविधा प्रदान की जाती थी जिससे कि वह बिना किसी व्यवधान के अपना अध्ययन विधिवत पूर्ण कर सकें। नालंदा के संघाराम में प्रत्येक कक्ष में एक या दो विद्यार्थियों के निवास की व्यवस्था थी। प्रत्येक कक्ष में शयनार्थ एक या दो पाषाण के आसन तथा दीपक एवं पुस्तकें रखने के लिये ताख होते थे। चीनी यात्रियों के विवरणों से ज्ञात होता है कि नालंदा महाविहार का खर्च राजाओं द्वारा दान में दिए हुए दो सौ ग्रामों की आय से चलता था।
नालंदा के आचायों के असीम ज्ञान की कीर्ति के कारण भारत के ही नहीं अपितु बाहर के देशों जैसे मध्यएशिया, चीन, कोरिया, जावा, लंका आदि देशों के विद्यार्थी भी विद्याध्ययन के लिए यहाँ आते थे ।
इत्सिंग ने विविध देशों से आकर यहाँ अध्ययन करने वाले साठ छात्रों का उल्लेख किया है। स्वयं इत्सिंग यहाँ बौद्ध धर्म और दर्शन के अध्ययन के लिये दस वर्ष तक रहा था। नालंदा की ऐसी प्रसिद्धि के कारण अध्ययन के लिये उसमें प्रवेश पाने के लिए होड़ लगी रहती थी। उसमें प्रवेश के नियम अत्यंत ही कठोर थे। नालंदा के प्रवेश द्वार पर पंडित नियुक्त किए गये थे जो प्रवेश परीक्षा लेते थे। यह प्रवेश परीक्षा ऊँचे ज्ञान स्तर की अत्यंत कठिन होती थी। प्रवेश परीक्षा में ऐसे कठिन और गूढ़ प्रश्न पूछे जाते थे कि उसमें दस में से दो तीन विद्यार्थी ही सफलता प्राप्त कर सकते थे और वे ही प्रविष्ट हो पाते थे।
नालंदा में प्रत्येक शिक्षक के पास नौ या दस विद्यार्थी अध्ययन के लिये रहते थे। इससे गुरू अपने शिष्यों पर विशेष रूप से ध्यान दे सकते थे।
विद्यार्थी गण नियमों और उपनियमों का सुचारू रूप से पालन करते थे और विद्वान भिक्षु, गुरू के प्रति भक्ति और सम्मान के भाव रखते थे।
नालंदा प्रमुखतया बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय का महाविहार था इसलिये इसमें बौद्धों के धार्मिक साहित्य के अध्ययन पर विशेष बल दिया जाता था। किंतु इस महाविहार में बड़ी उदारता और सहिष्णुता थी। इसमें ब्राह्मण धर्म के वेदों और उनके धार्मिक साहित्य का भी अध्ययन किया जाता था। इसके अतिरिक्त व्याकरण, गणित, कर्मकांड दर्शन, तंत्र, ज्योतिष, आयुर्वेद हेतु विद्या, शब्द विद्या, अर्थ विद्या और कला की शिक्षा भी दी जाती थी। शिक्षा व्याख्यान, वाद-विवाद और प्रश्नोत्तर के माध्यम से दी जाती थी। वाद-विवाद के निमित्त वेदांत तथा सांख्य दर्शनों का पठन-पाठन होता था। गुरूओं, आचार्यों और विद्यार्थियों के लिये नालंदा में एक विशाल पुस्तकालय था। यह रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजन नामक तीन विशाल भवनों में फैला हुआ था। रत्नोदधि नौ मंजिलों वाला भव्य भवन था। इसमें प्रज्ञा पारमिता वर्ग के धार्मिक ग्रंथ और तंत्र तथा साहित्यिक ग्रंथ रखे गये थे।
नालंदा की आंतरिक व्यवस्था के लिये विभिन्न अधिकारी नियुक्त किये गये थे। प्रत्येक संघाराम के लिये "द्वार पंडित" नियुक्त किया गया था। यह संघाराम के प्रदेश द्वार के समीप बने निवास गृह में रहता था और संघाराम में भिक्षु और विद्यार्थी के प्रवेश का भार इस पर था। कर्मदान नामक निरीक्षण करने वाला उच्च अधिकारी था। वह महाविहार में लगने वाली विभिन्न प्रकार की सामग्री संग्रहीत करता था और उसके उपयोग के लिये उसका वितरण भी स्थविर नामक अधिकारी धार्मिक कार्य करता था। महाविहार में शिक्षा का भार कुलपति पर था। नालंदा महाविहार का सर्वप्रथम कुलपति धर्मपाल था। कालांतर में नालंदा एक ऐसा विशाल एवं प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बन गया था कि उसके यश और गौरव से प्रभावित होकर जावा द्वीप के नरेश बालपुत्रदेव ने नालंदा में एक विहार निर्मित करवाया था।
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