भारत-तिब्बत संबंध - Indo-Tibetan Relations
भारत-तिब्बत संबंध - Indo-Tibetan Relations
तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रसार सातवीं शताब्दी में हुआ था। कहा जाता है कि तिब्बती शासक स्ट्रांग-सैन-गेंपो (630-640 ई.) ने चीन और नेपाल की राजकुमारियों से विवाह किये थे। ये दोनों बौद्ध थीं। नेपाल की राजकुमारी अपने साथ एक बुद्ध मूर्ति लाई थी। पत्नियों के प्रभाव में आकर स्ट्रांग सैन- गैम्पो ने बौद्ध धर्म स्वीकार लिया। उसने एक बौद्ध मंदिर बनवाया तथा उसमें भगवान बुद्ध की मूर्ति की प्रतिष्ठा की। तदनंतर उसने अपने मंत्री सम्भोत को काश्मीर भेजा। संभोत ने वहाँ संस्कृत भाषा का अध्ययन किया। तिब्बत लौटकर उसने संस्कृत के आधार पर तिब्बती लिपि का अविर्भाव किया। इसके बाद उसने तिब्बती भाषा का व्याकरण बनाया।
आठवीं शताब्दी में संभव नाम का एक बौद्ध विद्वान् तिब्बत पहुँचा। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार करके लामा मत की स्थापना की और इस प्रकार बौद्ध धर्म को तिब्बती रूप दिया।
नवीं शताब्दी ई. में नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य शांतरक्षित तिब्बत गये। उन्होंने वहाँ बौद्ध मत को एक नया रूप दिया। उनके समय में तिब्बत में बौद्ध धर्म का बहुत अधिक प्रचार हुआ। उनके प्रोत्साहन से अनेक भारतीय ग्रंथों के तिब्बती भाषा में अनुवाद हुए।
(के तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए आचार्य दीपंकर का नाम बहुत प्रसिद्ध है। वे विक्रमशील विश्वविद्यालय के कुलपति थे। बहुत आग्रह करने पर वे तिब्बत गये। उन्होंने वहाँ तेरह वर्षों तक बौद्ध धर्म का प्रचार किया। इसके बाद भी अनेक भारतीय धर्म-प्रचारक, तिब्बत जाकर धर्मप्रचार और साहित्य की साधना करते रहे। तिब्बत के धर्म, भाषा और लिपि पर भारतीय प्रभाव स्पष्ट है।
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