सिंधु घाटी की सभ्यता - हड़प्पा और मोहनजोदड़ों - Indus Valley Civilization - Harappa and Mohenjodaro
सिंधु घाटी की सभ्यता - हड़प्पा और मोहनजोदड़ों - Indus Valley Civilization - Harappa and Mohenjodaro
काल निर्धारण
सिंधु सभ्यता से प्राप्त प्राचीन सामानों में ताँबे और पत्थर के बने सामानों की मात्रा बहुत ज्यादा रहने के कारण इसे ताम्र पाषाणकालीन सभ्यता भी कहा जाता है। विद्वान सिंधु घाटी की सभ्यता का काल लगभग 3250 ई.पू. से 2750 ई.पू. तक मानते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सिंधु सभ्यता का कालानुक्रम रेडियोकार्बन तिथियों पर आधारित है। इनके आधार पर सिंधु सभ्यता का काल ई.पू. 2300 से 1750 ई.पू. तक का संकेत मिलता है। संशोधित रूप से इसका काल ई. पू. 2800/2900-2000 होता है। संभवतः यह सभ्यता अपने परिधीय स्थलों पर कुछ बाद के काल में भी विद्यमान थी। आधुनिक अनुसंधानों से भी इस तिथिक्रम की पुष्टि होती है। ईसा पूर्व 2800/2900-2000 की कालावधि को ही सिंधु सभ्यता का आधुनिक तिथि निर्धारण मान सकते हैं।
सभ्यता का नाम एवं खोज
'सिंधु सभ्यता', 'सिंधु घाटी की सभ्यता' और 'हड़प्पा सभ्यता' ये तीनों पर्यायवाची नाम साधारण तौर पर इसी सभ्यता के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इनमें से प्रत्येक शब्द की एक विशिष्ट पृष्ठभूमि है। 1921 से पहले यही माना जाता था कि आर्यों के समय से ही भारतीय सभ्यता की कहानी शुरू होती है। प्रारंभ में 1921 में आधुनिक पंजाब के पश्चिमी भाग में स्थित हड़प्पा नामक स्थान से इस प्राचीन सभ्यता की जानकारी प्राप्त हुई और अगले ही वर्ष एक अन्य प्रमुख स्थल मोहनजोदड़ो की खोज हुई, तब यह सोचा गया कि इस सभ्यता का प्रसार सिंधु घाटी तक था। अतः इस सभ्यता का संकेत देने के लिए 'सिंधु घाटी की सभ्यता' शब्दावली का प्रयोग प्रारंभ हुआ,
परंतु आगे चल कर अनुसंधान से यह प्रमाणित हो गया कि यह सभ्यता सिंधु घाटी तक ही नहीं, बल्कि इस घाटी की सीमाओं से पार भी दूर-दूर तक फैली थी। इसका विस्तार आधुनिक राजस्थान, हरियाणा, पूर्व पंजाब और गुजरात तक पाया गया। इस भौगोलिक विस्तार को देखते हुए ऐसा प्रतीत होने लगा कि इसे केवल सिंधु घाटी की सभ्यता कहना पर्याप्त नहीं। तब इसके लिए हड़प्पा सभ्यता' का प्रयोग किया गया। हड़प्पा एक स्थान का नाम है, जो आधुनिक पंजाब में रावी नदी के बाएँ तट पर स्थित है। हड़प्पा नामक स्थल में ही सबसे पहले इस सभ्यता की जानकारी मिली। अतः इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता रख दिया गया।
भारत की जिस प्राचीनतम सभ्यता के मूर्त अवशेष इस समय उपलब्ध हैं,
उसे इतिहासकारों ने 'सिंधु घाटी की सभ्यता' का नाम दिया है। इस सभ्यता के काल के संबंध में अभी विद्वानों में एकमत नहीं हो सका है, परंतु इस बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि यह सभ्यता ईसवी सन् के प्रारंभ से तीन हजार साल के लगभग पुरानी है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के प्रधान नगर थे। 1924 में भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने सिंधु घाटी की नई सभ्यता की खोज की घोषणा की। सर्वप्रथम उत्खनन 1921 में माधो स्वरूप वत्स और दयाराम साहनी ने हड़प्पा में किया था, जिससे ये जानकारी मिली कि ईसा से कई हजार वर्ष पूर्व हड़प्पा का नगर एक उच्चकोटि की सभ्यता का केंद्र था। कालांतर में उत्खनन से स्पष्ट हुआ कि हड़प्पा की भाँति मोहनजोदड़ो भी उसी प्राचीन सभ्यता का एक उच्च केंद्र था।
1925 ई. में अर्नेस्ट मैके ने मोहनजोदड़ो से 80 मील दक्षिण-पश्चिम में चन्हुदड़ो नामक एक अन्य नगर में खुदाई की। इस प्रदेश में अन्य अनुसंधानकर्ताओं के भी उल्लेखनीय योगदान हैं, जिनमें प्रमुख हैं एन. जी. मजुमदार, सर आरियल स्टीन (Sir Aurel Stein), मोर्टिमर व्हीलर (Mortimer Wheeler)। इन सबके अनुसंधानों से सिंधु सभ्यता के विषय में महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती हैं।
जब हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में खुदाई की गई और दोनों स्थानों पर एक जैसी ही वस्तुएँ प्राप्त हुई, तो विद्वानों ने इसे सिंधु सभ्यता का नाम दिया, क्योंकि ये क्षेत्र सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में आते हैं।
सभ्यता का विस्तार
सिंधु सभ्यता का विस्तार केवल सिंधु घाटी तक सीमित न होकर इसका क्षेत्र और अधिक विस्तृत था। आधुनिक भौगोलिक नामों में इस क्षेत्र के अंतर्गत बलूचिस्तान, उत्तरी-पश्चिमी सीमाप्रांत, पंजाब, सिंध, काठियावाड़ का अधिकांश भाग राजपूताना और गंगाघाटी का उत्तरी भाग समाविष्ट था। विद्वानों के अनुसार सिंधु-सभ्यता के अंतर्गत इस सुविशाल प्रदेश का शासन दो राजधानियों के द्वारा होता था। पंजाब में स्थित हड़प्पा उत्तर प्रदेश की राजधानी थी और सिंधु में स्थित मोहनजोदड़ो दक्षिण प्रदेश की राजधानी थी।
मोहनजोदड़ो - यह नगर सिंध के लरकाना जिले में स्थित था।
यह लगभग एक वर्ग मील में फैला हुआ था। योजना की सुविधा के लिए इसे पूर्वी और पश्चिमी दो भागों में बाँटा गया था। पूर्वी खंड की अपेक्षा पश्चिमी खंड छोटा है, इसे चबूतरा बना कर ऊँचा उठाया गया है। चबूतरा गारे और कच्ची ईटों से बना है, इसके चारों ओर किलेबंदी की दीवारें बनी हैं। इसमें मीनारें एवं बुर्ज भी बने हैं। पश्चिमी खंड में अनेक सार्वजनिक भवनों की जानकारी मिलती है। इन भवनों से वहाँ की समृद्धि की जानकारी मिलती है। मोहनजोदड़ो में एक ऐसे भवन का अवशेष मिला है, जो खंभे के सहारे खड़ा है। उत्खनन से यहाँ कई छोटे- छोटे मकानों के अवशेष भी मिले हैं। इसी खंड में एक बहुत बड़ा तालाब भी मिला है। इस विशाल तालाब की व्याख्या औपचारिक स्नानागार के रूप में की गई है।
मोहनजोदड़ो के पश्चिमी हिस्से की तुलना में पूर्वी खंड बड़ा है। यह खंड भी चारों तरफ से दीवार से घिरा था।
यहाँ अलग-अलग घर अलग-अलग चबूतरे पर बने थे। चबूतरे का इस्तेमाल शायद सुरक्षा के दृष्टिकोण से होता था। चबूतरे के कारण मोहनजोदड़ो का पश्चिमी भाग अधिक ऊँचे पर बसा था और पूर्वी खंड कम ऊँचा था।
हड़प्पा – यह स्थान आधुनिक पाकिस्तान - पंजाब में रावी नदी के बाई ओर स्थित था। मोहनजोदड़ो के समान हड़प्पा शहर भी योजना के दृष्टिकोण से दो भागों में बँटा था। पहला खंड शहर के पूर्वी भाग में स्थित था तथा दूसरा भाग पश्चिम में पश्चिमी खंड चारों तरफ से दीवारों से घिरा था एवं ऊँचे चबूतरे पर स्थित था। इस खंड में आने और जाने के लिए कई मार्ग बने हुए थे। इसका मुख्य मार्ग उत्तर में खुलता था, जिससे कुछ दूरी पर ही रावी नदी थी।
चन्हुदड़ो- — यह सिंध प्रांत में स्थित है। प्राचीन काल में यहाँ से सिंधु नदी बहती थी, यद्यपि आज उससे दूर हो गई है।
कालीबंगा - इस स्थान के भी दो खंड थे। पश्चिमी खंड को पश्चिमी टीला भी कहा जाता था, इस भाग में भी किलेबंदी थी, लेकिन यह किलेबंदी दो भागों में बँटी थी। इन दोनों भागों में आपस में संबंध था ।
लोथल – सिंधु क्षेत्र की एक प्रमुख बस्ती लोथल भी थी। यह आधुनिक गुजरात में स्थित थी । प्राचीन काल में यह साबरमती और भोगावस (Bhagavo) नदियों के संगम पर स्थित था।
ऐसा ज्ञात होता है कि हड़प्पा सभ्यता का यह एक बंदरगाह था। यह भी एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था। ऐसा घेरा संभवतः नगर को बाहर से सुरक्षित रखने के लिए किया गया था। शहर का दक्षिण-पूर्व भाग एक बड़े चबूतरे के समान हैं, जो लगभग चार मीटर ऊँचा है। इस चबूतरे के ऊपर छोटे चबूतरों की कई कतारें हैं, जिनके बीच से संकीर्ण रास्ते गुज़रते हैं। यहाँ आवास क्षेत्र के बाहर एक कब्रिस्तान भी मिला है।
सुरकोटदा – यहाँ केवल एक ही टीला मिला है। कालीबंगा के समान यह भाग भी चहारदीवारी से घिरा था। दो अलग-अलग चहारदीवारी मिली हैं,
जो आपस में एक दूसरे से जुड़ी हैं। कालीबंगा के पश्चिमी टीले की योजना की पुनरावृत्ति ही यहाँ दिखाई देती है।
बनावली - प्राचीन काल में यहाँ सरस्वती नदी बहती थी। इस स्थान की योजना सुरकोटदा तथा कालीबंगा के पश्चिमी टीले से मिलती-जुलती है। यहाँ भी दो किलेबंदियाँ थीं, जो आपस में एक-दूसरे से मिली हुई थीं। एक भाग में विशिष्ट वर्ग के लोग रहते थे तथा दूसरी चहारदीवारी में पूजापाठ का कार्य संपन्न किया जाता था।
रोपड़ - सतलज नदी पर स्थित इस स्थान पर सिंधु सभ्यता की अति महत्वपूर्ण सामग्री प्राप्त हुई है। पत्थरों और मिट्टी से यहाँ के मकान बने थे। यहाँ एक कब्रिस्तान भी मिला है।
रंगपुर — यह स्थान लोथल से केवल 50 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। यहाँ से पूर्व सिंधु सभ्यता के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। यहाँ प्राप्त कच्ची ईंटों के दुर्ग, नालियाँ, मृद्रांड, बाट, पत्थर के फलक, मिट्टी के भांड आदि उल्लेखनीय हैं।
आलमगीरपुर – यह उत्तरप्रदेश में मेरठ के निकट हिण्डन नदी के तट पर स्थित है। यहाँ से जो सामग्री मिली है वह सिंधु सभ्यता के अवनति काल की है। इसमें मिट्टी के बर्तन, मनके और मुहरें सम्मिलित हैं।
सिंधु सभ्यता के निवासी एवं निर्माता
सिंधु सभ्यता के निवासी एवं निर्माता के बारे में विद्वानों में एकमत नहीं है।
कुछ इतिहासकारों ने इस सभ्यता को आर्येत्तर सभ्यता कहा है तथा कुछ दूसरे विद्वानों ने द्रविड़ सभ्यता। सिंधु सभ्यता की तुलना आर्यों से करने पर मुख्य प्रश्न उठता है कि आर्य लोग घोड़े एवं लोहे से परिचित थे जबकि सिंधु वासी इनसे अनभिज्ञा सिंधु सभ्यता नगरीय थी, जबकि आर्यों का जीवन ग्रामीण व्यवस्था पर आधारित था। धार्मिक प्रचलनों में भी इन दो सभ्यताओं में काफी अंतर प्रतीत होता है। इन सभी आधारों पर सिंधु सभ्यता एवं वैदिक सभ्यता में काफी अंतर प्राप्त होता है। विद्वानों के अनुसार सिंधु सभ्यता एवं मेसोपोटामिया की सभ्यता के बीच व्यापारिक संबंध था। अधिकांश विद्वान सिंधु लोगों को द्रविड़ ही मानते हैं। यह सबसे अधिक मान्य मत है। कुछ विद्वान इस सभ्यता के वासियों का संबंध मंगोलों से भी जोड़ते हैं, किंतु यह तथ्य भी पूरी तरह से मान्य नहीं है। उपर्युक्त अनेक मतों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिंधु क्षेत्र में विभिन्न क्षेत्रों के लोग रहते थे और उनके सम्मिलित प्रयास के फलस्वरूप इस महान सभ्यता का विकास हुआ।
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