भारत रोम संबंध - India Rome Relations

भारत रोम संबंध - India Rome Relations


रोमन साम्राज्य के साथ भारतीयों का घनिष्ठ व्यापारिक संबंध रहा। सम्राट् आगस्टस से नीरो तक यह व्यापार खूब बढ़ा (31 ई. पू. से 68 ई. तक)। 25 ई. पू. में आगस्टस ने व्यापार के लिए अपने जहाजी बेड़े को भारत की ओर भेजा। इस समय अदन भारतीय- रोमन व्यापारियों का केंद्र बन गया। पहले भारत से अदन तक जहाज, समुद्र तट के साथ-साथ जाते थे। 45 ईसवी में हिप्पोलस नामक नाविक ने भारतीय महासमुद्र में मानसून वायुओं की खोज की। इनके सहारे जहाज लाल सागर के लोकेसिस बंदरगाह से सीधे भारतवर्ष के पश्चिमी समुद्र-तट तक पहुँच सकते थे। अब इस यात्रा में 40 दिन या इससे भी कम समय लगता था।


इस नये समुद्री मार्ग की खोज ने भारत और रोमन साम्राज्य के मध्य व्यापार को खूब बढ़ाया। भारतीय विलास सामग्रियों की खपत रोमन साम्राज्य में प्रचुर होने लगी। भारत से बारीक वस्त्र, सुगंधियों, प्रसाधन सामग्रियाँ, हीरे, कीमती रत्न, मिर्च-मसाले आदि जाते थे तथा रोम से स्वर्ण के सिक्के आते थे। उस युग के अनेक रोमन सिक्के दक्षिण भारत में मिले हैं। छठी सातवीं शताब्दी ई. तक यह व्यापार खूब चलता रहा। प्लिनी का कथन है कि कोई वर्ष ऐसा नहीं जाता, जबकि रोम साम्राज्य के धन कोष से रोमन सिक्के 10 लाख सेस्टर सेस (लगभग दस लाख पौंड) भारतवर्ष न पहुँच जाते हैं। भारत के साथ रोम के राजनैतिक संबंध भी रहे तथा दूतों का आदान-प्रदान हुआ। आगस्टस


सीजर की राजसभा में पंजाब, गुजरात, चेर, पांड्य और चोल राज्यों के राजदूत गये थे।

कालांतर में भी रोमन सम्राटों के काल में भारतीयों राजदूतावासों का रोम में होना प्रमाणित होता है। 


भारत अरब संबंध अरब देश के साथ भारतीयों का घनिष्ठ संबंधरहा। उधर जाने के दो मार्ग थे। पहला मार्ग था- जल मार्ग से ईरान की खाड़ी जाकर वहाँ से स्थल मार्ग से एपोलोगस, बेबीलोन, सिलीशिया और पेत्रा होकर अरब को पार करके भूमध्यसागर पहुँचा जाता था। दूसरा मार्ग पूरा जल मार्ग था। इससे लाल सागर होकर अरब पहुँचते थे। लाल सागर के मुहाने पर अदन और दूसरे अरबी नगरों में भारतीय बस्तियाँ थीं।


अरबों के साथ भारतीयों के व्यापारिक संबंध तो थे ही, भारतीय शिक्षा और विज्ञान भी वहाँ पहुँचे।

अरबी यात्री भारत में आते थे और यहाँ के विद्वान् वहाँ जाते थे। अरब विद्वान् अलबरूनी ने अपनी भारत यात्रा के विस्तृत संस्मरण लिखे हैं। अरब लेखकों पर और वहाँ के साहित्य पर भारतीय प्रभाव स्पष्ट हैं। पंचतंत्र की कथायें वहाँ खूब लोकप्रिय हुई।


अरबों ने भारतीय चिकित्सा विज्ञान का विशेष रूप से अध्ययन किया था। प्रसिद्ध भारतीय चिकित्सक चरक को अरबी साहित्य में जरक या सियक नाम से उद्धृत किया गया है। बगदाद के खलीफा हारू - उल रशीद की सेवा में दो भारतीय वैद्य थे। रेखागणित,

बीजगणित और अंय ज्ञान-विज्ञान भी भारत से अरब पहुँचे। वहाँ से इन भारतीय विद्याओं का प्रचार यूरोप में हुआ।


भारतीय धर्म का अरब के धर्म पर प्रभाव भी सिद्ध किया गया है। इस्लाम के अभ्युदय से पूर्व अरब में, भारतवर्ष के समान ही मूर्ति-पूजा का प्रचार था। इस्लाम धर्म पर भी भारतीय प्रभाव अवश्य है। उनका एकेश्वरवाद भारतीय उपनिषदों से प्रभावित है। पं. गंगाप्रसाद ने अपने ग्रंथ धर्म का आदि स्रोत' में सिद्ध किया है कि इस्लाम धर्म पर यहूदी धर्म का प्रभाव था। यहूदी धर्म पर जरदुश्ती (पारसी धर्म का प्रभाव था। जरदुश्ती धर्म निश्चित रूप से वैदिक धर्म से प्रभावित है।