भारत चीन संबंध - India China relations

भारत चीन संबंध - India China relations


भारतवासियों का चीन से परिचय अति प्राचीन है। 'महाभारत', 'मनुस्मृति, कौटिल्य 'अर्थशास्त्र' आदि ग्रंथों में चीन का नाम आता है। चीन का रेशम बहुत प्रसिद्ध था। महाकवि कालिदास चीनांशुक से परिचित थे। बौद्ध धर्म के प्रसार से पहले भारत और चीन के मध्य अच्छे व्यापारिक संबंध रहे। समुद्र और भूमि के मार्ग से इन देशों में नियमित व्यापार होता था। स्थल-मार्ग, चीन के दक्षिण में युन्नान प्रांत से होकर उत्तरी भारत में आता था। यहाँ से यह मार्ग उत्तरी भारत होकर खैबर घाटी को पार करके अफगानिस्तान होता हुआ पश्चिमी देशों में चला जाता था। जलमार्ग, चीन के पूर्वी समुद्री तट से प्रारंभ होकर भारतवर्ष के पूर्वी तट के बंदरगाहों तक पहुँचता था। चीन से भारत आने वाली वस्तुओं में रेशम, सिंदूर और वंशलोचन प्रमुख थे।


चीन के साथ भारत के राजनयिक संबंध भी प्रसिद्ध हैं। ह्वेनसांग के विवरणों के अनुसार कनिष्क ने एक चीनी राजकुमार को बन्धक के रूप में रखा था। सम्राट् ही (89-105 ई.) के समय में भारत-चीन के मध्य राजदूतों द्वारा उपहारों का आदान-प्रदान हुआ था। राजदूतों तथा उपहारों को भेजने की परंपरा जारी रही। भारतीय लोक कथाओं के अनुसार चीनी सम्राटों तथा सम्राट् विक्रमादित्य के मध्य दौत्य संबंध थे।



बौद्ध धर्म के प्रचार ने चीन-भारत संबंधोंको सुदृढ़ किया। भारतवर्ष से अनेक बौद्ध प्रचारक चीन गये।

सारा ही चीन लगभग बौद्ध हो गया। चीन में एक लोक कथा प्रसिद्ध है कि 45 ई. में हानवंशी चीनी सम्राट् को स्वप्न में एक स्वर्णमय पुरुष दिखाई दिया। सम्राट् ने इस स्वप्न का वर्णन राजसभा में किया। सभासदों ने कहा कि वह पुरुष स्वयं भगवान बुद्ध थे। चीनी सम्राट् ने भारतवर्ष से बौद्ध प्रचारकों को बुलाने के लिए दूत भेजे । यहाँ से धर्मरत्न और कश्यपमातंग नाम के दो बौद्ध भिक्षु चीन गये। वे जीवन-भर वहीं रहे। उन्होंने वहाँ बौद्ध धर्म का प्रचार किया तथा बौद्ध साहित्य का चीनी भाषा में अनुवाद किया।


चीन में भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म के प्रचार के इतिहास में उन चीनी यात्रियों को अविस्मरणीय महत्व दिया जाना चाहिये,

जिन्होंने ज्ञान की पिपासा में महान् कष्ट उठाकर चीन से चलकर पवित्र भूमि भारतवर्ष की यात्रायें कीं। बौद्ध धर्म के प्रसार ने अनेक चीनी धर्मप्रेमियों के अंदर भारत की तीर्थयात्राओं के लिए अभिलाषा उत्पन्न की। इन यात्रियों में तीन यात्री अधिक महत्व रखते हैं। फाहियान, ह्वेनसांग और इत्सिंगा इन यात्रियों के यात्राओं के संस्मरण उपलब्ध होते हैं।


फाहियान चतुर्थ शताब्दी ई. में भारतवर्ष में आया था। उस समय यहाँ गुप्तवंशी राजाओं का शासन था। वह मध्य एशिया के खोतन्न आदि प्रदेशों में घूमता हुआ उत्तर-पश्चिमी भारतवर्ष पहुँचा।

तदनंतर पाटलिपुत्र जाकर वहाँ के विश्वविद्यालय में उसने अध्ययन किया। फाहियान ने पाटलिपुत्र का विशद वर्णन किया है। 414 ई. में जलमार्ग से वह चीन लौटा था। अपने साथ वह प्रचुर साहित्य ले गया। चीन में बौद्ध धर्म के प्रसार का उसको बहुत अधिक श्रेय है।


ह्वेनसांग सम्राट् हर्षवर्धन के शासनकाल में भारतवर्ष आया था। उसने प्रायः सारे भारतवर्ष का भ्रमण करके अनेक विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाई थी। नालंदा विश्वविद्यालय में उसका बहुत अधिक सम्मान हुआ। उसको उपकुलपति के पद से अलंकृत किया गया। वापस जाते समय अपने साथ वह अनेक ग्रंथ ले गया था। इनका उसने चीनी भाषा में अनुवाद किया।


इत्सिंग का भारत आगमन 671 ई. में हुआ था। उसने नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था। अपने साथ वह 400 ग्रंथ चीन ले गया। उसने चीनी-संस्कृत का एक कोष भी बनाया। इत्सिंग के संस्मरणों से विदित होता है कि उस समय भारतवर्ष में चीनी यात्री बहुत अधिक संख्या में आते थे। उसने लिखा है कि 500 वर्ष पहले बीस चीनी बौद्ध भिक्षु वर्मा के मार्ग से भारतवर्ष में आये थे। बंगाल के शासक श्रीगुप्त ने उनके लिए एक मंदिर बनवाया था तथा खर्च के लिए बीस ग्राम दान में दिये थे । इत्सिंग के समय यह मंदिर खंडहर अवस्था में था। इत्सिंग के समकालीन शासक ने कहा है कि वह चीन से आने वाले किसी भी बौद्ध भिक्षु को मंदिर तथा भूमि दी जा सकती है।