भारत लंका संबंध - India Lanka Relations
भारत लंका संबंध - India Lanka Relations
आधुनिक सीलोन प्राचीन काल में सिंहल या लंका द्वीप के नाम से प्रसिद्ध था। 'रामायण' के अनुसार राम ने रावण को पराजित करके विभीषण को लंका का राजा बनाया था। इस प्रकार वहाँ भारतीय संस्कृति का प्रचार किया था। सिंहल द्वीप के प्राचीन इतिहास का वृत्तांत दीपवंश' और 'महावंश' नाम के ग्रंथों से विदित होता है।
महावंश के अनुसार सिंहल के इतिहास का प्रारंभ राजकुमार विजय से होता है। पहले इस द्वीप में नाग और यक्ष जातियाँ निवास करती थीं। बंग देश के राजा सिंहबाहु ने अपने पुत्र राजकुमार विजय की उद्दण्डताओं के कारण क्रुद्ध होकर उसे देश से निकाल दिया।
अपने सात सौ साथियों के साथ राजकुमार विजय ताम्रलिप्ति बंदरगाह में नौकाओं में आरूढ़ हुआ। वह दक्षिण की ओर चल पड़ा और सिंहल द्वीप के उत्तरी किनारे पर उतरा। इस द्वीप को उसने जीत लिया और पिता के नाम पर इसका नाम सिंहल द्वीप रखा।
राजकुमार विजय ने सिंहल द्वीप में आर्य शासन-पद्धति की स्थापना की। उसने अनेक नगरों- तंबपन्नी, अनुराधगाम, उज्जैनी, उरुबेला आदि को बसाया। विजय के साथ स्त्रियाँ नहीं थीं। उसकी प्रार्थना पर दक्षिण भारत के राजा ने एक हजार परिवारों के साथ अनेक स्त्रियों को सिंहल द्वीप भेजा।
इन युवतियों के साथ विजय और उसके साथियों ने विवाह संबंधस्थापित किये। 'महावंश' के अनुसार विजय सिंहल द्वीप में उस समय पहुँचा था, जिस वर्ष भगवान गौतम बौद्ध का निर्वाण हुआ था। इस प्रकार सिंहल द्वीप में हिंदू राज्य की स्थापना ई. पू. पाँचवीं शताब्दी में हो गई थी।
सिंहल द्वीप के इतिहास में देवानां पियतिस्स या तिस्स कास्थान महत्वपूर्ण है। यह सम्राट अशोक का समकालीन था। तिस्स ने अशोक की सेवा में अनेक उपहार भेजे थे।
अशोक ने उनको स्वीकार करके सिंहल के राजा के लिए पवित्र वस्तुयें भेजीं। कुछ समय बाद अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और राजकुमारी संघमित्रा को बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए सिंहल द्वीप भेजा। सिंहल के राजा और जनता ने बौद्ध धर्म को बड़े उत्साह के साथ स्वीकार किया। बौद्ध धर्म सिंहल का राजधर्म हो गया।
राजा तिस्स ने अनुराधापुर से आठ मील पूर्व की ओर एक विहार बनवाया,
जो राजकुमार महेंद्र का निवास बना। तिस्स के उत्तराधिकारियों ने अनेक भव्य स्तूपों और विहारों का निर्माण कराया। इसमें अनुराधापुर का पीतल का महल बहुत भव्य और विशाल है। इसमें एक हजार कक्ष हैं। यह पत्थर के सोलह सौ खंबों पर टिका है। इसकी छत ताम्र की बनी है।
कालांतर में हजारों बौद्ध भिक्षु निमंत्रित होकर सिंहल द्वीप को जाते रहे। इनके साथ भारतीय शिल्प, साहित्य, कला, नृत्य, संगीत आदि का भी उस द्वीप में प्रवेश हुआ। पालि भाषा का यहाँ बहुत समय तक प्रचार रहा।
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