क्रांति का महत्व - importance of revolution

क्रांति का महत्व - importance of revolution


छठी शताब्दी ई. पू. भारत में घटित धार्मिक क्रांति का भारतीयों के जीवन में बहुत महत्व है। वास्तव में यह क्रांतिइतिहास में एक नये युग का आरंभ करती है और इसका महत्व निम्नांकित है- 2.3.6.1 राजनीतिक महत्व


छठी शताब्दी ई. पू. के इतिहास को वैदिक काल का इतिहास धार्मिक कहा जाता है। इस काल का राजनीतिक इतिहास जानने के हमारे एकमात्र साधन धार्मिक ग्रंथ हैं जिनमें यत्र-तत्र राजनीतिक तथ्य भी बिखरे हुए मिलते हैं इन्हीं तथ्यों का संग्रह करके तथा भाषा-शैली के सहारे इस युग के इतिहास का निर्माण किया गया।

अतएव यह इतिहास न तो निर्भ्रान्त है और न श्रंखलाबद्ध परंतु छठी शताब्दी ई. पू. के तथा उसके बाद का इतिहास जानने में हमें प्रचुर साधन प्राप्त हो जाते हैं इससे इस काल का राजनीतिक इतिहास असंदिग्ध तथा श्रंखलाबद्ध हो गया।


सामाजिक महत्व


छठी शताब्दी ई. पू. की क्रांति का सामाजिक क्षेत्र में भी बड़ा प्रभाव पड़ा। इस क्रांति ने ब्राह्मणों की सत्ता को कम कर दिया और क्षत्रियों के प्रभाव में वृद्धि कर दी। वास्तव में इस क्रांति के प्रधान नेता क्षत्रिय ही थे अतएव उन्होंने अपने को समाज में सर्वश्रेष्ठ स्थान -प्रदान करने का प्रयत्न किया।

इस क्रांति जाति प्रथाको उन्मूलित कर समाज को समानता के आधार पर फिर से संगठित करने का प्रयत्न किया। 2.3.6.3 सांस्कृतिक महत्व


इस क्रांति का सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी बहुत बड़ा महत्व है। वैदिक साहित्य केवल संस्कृत भाषा में था जिसमें केवल ब्राह्मण ही लाभ उठा सकते थे, परंतु छठी शताब्दी ई. पू. तथा उसके बाद का साहित्य लौकिक संस्कृत तथा जन साधारण की पाली प्राकृत भाषाओं में लिखा गया है। इससे सभी जिज्ञासु लाभ उठा सकते हैं। वैदिक कालीन कला पूर्ण रूप से धर्म प्रभावित थी,

परंतु छठी शताब्दी ई. पू. की कला में भौतिकता का प्रादुर्भाव हो गया। इसके अतिरिक्त इस क्रांति के फलस्वरूप भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार विदेशों में भी हो गया है। बड़े-बड़े सुधारक तथा प्रचारक विदेशों में गये और वहाँ पर उन्होंने भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार किया। इससे भारत का विदेशों के साथ घनिष्ठ संपर्क स्थापित हो गया और उनके साथ निरंतर विचार-विनिमय चलता रहा। 


धार्मिक महत्व


इस क्रांति का धार्मिक दृष्टिकोण में सबसे अधिक महत्व है।

इस क्रांति के फलस्वरूप हमारे देश में बड़े-बड़े विचारक, दार्शनिक तथा सुधारक हुए जिन्होंने नई-नई धार्मिक विचार धाराओं को जन्म दिया और नये-नये धर्मों तथा संप्रदायों की स्थापना की जिनका भारतीयों के जीवन पर अमिट प्रभाव पड़ा। इसके पहले वेद प्रामाणिक ग्रंथ तथा ज्ञान के एकमात्र साधन समझे जाते थे, परंतु अब वेदों की प्रामाणिकता का विरोध होने लगा और तर्क तथा विवेचन को ज्ञान का सच्चा साधन बतलाया गया। पहले यज्ञों तथा बलि को ही मोक्ष की प्राप्ति का साधन माना जाता था और इसमें ब्राह्मणों की सहायता की आवश्यकता पड़ती थी, परंतु अब बिना किसी की सहायता केवल भक्ति तथा उपासना द्वारा अथवा अहिंसा, सत्कर्म तथा सदाचार द्वारा मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती थी। यह नये मार्ग बड़े ही सरल थे। अतएव यह बड़े लोक प्रिय बन गये। इस क्रांति ने भारतीय दर्शन की वृद्धि में भी बड़ा योग दिया। इसी क्रांति से स्वतंत्र चिंतन पर आधारित साहित्य का जन्म हुआ जो अतुलनीय तथा अवर्णनीय है।