भारत ईरान संबंध - India Iran Relations
भारत ईरान संबंध - India Iran Relations
ईरान के प्राचीन धर्म जरदुश्ती का आर्यों के वैदिक धर्म के साथ बहुत अधिक सादृश्य है। जिंद अवेस्ता' के अनेक स्थल 'ऋग्वेद' के मंत्रों के समान हैं। 'जिंद-अवेस्ता' में वर्ण-व्यवस्था के भी संकेत हैं। ईसवी पूर्व छठी शताब्दी में ईरान में हखामनी साम्राज्य के विस्तार ने भारतवर्ष और पश्चिमी एशिया के संबंधोंको सुदृढ़ किया था। व्यापार में भी वृद्धि हुई। ईरान के सम्राट् दारा (डेरियस) ने एक जल- सेनापति स्पाईलैक्स की अधीनता में एक बेड़ा सिंध भेजा।
इसमें ईरान से सिंध नदी के मुहाने तक जल- मार्ग का अन्वेषण किया। इससे व्यापार का विस्तार हुआ। दारा ने सिंध प्रांत के कुछ प्रदेशों को भी जीत लिया था। इसके दो परिणाम हुए। एक तो पश्चिमी भारत में खरोष्ठी लिपि का प्रचार हुआ, दूसरे, ईरानी तथा 'भारतीय भाषाओं का संपर्क हुआ। भारतीय वर्णमाला का स' वर्ण ईरानी में ह उच्चरित होता है। अतः ईरानी लोग सिंधु नदी को हिंदू नदी तथा यहाँ के निवासियों को हिंदू कहने लगे। इसी के अनुकरण पर ग्रीकों ने इस देश को इंडिया कहा।
इतिहास में प्रसिद्ध है कि ईरान की सेना में भारतीय सैनिकों का एक विभाग था। इसने ग्रीकों के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया था।
हेरोडोरस (484 ई. पू.) और हेसियस (418-398 ई. पू.) ने भारत के संबंध में संस्मरण लिखे हैं, जो भारत और ईरान के संबंधोंको बताते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य की सीमायें गंधार और हिरात तक विस्तृत र्थी तथा ईरान को स्पर्श
करती थीं। इस समय यहाँ सेल्यूकस का राज्य था। उस समय ईरानी मूर्तिपूजक थे। उनकी धर्म-पुस्तकें और धार्मिक अनुष्ठान आर्यों से बहुत मिलते-जुलते थे। छठी शताब्दी ई. पू. में ह्वेनसांग ने लिखा है कि भारत देश के सभी नगरों में हिंदू रहते हैं। वे अपने धर्म के अनुसार जीवन-यापन करते हैं।
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