भारत चंपा संबंध - India Champa Relations
भारत चंपा संबंध - India Champa Relations
चंपा की स्थिति अनाम के दक्षिण और कंबुज के पूर्व में समुद्र तक फैली थी। इस भारतीय उपनिवेश की स्थापना ईसा की दूसरी शताब्दी में हुई थी। चंपा राज्य की राजधानी का नाम भी चंपा था और यहाँ के निवासी चम कहलाते थे।
चंपा नगरी के अवशेष क्वांगनाम के दक्षिण में ट्रैकियू में मिले हैं। ईसा की दूसरी शताब्दी में इस प्रदेश पर श्रीमार नामक राजा राज्य करता था। श्रीमार का एक संस्कृत अभिलेख मिला है। श्रीमार और उसके उत्तराधिकारी भारतीय थे। ये संभवत: दक्षिण भारत से आये थे। इनकी भाषा संस्कृत थी और ये शैव मत के अनुयायी थे।
चीनी अनुश्रुतियों के अनुसार चतुर्थ शताब्दी ई. में चंपा के राजा फनबेन ने चंपा और चीन के मध्य सीमा का निर्धारण करने के लिए एक राजदूत को चीन भेजा, परंतु सीमा के संबंधमें कोई निर्णय न हो सका। दोनों देशों में युद्ध हुआ। इस युद्ध में फनबेन की विजय हुई। चंपा से प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार संस्कृत में इस राजा का नाम भद्रवर्मन् रहा होगा। भद्रवर्मन् के अनेक अभिलेख मिले हैं। यह शैव मत का अनुयायी था और वेदों का विद्वान् था। इसने शिव का एक विशाल मंदिर बनवाकर उसमें भद्रेश्वर स्वामी शिव की मूर्ति की प्रतिष्ठा कराई थी। भद्रवर्मन् ने राज्य और धर्म दोनों का विस्तार किया । चपाको जीतकर उसने इसे तीन प्रांतों में विभक्त किया-अमरावती, विजय और पांडुरंग
भद्रवर्मन् के बाद अनेक राजाओं के नाम वर्मन् पद से युक्त रहे। यथा शुभवर्मन् सत्यवर्मन, इंद्रवर्मन, हरिवर्मन् और सिंहवर्मन् आदि। ये राजा ब्राह्मण पौराणिक मत को मानते थे। इन्होंने अनेक मंदिरों की रचना कराकर उनमें मूर्तियों की स्थापना कराई। इस दृष्टि से माईसांग और डांगडुआन नगर प्रसिद्ध हैं। इन देशों में शिव, शक्ति, गणेश, स्कंद, विष्णु आदि देवताओं के मंदिर मिलते हैं।
चंपा में बौद्ध धर्म का भी प्रसार हुआ था। वर्तमान समय में भी वहाँ बौद्ध धर्म का प्रचार ही अधिक है। चंपा की राज्यभाषा संस्कृत थी। प्राचीन युग के अनेक संस्कृत-अभिलेख मिले हैं। इनमें शक संवत् का प्रयोग है। एक लेख के अनुसार इंद्रवर्मा तृतीय (911-972 ई.) छ: वैदिक दर्शनों, बौद्ध दर्शन, काशिकावृत्ति सहित पाणिनीय व्याकरण, आख्यान और शैव उत्तरकल्प का महान पंडित था।
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