हिंदू मूर्तियाँ - Hindu idols
हिंदू मूर्तियाँ - Hindu idols
कृष्ण की जन्मभूमि और भक्ति-प्रधान वैष्णव धर्म का केंद्र होने से मथुरा में हिंदू देवी-देवताओं की भी मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनाई गई। मोरा गाँव के कूप से प्राप्त एक अभिलेख में पाँच वृष्णिवीरों की मूर्तियों का उल्लेख है। ऐसा प्रतीत होता है कि वैष्णव धर्म की मूर्तियाँ बन जाने पर इसका प्रभाव जैनों और बौद्धों पर पड़ा। शुंग युग में हमें केवल बलराम की और पाँच वृष्णि वीरों की वैष्णव मूर्तियाँ मिलती हैं। इनके अतिरिक्त इस समय बुद्ध गया में चार घोड़ों के रथ पर बैठे सूर्य की और दक्षिण भारत में गुडिमल्लम के लिंग के रूप में शिव की मूर्ति मिलती है। गज-लक्ष्मी की मूर्तियाँ भरहुत, साँची, बोधगया, उदयगिरि,
खंडगिरि और पश्चिमी भारत की गुफाओं में पाई जाती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि कुषाण काल से पहले शिव, सूर्य, गज, लक्ष्मी, बलराम और वृष्णि वीरों की ही मूर्तियाँ बनाई जाती थीं। कुषाण युग में इन मूर्तियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। शिव, कार्तिकेय, गणपति, विष्णु, सूर्य, ब्रह्मा, इंद्र, बलराम, कामदेव, कुबेर, हारीती लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा की नई मूर्तियों का निर्माण इस युग में हुआ। इस समय शिव की मूर्तियों के कई रूप मिलते हैं। पहले प्रकार की मूर्तियाँ सादे शिवलिंग के रूप में हैं। दूसरा प्रकार एक मुखी शिवलिंग का है जिसमें एक ओर मुख बना होता है। तीसरा प्रकार पंचमुखी शिवलिंग का है, जिसमें चार मुख चार दिशाओं में और एक मुख सबके ऊपर बना होता है।
चौथा प्रकार नंदी के आश्रय से खड़े हुए शिव और नंदिकेश्वर का है। पाँचवें प्रकार में पार्वती शिव के वामाँग हैं। छठा प्रकार अर्धनारीश्वर का है। इसमें दाई ओर शिव को जटा जूट और बाघांबर में तथा बाई ओर पार्वती को अलकावली, कर्णकुंडल, मेखला और साड़ी के साथ दिखाया जाता है।
सूर्य की मूर्ति कुषाण काल से पहले बोध गया में पाई जाती है। इसमें वे चार घोड़ों के रथ पर धोती और उत्तरीय पहने हैं, किंतु कुषाण काल में एक सर्वथा भिन्न प्रकार की मूर्ति पाई जाती है।
यह उदीच्य वेश में दो घोड़ों के रथ पर पैर लटकाए, बायें हाथ में अंधकार का भेदन करने के लिये तलवार और दायें हाथ में सूर्योदय का प्रतीक कमल लिए हैं। सूर्य का यहाँ उदीच्यवेष उत्तर के शीतप्रधान देशों से आने वाले शकों के प्रभाव से प्रचलित हुआ। इसमें धोती और उत्तरीय के स्थान पर सूर्य लंबा कोट, सलवार और जूते पहने हुए हैं। ईरान में मित्र या मिहिर के रूप में सूर्य की पूजा का अत्यधिक प्रचलन था। यहाँ से यह पूजा शक कुषाण अपने साथ भारत में लाये। कुषाण राजाओं की मूर्तियों में इनका चित्रण है। कुषाण युग की सूर्य मूर्तियाँ इन सम्राटों की भाँति सिर पर पगड़ी, शरीर पर कोट, कमर में पटका, टाँगों में सलवार और पैरों में मोटे जूते पहने रहती हैं।
हिंदू देवताओं में केवल सूर्य की मूर्तियों में हमें जूते मिलते हैं। इस युग की आरंभिक मूर्तियों में सूर्य दो घोड़ों के रथ में बैठे हैं बाद में इनकी संख्या चार और सात हो जाती है। गुप्त युग में भी सूर्य को उदीच्य वेश में प्रदर्शित किया गया है। कुषाण काल में विष्णु की मूर्तियाँ सिर पर मुकुट शरीर पर आभूषण और नीचे धोती पहने हैं, इनकी चार भुजाओं में दायाँ हाथ अभय मुद्रा में, बायाँ हाथ अमृत घट लिए कटि पर रखा हुआ है तथा दो अतिरिक्त हाथों में गदा और चक्र है। बलराम का वेष यक्ष मूर्तियों के समान है, इनके सिर पर भारी पगड़ी, कानों में कुंडल, कंधों पर उत्तरीय और नीचे अघोवस्त्र है। इनका विशेष चिह्न सिर पर सर्प की फणों का आटोप और बाँयें हाथ में हल है। गज लक्ष्मी की मूर्ति शुंग काल से ही मिलने लगती है। इस युग में भी कमल के आसन पर कमलों के वन में खड़े दो हाथियों द्वारा अपनी सूंड़ों से अभिषेक कराई जाती हुई लक्ष्मी की मूर्ति अत्यंत लोकप्रिय हुई। इस समय दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी के रूप में अधिक दिखाया जाता था।
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