सिंधु घाटी की सभ्यता - सामाजिक जीवन - Indus Valley Civilization - Social Life
सिंधु घाटी की सभ्यता - सामाजिक जीवन - Indus Valley Civilization - Social Life
पारिवारिक जीवन सिंधु सभ्यता के अंतर्गत समाज की इकाई परिवार ही था। प्रत्येक परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री आदि रहते थे। कार्य विभाजन के आधार पर समाज में अनेक वर्ग थे। उच्च वर्ग में पुजारी, पदाधिकारी, ज्योतिषी, जादूगर, वैद्य आदि आते थे। इनके अतिरिक्त कृषक, व्यवसायी, कुंभकार, बढ़ई, मल्लाह आदि निम्न वर्ग में समझे जाते होंगे। खुदाई में प्राप्त वस्तुओं से उनकी चतुर्दिक संपन्नता का पता चलता है। घरों से बर्तन, मिट्टी एवं धातु के घड़े, कलश, थालियाँ, गिलास, कटोरे, चम्मच आदि प्राप्त हुए हैं। लकड़ी की बनी टोकरियाँ सामान ढोने के लिए प्रयोग में लाई जाती थीं। घरों में कुर्सियाँ, तिपाईयों का प्रयोग भी होता था।
पलंग और चारपाइयाँ भी होती थी। चटाइयाँ भी प्रयोग में लाई जाती थीं। घरों को प्रकाशित करने के लिए रात्रि में सिंधुवासी दीपों का प्रयोग भी करते थे।
अनुमान है कि सिंधुवासी दूध से बनी वस्तुएँ, गेहू, जौ, मछली, मांस, कछुए, भेड़ का मांस इत्यादि खाते होंगे। लोग पशुपालन में भी लिप्त थे, जिनमें मुख्य रूप से गाय, भैंस, हाथी, ऊँट, भेड़, बकरी, सुअर और कुत्ता आदि पाले जाते थे। हिरन, काला चूहा, नेवला आदि के अवशेष भी पाए गए हैं। जंगली साँड खरगोश, बंदर, हिरन, शेर, रीछ और गैंडे की छोटी-छोटी मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं।
सिंधु सभ्यता के लोग सोना, चाँदी, ताँबा, सीसे इत्यादि का प्रयोग करते थे, किंतु लोहे के प्रयोग का पता नहीं चलता है। इनके अतिरिक्त वे हड्डियों, कौड़ियों और हाथी दाँत का प्रयोग भी करते थे।
वेशभूषा - सिंधु सभ्यता से प्राप्त बर्तनों पर बनी आकृतियों से पता चलता है कि सूती एवं ऊनी धागों का निर्माण अवश्य हुआ करता था। इस स्थान से प्राप्त मुद्राओं पर अंकित आकृतियों से भी उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि होती है। पुरुष प्रायः मूँछे और दाढ़ी रखते थे।
वे अपनी कमर के चारों ओर एक पट्टी बाँधा करते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि वे दाएँ कंधे के नीचे से होकर बाएँ कंधे के ऊपर तक पहुँचने वाले दुपट्टे का प्रयोग भी करते थे। स्त्रियाँ घाघरे का प्रयोग करती थीं। अंगरखे का प्रयोग विशेष रक्षा के लिए होता था।
स्त्री और पुरुष दोनों जेवर पहनते थे। हार, बालों के भूषण, कंगन, अँगूठी का प्रयोग तो दोनों करते थे, किंतु नाक के काँटे, बुंदे और नुपुर का प्रयोग केवल स्त्रियाँ ही करती थीं।
अमीर सोने, चाँदी, हाथी- दाँत और कीमती मोतियों के बने भूषण पहनते थे। निर्धन वर्ग सीपियों, हड्डियों, ताँबे और पत्थर के जेवर पहनते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि ये बालों को सँवारने के लिए कंघी का प्रयोग करते थे, साथ ही बालों को स्थिर तथा सँवरा हुआ रखने के लिए क्लिपों का प्रयोग भी करते थे। स्त्रियाँ चोटी भी करती थीं, जूड़ा बनाने का प्रचलन भी था। विविध प्रकार के केशविन्यास मूर्तियों में देखने को मिलते हैं। खुदाई में शृंगार प्रसाधन की सामग्रियाँ भी प्राप्त हुई हैं।
मनोविनोद के साधन सिंधु निवासी मनोरंजन के लिए अनेक प्रकार के खेल-कूदों में भाग लेते थे।
मछली पकड़ना एवं शिकार करना इनका प्रिय कार्य था। हड़प्पा में प्राप्त एक मुद्रा पर एक व्यक्ति को व्यायाम करते हुए दिखाया गया है। खुदाई में संगमरमर, विविध पत्थर तथा सीप की गोलियाँ भी प्राप्त हुई हैं। संभवतः ये खेलने के काम में आती थी। नाच और गाना भी उन्हें पसंद था। हाथी दाँत, पत्थर और मिट्टी के बने हुए पासे भी प्राप्त हुए हैं। जिससे लगता है कि उन्हें पासा खेलना भी आता था। मोहनजोदड़ो की खुदाई से खिलौने भी प्राप्त हुए हैं, अतः पता चलता है कि यहाँ के बच्चे खिलौने खेलने के शौकीन थे। ये खिलौने मिट्टी के बने होते थे। झुनझुना, सीटी, पक्षी, बैलगाड़ी आदि प्राप्त हुए हैं।
औषधियों का प्रयोग खुदाई में कुछ ऐसे पदार्थों की प्राप्ति हुई है,
जो कदाचित् औषधि के रूप में प्रयुक्त होते थे। कुछ ताबीज़ें भी प्राप्त हुई हैं, जिससे पता चलता है कि कदाचित् चिकित्सा में जादू-टोना का भी प्रयोग होता था।
कला एवं अन्य - खुदाई में कुछ तख्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं, जिससे पता चलता है कि लिखने का काम तख्तियों पर होता होगा। इस पर लकड़ी की कलमों का प्रयोग किया जाता होगा। माप और तौल की भी निश्चित योजना थी। नगर योजना, सड़कों आदि की योजना देखकर अनुमान लगता है
कि उन्हें ज्यामिति का ज्ञान भी हो गया था। सिंधु सभ्यता के लोगों को रोगों और चिकित्साओं का भी ज्ञान था। उनके समाज में संगीत, नृत्य का भी विशेष महत्व था। मूर्तियों, मुद्राओं को देखकर निश्चित हो जाता है कि वे चित्रकला में भी प्रवीण थे।
लिपि - दुर्भाग्यवश सिंधु प्रदेश की लिपि अभी तक नहीं पढ़ी जा सकी है। यह लिपि चित्र प्रधान है और इसमें 400 वर्ण हैं। इस लिपि में कहीं पर वर्णों का प्रयोग होता है, कहीं पर संकेतात्मक चित्रों का प्रयोग होता है। इस लिपि से स्पष्ट होता है कि अर्थबोधक विशेष संकेतों का प्रयोग भारतवर्ष में दीर्घकाल तक होता रहा है।
विद्वानों का मत है कि सिंधु लिपि दाहिने से बाएँ हाथ की ओर लिखी जाती थी।
मृतक संस्कार मार्शल महोदय का मत है कि सिंधु वासी शवों का अंतिम संस्कार तीन प्रकार से करते थे-
1) पूर्ण समाधिकरण- इसके अंतर्गत संपूर्ण शव को पृथ्वी के नीचे गाड़ दिया जाता था।
2) आंशिक समाधिकरण इसमें पहले मृतक के शरीर को खुले स्थान पर छोड़ देते थे और जब पशु-पक्षी उसे खा लेते थे तब अस्थियों को एकत्र कर उन पर समाधि बना दी जाती थी।
3) दाह-संस्कार- इसमें शव को जलाने के बाद बची हुई अस्थियों को एकत्र करके गाड़ दिया जाता था।
हड़प्पा की खुदाई में अनेक समाधियाँ प्राप्त हुई थीं। इनमें शवों के सिर अधिकतर उत्तर दिशा की ओर रखे मिलते हैं। शवों के साथ विविध आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, पात्र आदि भी रखे मिलते हैं। ये वस्तुएँ मृतक के उपभोग के लिए रखी जाती होंगी। इतिहासकारों के अनुसार सिंधुवासी भी आगामी जीवन में विश्वास करते थे।
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