सिंधु घाटी की सभ्यता - धार्मिक जीवन - Indus Valley Civilization - Religious Life

 सिंधु घाटी की सभ्यता - धार्मिक जीवन - Indus Valley Civilization - Religious Life


सिंधु सभ्यता में धर्म काफी विकसित था। सिंधुवासी बहुदेववादी होते हुए भी एक ईश्वरीय सत्ता से परिचित थे।


शिव - परमपुरुष की उपासना सैंधव सभ्यता के उत्खनन में ऐसी अनेक पुरुषाकृतियाँ मिली हैं, जिन्हें विद्वानों ने आधुनिक शिव पशुपति का पूर्व रूप माना है। पहली मूर्ति एक योगी की है। यह योगी निर्वस्त्र है और योग मुद्रा में आसीन है। इस योगी के तीन मुख हैं, शीश पर त्रिशूल समान कोई वस्तु है। इसके आस- पास गैंडा, भैंसा, हाथी, बाघ तथा हिरन का अंकन है। इस मूर्ति की विशेषताएँ आधुनिक शिव के पशुपति रूप से साम्य रखती हैं।


एक अन्य मुद्रा में योगासीन एक व्यक्ति का चित्र अंकित है।

उनके दोनों ओर एक-एक नाग तथा सामने दो नाग बैठे हैं। विद्वानों के अनुसार यह योगी का चित्र भी शिव का ही है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक अन्य मुहर पर पत्तियों का वस्त्र पहने और हाथों में धनुष-बाण लिए एक पुरुष की आखेटक आकृति अंकित है। इसे विद्वानों ने शिव का किरात रूप माना है। हड़प्पा से एक मूर्ति नृत्य मुद्रा में प्राप्त हुई है। इसका बायाँ पैर पृथ्वी पर टिका हुआ है तथा दायाँ ऊपर उठकर मिलता है। इसे विद्वानों ने शिव के तांडव रूप से समीकृत किया है। ये सभी अवशेष इस तथ्य के द्योतक हैं कि सैंधव काल में एक ऐसा पुरुष देवता अवश्य था जो आधुनिक शिव से साम्यता रखता था।


परमानारी अथवा मातृदेवी सिंधु सभ्यता के क्षेत्रों से मिट्टी की बनी हुई बहुसंख्यक नारी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

ये प्रायः नग्न अथवा अर्द्धनग्न और कुंडल, हार, मेखला आदि आभूषणों से विभूषित हैं। अधिकांश मूर्तियों के सिर पर कुल्हाड़ी के आकार का शिरोभूषण है। अधिकांश विद्वानों का मत है कि यह नारी मातृदेवी है। सिंधु सभ्यता से मातृदेवी की बहुसंख्यक स्वतंत्र मूर्तियाँ मिली हैं। एक मूर्ति में देवी शिशु को स्तनपान कराती हुई, एक मूर्ति में वृक्ष के नीचे खड़ी हुई तथा एक अन्य मूर्ति में वृक्ष की दो शाखाओं के बीच से निकलती हुई प्रदर्शित है। इनमें से पहली मूर्ति को मातृत्व का और शेष दो मूर्तियों को वनस्पति की देवी का प्रतीक माना गया है। एक मूर्ति में स्त्री के गर्भ से वृक्ष निकलता हुआ दर्शाया गया है,

इस मूर्ति को प्रजनन का प्रतीक माना गया है। परम नारी पुरुष के युग्म की उपासना के अतिरिक्त सिंधु वासियों ने लिंग और योनि की प्रतीकात्मक उपासना के द्वारा भी ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति की प्रतिष्ठा की। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में बहुसंख्यक लिंग मिले हैं। ये साधारण पत्थर लाल पत्थर और नीले सैण्डस्टोन, चीनी मिट्टी अथवा सीप के बने हैं। साथ ही बहुसंख्यक छल्ले भी प्राप्त हुए हैं। अधिकांश विद्वान उन छल्लों को योनियाँ मानते हैं। आज भी भारतवर्ष में लिंग योनि की सम्मिलित रूप में पूजा होती है। अतः हिंदू धर्म की यह पूजा भी सिंधु सभ्यता की देन है।


वृक्ष पूजा - खुदाई में विविध वृक्षों की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं।

इनमें पीपल, नीम, खजूर, शीशम आदि का धार्मिक महत्व था। इनमें सर्वाधिक संख्या पीपल के वृक्षों की है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा पर दो परस्पर जुड़े पशुओं के सिर पर पीपल की नौ पत्तियाँ बनी हैं। एक अन्य मुद्रा पर वृक्ष के मध्य एक मानवमुख बना हुआ है। सामने एक व्यक्ति घुटने टेक कर बैठा है। उसके निकट छह अन्य व्यक्ति हैं तथा पास में एक बकरे की आकृति है। यहाँ वृक्ष के बीच बने मानव मुख को वृक्ष देवता का प्रतीक तथा बकरे को बलि- पशु माना गया है। एक अन्य मुद्रा पर एक नग्न नारी का चित्र है, उसके दोनों ओर एक-एक टहनी बनी है। उसके सम्मुख पत्तियों का मुकुट पहने एक अन्य आकृति अंकित है। विद्वानों का विचार है

कि मुद्रा में अंकित टहनियाँ पीपल की हैं। नग्न नारी पीपल वृक्ष की आत्मारूप देवी है। अन्य आकृतियाँ उस देवी के दूत हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधु प्रदेश में पीपल का वृक्ष सबसे अधिक पवित्र समझा जाता था। इस प्रकार भारत वर्ष में वृक्ष-पूजा की एक दीर्घ पंरपरा है।


पशु पूजा - सिंधु प्रदेश में पशु पूजा भी प्रतिष्ठित थी । बैल शक्ति का प्रतीक माना जाता था। सिंधु प्रदेश में भैंस और भैंसा भी अनेक मुद्राओं पर चित्रित मिलते हैं। कदाचित् यह भी शक्ति का प्रतीक समझा जाता था।


सिंधु सभ्यता के अवशेषों में नाग पूजा से संबंधित साक्ष्य निश्चित रूप से उपलब्ध हैं।

एक मुद्रा पर नाग की पूजा करते व्यक्ति का चित्रण है। योगासन शिव के साथ नाग प्रदर्शित हैं। संभव है कि सिंधु प्रदेश के समय में अनेक पशु-पक्षी उस समय के देवी-देवताओं के वाहन हों।


अग्नि तथा जल पूजा सिंधु युग में वृक्षों के समान ही संभवतः अग्नि तथा जल की पूजा का भी प्रचलन था। मोहनजोदड़ो में एक विशाल स्नानकुंड मिला है। कुंड के चारों ओर बरामदे बने हैं और उनके पीछे कमरे। इसके भीतर उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनाई गई थी।

विद्वानों के अनुमान के अनुसार यह स्नानकुंड धार्मिक स्नानों के काम में आता था। इसके समीप ही एक अन्य भवन है, जिसमें तीन कुएँ मिले हैं। सिंधु सभ्यता में कदाचित् पवित्र स्नान और जल पूजा का विशेष महत्व था। इसी प्रकार कालीबंगा में एक कुएँ के समीप एक पंक्ति में सात आयताकार अग्निकुंड बने मिले हैं। हड़प्पा से मिली एक मुहर पर एक व्यक्ति एक यज्ञवेदी में हवन करता सा प्रदर्शित किया गया है। इन चित्रणों को विद्वानों ने अग्निपूजा से संबंधित माना है।


प्रतीक पूजा - सिंधु प्रदेश की अनेक मुद्राओं पर सींग, स्वस्तिक, चक्र, स्तंभ आदि प्रतीकों का अंकन भी किया गया है। अनेक मुद्राओं,

ताबीजों और मूर्तियों में नर-नारियाँ अपने शीश पर सींग धारण किए हुए प्रदर्शित किए गए हैं। इन प्रतीकों का भी संभवतः धार्मिक महत्व था । मुद्राओं पर अंकित कुछ स्तंभों में दीप, धूप जलते हुए दिखाए गए हैं। कभी-कभी उनके नीचे जलती आग भी दिखाई गई है। कदाचित् यह कोई धार्मिक क्रिया है। हिंदू धर्म में स्वस्तिक चिह्न आज भी पवित्र और शुभ माना जाता है।


पूजा विधि- देवी देवता, पशु पक्षियों, स्तंभों, प्रतीक चिह्नों के निर्माण व अंकन से प्रतीत होता है कि सिंधु निवासी साकार उपासना करते थे। उनके समाज में मूर्ति पूजा प्रचलित थी।

स्नानकुंड, स्नानागारों, कुँओं के अस्तित्व से ऐसा अनुमान किया जाता है कि पूजा अथवा धार्मिक कर्म के पूर्व शारीरिक शुद्धि आवश्यक समझी जाती थी। पूजा में धूप-दीप आदि का प्रयोग भी आवश्यक होता रहा होगा, क्योंकि अनेक मूर्तियों के ऊर्ध्व भाग पर दीपक बने मिले हैं और उनके किनारे धूम्र के चिह्न भी हैं। हड़प्पा से एक मुद्रा प्राप्त हुई है, जिसमें एक समारोह का दृश्य है। यह संभव है कि संगीत नृत्य द्वारा ये नर-नारी किसी धार्मिक क्रिया में संलग्न अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न कर रहे हों। कहीं-कहीं पशु बलि के भी उदाहरण मिले हैं। सैंधव प्रदेशों से उत्खनन में अनेक तावीज भी मिले हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि इन क्षेत्रों के वासी संभवतः जादूटोने में भी विश्वास करते थे।