सिंधु घाटी की सभ्यता - नगर योजना का प्रारूप - Indus Valley Civilization - Draft Town Plan

सिंधु घाटी की सभ्यता - नगर योजना का प्रारूप - Indus Valley Civilization - Draft Town Plan


सिंधु सभ्यता के सभी नगर मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, चन्हुदड़ो, आदि नदियों के तटों पर स्थित थे। अतः इनके नगर योजना की आधार सामग्री मोहनजोदड़ो, हड़प्पा एवं अन्य स्थानों से प्राप्त होती है। हड़प्पा रावी तट पर स्थित था, यद्यपि आज वह उससे 6 मील दक्षिण की ओर बसा हुआ है। किसी समय मोहनजोदड़ो सिंधु नदी के तट पर स्थित था, आज सिंधु नदी से साढ़े तीन मील दूरी पर है। पुरातत्ववेत्ताओं के मतानुसार इन नगरों के विनाश में भी कदाचित् नदी का योगदान रहा होगा।


इस काल के प्रायः समस्त बड़े-बड़े नगरों का निर्माण एक निश्चित व्यवस्था के आधार पर हुआ था। इस योजना का आधार नगर की प्रमुख सड़कें पूर्व से पश्चिम की ओर और उत्तर से दक्षिण की ओर जाती थीं।

इस प्रकार प्रत्येक नगर कई खंडों में विभक्त हो जाता था। ये खंड मोहल्ले के रूप में हो जाते थे। सड़कें प्रायः सीधी होती थीं और एक दूसरे को समकोण पर काटती हुई आगे बढ़ती थीं। मोहनजोदड़ो में प्रधान सड़क तैंतीस फीट चौड़ी है और यह नगर के ठीक बीच में उत्तर से दक्षिण की ओर चली गई है। इस सड़क के समानांतर जो अन्य अनेक सड़कें हैं, वे भी चौड़ाई में बहुत पर्याप्त हैं। ये सारी सड़कें मिट्टी की बनी थीं, इनकी सफाई का बड़ा ध्यान दिया जाता था। इन पर स्थान-स्थान पर कूड़ा-करकट एकत्र करने के लिए मिट्टी के पात्र और पीपे रखे जाते थे। सड़कों के किनारे स्थान-स्थान पर गढ्ढे खोदे जाते थे, जिनमें कूड़ा-करकट इकट्ठा करने की व्यवस्था रहती थी। मोहनजोदड़ो की एक सड़क के दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे चबूतरे बने हुए मिले हैं, संभवतः दुकानदार इन पर बैठकर अपनी वस्तुओं का विक्रय करते थे।



नगर योजना


नालियाँ - सिंधु सभ्यता के सभी नगरों में गंदे पानी को नालियों द्वारा बाहर ले जाने का उत्तम प्रबंध था। प्रायः प्रत्येक सड़क और गली के दोनों ओर पक्की नालियाँ बनाई गई थीं। चौड़ी नालियों के लिए कहीं- कहीं बड़ी-बड़ी ईटें अथवा पत्थरों का प्रयोग किया जाता था। नालियों की जुड़ाई और प्लास्टर में मिट्टी, चूने तथा जिप्सम का प्रयोग मिलता है। मकानों से आने वाली नालियाँ सड़कों की नालियों में मिल जाती थीं। इस सुयोजना के अनुसार घरों, गलियों और सड़कों का गंदा पानी नगर से बाहर निकाल दिया जाता था। नालियों को ढकने की भी व्यवस्था थी, अधिक चौड़ी नालियों को ढकने के लिए पत्थर की शिलाएँ प्रयुक्त की जाती थीं।

इसमें संदेह नहीं कि गंदे पानी की निकासी के लिए समुचित व्यवस्था थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि मकानों के गंदे पानी को शहर के बाहर ले जाने की जो उत्तम व्यवस्था सिंधु सभ्यता के नगरों में विद्यमान थी, वह प्राचीन संसार के अन्य किसी नगर में नहीं पाई जाती थी।


भवन - सिंधु सभ्यता के उत्खनन में छोटे-बड़े सभी प्रकार के भवनों के ध्वंसावशेष मिले हैं। प्रायः सभी भवनों का निर्माण नींव डाल कर होता था। ये नीवें प्रायः कच्ची अथवा टूटी-फूटी ईटों से भरी जाती थीं। सीलन और बाढ़ से रक्षा करने के लिए कभी-कभी मकान ऊँचे-ऊँचे चबूतरों पर बनाए जाते थे।

मकान की दीवार कभी धूप में सुखाई गई कच्ची ईंटों की कभी आग में तपाई हुई पक्की ईटों की और कभी पुराने मकानों से निकाली हुई पुरानी ईटों से बनाई जाती थी। दुमंजिला मकानों की नीवें अधिक गहरी और पहली मंजिल की दीवारें अधिक चौड़ी बनाई जाती थीं, जिससे वे अपने ऊपर का भार सुगमतापूर्वक उठा सकें। मकानों पर प्लास्टर अधिकतर मिट्टी का, परंतु कभी-कभी जिप्सम का भी होता था। छतों के ऊपर का पानी निकालने के लिए मिट्टी अथवा लकड़ी के परनाले बने होते थे।


इस काल के प्रत्येक अच्छे घर में आँगन, पाठशाला, स्नानागार, शौचगृह एवं कुएँ की व्यवस्था रहती थी। भोजन लकड़ी से जलने वाली अँगीठियों, चूल्हों अथवा भट्ठियों में बनता था।

स्नानागार सड़क अथवा गलियों के निकट वाले भाग में बनाए जाते थे, जिससे कि नालियों द्वारा उनका पानी सरलतापूर्वक सड़क की नालियों तक पहुँचाया जा सके। स्नानागारों की फर्शे पक्की ईंटों से पटी होती थीं।


हड़प्पा सभ्यता के इन नगरों में पानी के लिए कुएँ विद्यमान थे। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के भग्नावशेषों में बहुत से कुएँ मिले हैं, जो चौड़ाई में 2 फीट से लेकर 7 फीट तक हैं। पानी रस्सी की सहायता से निकाला जाता था, इन कुओं के किनारे पर रस्सी के निशान अब तक विद्यमान हैं। पानी निकालने के लिए कुछ कुओं पर घिरनी भी लगी रहती थी।


मोहनजोदड़ो में छोटे एवं बड़े दोनों प्रकार के मकान बनाए जाते थे।

इस युग में छत बनाने की यह पद्धति थी कि पहले शहतीरें डाली जाती थीं, फिर उन पर बल्लियाँ डालकर एक मजबूत चटाई बिछा दी जाती थी। उसके ऊपर मिट्टी बिठाकर उसे भली-भाँति कूटकर पक्का कर दिया जाता था। कमरों के दरवाजे अनेक प्रकार के होते थे। कमरों में दीवारों के साथ अलमारियाँ बनाने की भी प्रथा थी। इस सभ्यता के प्रायः सभी नगरों के दरवाजे और खिड़कियाँ मुख्य सड़कों की ओर न होकर गलियों की ओर ही होते थे। इस योजना से नगर की मुख्य सड़कें निश्चित रूप से सूनी रहती होंगी। नगर के भवन अपनी सादगी के लिए प्रसिद्ध हैं।


मुख्य इमारतें - हड़प्पा में एक दुर्ग के ध्वंसावशेष मिले हैं।

यह पश्चिमी टीले पर थी और नगर नीचे पूर्वी टीले पर था। उत्तर से दक्षिण की ओर की लंबाई लगभग 460 गज और पूर्व से पश्चिम की ओर की चौड़ाई लगभग 215 गज थी। यह लगभग समानांतर चतुर्भुज के आकार की थी। दुर्ग का भीतरी भाग कच्ची ईटों द्वारा 20-25 फीट ऊँचा किया गया था। ऐसा बाढ़ से रक्षा करने के लिए किया गया होगा। दुर्ग पर स्थान- स्थान पर प्रहरियों एवं रक्षकों के लिए मीनारों और फाटकों का निर्माण किया गया था।


दुर्ग के समीप ही भंडारागारों का निर्माण किया गया था। ये 6-6 की दो पंक्तियों में प्राप्त हुए हैं। इनका मुख्य प्रवेशद्वार नदी की ओर था, ऐसा संभवतः सामग्री के आने-ले जाने के लिए किया गया होगा।

कदाचित् ये भंडारागार राजकीय होंगे एवं राज्य की तरफ से ही अन्नादि का यहाँ संग्रह किया जाता होगा। आवश्यकता पड़ने पर जनता में वितरण किया जाता होगा। इन भंडारागारों के निकट अनेक गोलाकार चबूतरे मिले हैं। इन अवशेषों से प्रकट होता है कि उन सबका निर्माण राजकीय योजना द्वारा किया गया होगा।


मोहनजोदड़ो में भी एक दुर्ग के ध्वंसावशेष प्राप्त हुए हैं, जिसका निर्माण कृत्रिम पहाड़ी पर किया गया था। यहाँ भी दुर्ग का निर्माण किया गया होगा, ऐसा अनुमान है।

महास्नानागार - यहाँ सबसे महत्वपूर्ण इमारत प्राप्त हुई है एक स्नानकुंड। यह 39 फीट लंबा, 23 फीट चौड़ा एवं 8 फीट गहरा है। इस स्नानकुंड में जाने के लिए दक्षिण और उत्तर की ओर ईटों की सीढ़ियाँ बनी हैं। यह जलाशय पक्की ईंटों से बना है एवं इसकी दीवारें बहुत मजबूत हैं। इस कुंड की फर्श पर खड़ी ईटें लगाई गई हैं और वे भी भली-भाँति काट-काट कर, जिससे कि बीच में दरार न रहे। फर्श की ढाल दक्षिण-पश्चिम की ओर है, पानी निकासी की भी सुदृढ़ व्यवस्था है। कदाचित् ऐसा कुंड की सफाई के लिए किया जाता होगा।

इसके चारों तरफ बरामदे बने थे, जिनकी चौड़ाई लगभग 15 फीट थी। कुंड के उत्तर की ओर कुछ छोटे-छोटे कमरे बने थे। इन कमरों में भी छोटी-छोटी नालियाँ बनी थीं। वे नालियाँ बाहर की बड़ी नालियों में मिलती थीं। कमरों के समीप सीढ़ियाँ भी थीं। विद्वानों के मतानुसार ऊपर की मंजिल पर बने हुए कमरों में पुजारी रहते थे जो शुभ मुहुर्तों पर कुंड में स्नान करते थे। कदाचित् जनसाधारण कुंड में ही स्नान करता था। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान हिंदू धर्म के समान सिंधु- प्रदेश के धर्म में भी पवित्र स्नानों का महत्व था।


भंडारागार - इस स्नानकुंड के पश्चिम में खुदाई करने से एक अन्य भवन का ध्वंसावशेष प्राप्त हुआ है,

जोकि इतिहासकारों के मतानुसार एक विशाल भंडारागार था। इसकी दीवारें सुदृढ़ थीं एवं इसके दक्षिण की ओर एक पीठिका थी। संभवतः राज्य की ओर से वसूल किया जाने वाला अन्न यहाँ पर संग्रहीत किया जाता होगा। स्नानकुंड के उत्तर-पूर्व में एक अन्य भवन के ध्वंसावशेष मिले हैं, इसमें कई बरामदे, कई कमरे और कई स्नानागार थे । इतिहास के विद्वानों के अनुसार इस भवन में कोई उच्च अधिकारी रहता था ।


स्नानकुंड के समीप ही एक अन्य भवन के ध्वंसावशेष मिले हैं। यह भवन 80 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा था। इसकी छत स्तंभों पर टिकी थी। ऐसा प्रतीत होता है

कि यह भवन किसी सामूहिक कार्य के लिए बना था।


अन्य कलाएँ - सिंधुप्रदेश के अन्वेषण में अनेक मुद्राएँ, ताबीजें, मूर्तियाँ, खिलौने, गुड़ियाँ, आभूषण, बर्तन आदि प्राप्त हुए हैं। इन सभी वस्तुओं का निर्माण साधारण मिट्टी, चिकनी मिट्टी, काली मिट्टी, साधारण पत्थर, लाल पत्थर, चूना पत्थर, सेलखड़ी पत्थर, स्फटिक, सीप, हाथी दाँत, हड्डी, सोना-चाँदी, पीतल, ताँबा, सीसा आदि द्वारा किया जाता था।


मिट्टी के बर्तन, मुद्राएँ, मूर्तियाँ बहुतायत से प्राप्त हुई हैं,

जिससे प्रतीत होता है कि कुंभकारों का व्यवसाय व्यवस्थित था। उनके अनेक भट्टे भी प्राप्त हुए हैं। बर्तनों को पकाए जाने के कारण उनमें हल्का या गहरा लाल-नीला रंग आ गया है। इसके अतिरिक्त ऊपर से भी बर्तनों को रंगने की प्रथा थी। बर्तनों के ऊपर अनेक प्रकार का अलंकरण भी मिलता है, जिसमें मुख्य रूप से वृक्षों, पुष्पों पत्तियों, जानवरों एवं मानव की आकृतियाँ रहती थीं। सिंधु सभ्यता में अनेक प्रकार के बर्तन भी प्राप्त हुए हैं।


सिंधु सभ्यता में प्राप्त मुद्राएँ चीनी मिट्टी अथवा साबूत पत्थर की बनी हुई प्राप्त हुई हैं।

मुद्राओं के साथ बहुसंख्यक छापें भी मिली हैं। ये मुख्यतः हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हुदड़ो, लोथल जैसे व्यापारिक नगरों में ही मिलती हैं। कुछ मुद्राएँ कलात्मक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। सिंधु प्रदेश में प्राप्त पशुओं से घिरे हुए योगीश्वर शंकर की मुद्रा मिट्टी की है। हड़प्पा से प्राप्त एक मुद्रा में अग्रभाग में एक व्यक्ति बैठा है, जो बाघ पर आक्रमण कर रहा है। इस दृश्य के नीचे एक योगस्थ व्यक्ति का दृश्य है। उसके समीप कई पशुओं का चित्र अंकित है।


मिट्टी की अन्य प्रकार की मुद्राएँ भी प्राप्त हुई हैं, जिन पर चित्र अंकित हैं।

अन्वेषण में देवी, देवताओं, देवदासियों, नर्तकियों, पशुओं आदि की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त सिंधु प्रदेश में मिट्टी द्वारा निर्मित लिंग और योनियाँ मिली हैं, जिनकी पूजा होती थी। मिट्टी की बनी मूर्तियों में स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी, खिलौने सम्मिलित हैं। जानवरों की मूर्तियों में सर्वाधिक संख्या बैल की प्राप्त हुई है। मिट्टी के बने कुछ बंदर भी प्राप्त हुए हैं।


पाषाण निर्मित वस्तुओं की संख्या कम है। पाषाण मूर्तियों में सबसे अधिक महत्व की वह मूर्ति है, जो कमर के नीचे से टूटी हुई है। यह केवल 7 इंच ऊँची है। इस मूर्ति में मनुष्य को एक ऐसा चोगा पहने हुए दिखाया गया है,

जो बाएँ कँधे के ऊपर और दाईं भुजा के नीचे से गया है। मूर्ति आँखे बंद व ध्यानमग्न दिखाई गई है। पुरुष की मूँछे मुड़ी हुई हैं, यद्यपि दादी विद्यामान है। मूर्ति की ध्यान मुद्रा से प्रतीत होता है कि इसे योगदशा में बनाया गया है। इस बात से प्रायः सभी सहमत हैं कि सिंधु सभ्यता की यह मूर्ति किसी देवता की है। एक लाल पत्थर की बनी मूर्ति भी प्राप्त हुई है। दुर्भाग्य से इसका शीश खंडित हो चुका है, परंतु शेष शरीर का अनुपात दर्शनीय है। एक अन्य काले पत्थर की मूर्ति प्राप्त हुई है, जिसमें नर्तक नाचने की मुद्रा में अपने बाएँ पैर को पृथ्वी से कुछ ऊपर उठाए है।


विभिन्न धातुओं की कलाकृतियाँ भी खुदाई में प्राप्त हुई हैं। मोहनजोदड़ो में एक कूबड़दार बैल का खिलौना मिला है। यह ताँबे की धातु काटकर बनाया गया था। ताँबे और पीतल के बने हुए कुत्ते भी मिले हैं। मोहनजोदड़ो में पीतल की बनी हुई नर्तकियाँ मिली हैं। अधिकतर वे हाथ में कड़े और गले में हँसुली पहने हुए मिली हैं।


काँस्य मूर्तियों में मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह मूर्ति इतनी सुंदर है कि वह बिल्कुल सजीव प्रतीत होती हैं।

इसका शरीर दुबला-पतला है और यह नृत्यमुद्रा में हैं। सिर के केशों का प्रसाधन मूर्ति में बहुत ही सुंदर रूप से प्रदर्शित किया गया है।


सिंधु प्रदेश गुड़िया निर्माण के लिए प्रसिद्ध था। सोने-चाँदी, मिट्टी, पत्थर, हाथी दाँत, घोंघा आदि की भी गुड़िया अर्थात् मनका प्राप्त हुए हैं। इन गुड़ियों को विविध आभूषणों में डालकर उनकी शोभा बढ़ाई जाती थी। इन गुड़ियों में रंग, धातु अथवा पत्थर के टुकड़े जड़ने का प्रचलन था। ये गुड़ियाँ अनेक आकार और नाप की होती थीं। इस काल में गुड़ियाँ निर्माण के क्षेत्र में जितनी उन्नति हुई थी वह तत्कालीन अन्य स्थानों में देखने को नहीं मिलती है।