मगध साम्राज्य का उत्कर्ष - Magadha Empire flourished
मगध साम्राज्य का उत्कर्ष - Magadha Empire flourished
छठी शताब्दी ई. पू. में भारत सोलह महाजनपदों में विभक्त था, किंतु इस शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सभी समकालीन जनपदों को आत्मसात कर अंततः मगध प्रधान हो गया। मगध को भारत की एक प्रमुख सत्ता बनाने में कुशल योग्य शासक परंपरा, उचित भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिस्थिति का योगदान था। पौराणिक परंपराओं में बृहद्रथ को मगध का प्रथम शासक बताया गया है। इसका पुत्र जरासंध था जिसने बृहद्रथ के बाद
शासन किया। महात्मा बुद्ध के समय में बिंबिसार मगध में शासन कर रहा था। आधुनिक पटना और गया के जिले प्राचीन मगध में सम्मिलित थे। इसकी राजधानी गिरिव्रज (राजगीर) थी।
बिंबिसार (544 ई. पू. से 492 ई.पू.) जैन तथा बौद्ध परंपराओं के अनुसार महावीर तथा गौतम बुद्ध के काल में मगध पर बिंबिसार का शासन था। वह मगध का पहला शासक था जिसने साधारण से मगध राज्य को एक साम्राज्य का रूप दिया। बौद्ध साहित्य के अनुसार वह हर्यक वंश का था। बिंबिसार ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए तीन प्रकार की नीतियाँ अपनाई थीं- 1. वैवाहिक संबंध, 2. मैत्री संबंध तथा 3. युद्धा
वैवाहिक संबंध- बिंबिसार ने अपनी शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए कई महत्वपूर्ण विवाह संबंध किए-
1. उसने कोसल के राजा महाकोसल की पुत्री से विवाह कर लिया। कोसलदेवी प्रसेनजीत की बहन थी। इस विवाह में बिंबिसार को काशी- ग्राम तथा दस हजार मुद्राएँ उपहार स्वरूप प्राप्त हुई थीं।
2. उसने लिच्छवि नरेश चेतक की पुत्री चेल्लना (छल्ना) के साथ भी विवाह किया। फलस्वरूप लिच्छवियों के साथ मित्रता संबंध स्थापित हुआ।
3. उसका तीसरा विवाह मद्र देश की राजकुमारी क्षेमा के साथ हुआ था।
4. महावग्ग के अनुसार बिंबिसार की 500 रानियाँ थीं। संभव है कि उनके कुछ अन्य राजवंशों के साथ भी वैवाहिक संबंध स्थापित हुए हों।
मैत्री संबंध- बिंबिसार के मित्र राज्यों में अवन्ति एवं गांधार का नाम उल्लेखनीय हैं। अवन्ति नरेश चंड प्रद्योत की चिकित्सा के लिए अपने वैद्य जीवक को अवन्ति भेजा था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गांधार नरेश पुक्कुसाति ने उसकी राजसभा में एक दूत भेजा था।
साम्राज्य विस्तार तत्कालीन राजनीति में स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात् बिंबिसार ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए युद्धनीति का सहारा लिया और पड़ोसी राज्य अंग पर आक्रमण किया।
उसका राजा ब्रह्मदत्त मारा गया और अंग का राज्य मगध राज्य में मिला लिया गया। कोसल नरेश से काशी ग्राम बिंबिसार को पहले ही मिल चुका था, अंग-विजय के बाद उसकी राज्य सीमा अत्यंत विस्तृत हो गई। महावग्ग के अनुसार बिंबिसार के साम्राज्य में 80,000 गाँव थे और उसका विस्तार 300 योजन (लगभग 100 मील) था।
शासन- बिंबिसार न केवल एक साम्राज्य निर्माता, अपितु एक कुशल शासक भी था। शासन संचालन में सहायता के लिए उसने अनेक पदाधिकारियों की नियुक्ति की थी,
जिन्हें महामात्र कहा जाता था। बौद्ध साहित्य में उसके कुछ पदाधिकारियों के नाम सर्वार्थक (Sabbatthaka) महामात्र, व्यावहारिक (Voharika) महामात्र, सेनानायक (Senanayaka) महामात्र आदि बताए गए हैं। इनके अतिरिक्त उपराजा, माण्डलिक राजा, सेनापति, ग्राम-भोजक (Grama-bhojak) आदि के भी नाम मिलते हैं। बिंबिसार की न्याय व्यवस्था बहुत कठोर थी। अपराधियों को अंगभंग, कोड़े लगाना, मृत्युदंड आदि कठोर दंड दिए जाते थे। साथ ही योग्य पदाधिकारियों को पुरस्कार देने की व्यवस्था भी थी। वह एक महान निर्माता भी था। राजगृह का निर्माण भी बिंबिसार ने ही करवाया था।
धार्मिक दृष्टि से बिंबिसार गौतम बुद्ध से बहुत प्रभावित था और उसने बाद में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था, किंतु वह जैन धर्म एवं ब्राह्मण धर्म का भी सम्मान करता था।
महावंश के अनुसार बिंबिसार ने 52 वर्षों तक राज किया था। उसके उपरांत उसे बंदी बनाकर उसके पुत्र अजातशत्रु ने उससे मगध का सिंहासन छीन लिया और 492 ई.पू. के लगभग बंदीगृह में ही बिंबिसार की दुःखद मृत्यु हो गई।
अजातशत्रु (492 ई. पू. से 460 ई.पू.) - बिंबिसार के पश्चात् अजातशत्रु मगध का राजा बना।
वह साम्राज्यवादी था, उसने अपने सफल युद्धों के परिणामस्वरूप मगध राज्य को शक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया। सिंहासन पर बैठते ही सर्वप्रथम युद्ध कोसल के साथ हुआ। यह युद्ध बिंबिसार और कोसलदेवी की मृत्यु के पश्चात् काशी के प्रश्न पर हुआ था। कोसलाधीश प्रसेनजीत ने अपने बहनोई बिंबिसार की हत्या के कारण क्रुद्ध होकर उपहास्वरूप दिए गए काशी ग्राम को मगध से वापस ले लिया। अंततोगत्वा प्रसेनजीत ने अजातशत्रु के साथ संधि कर ली, अपनी पुत्री वाजिरा का विवाह उसके साथ कर दिया और काशी ग्राम दहेज के रूप में फिर उसे दे दिया।
अजातशत्रु का दूसरा युद्ध वैशाली के लिच्छिवियों से हुआ। वैशाली वज्जिसंघ का एक शक्तिशाली गणराज्य था।
साहित्यिक साक्ष्यों में इस युद्ध का मूल कारण लिच्छिवियों को बताया गया है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार गंगा के किनारे रत्नों की खान थी जिसके कारण लिच्छिवियों से युद्ध हुआ परंतु जैन साक्ष्यों के अनुसार इस युद्ध का कारण बिंबिसार के वैशाली की लिच्छवि राजकुमारी से उत्पन्न दो पुत्र हल्ल और वेहल्ल थे। बिंबिसार ने इन्हें अपना प्रसिद्ध हाथी सेचनक ( Sechanaka) और अपनी एक बहुमूल्य मुक्कामाला उपहार रूप में दिए थे, परंतु राजा होते ही अजातशत्रु ने इन्हें वापस माँगा। हल्ल और वेहल्ल इन दोनों वस्तुओं को लेकर अपने नाना लिच्छवि नरेश चेतक के पास वैशाली चले गए।
अजातशत्रु इन वस्तुओं को वापस चाहता था अतः उसने लिच्छवियों से युद्ध किया। इस समय तक लिच्छवि बहुत शक्तिशाली हो गए थे, अतः उन्हें हराना बहुत आसान नहीं था। अतः अजातशत्रु ने कूटनीति का सहारा लिया और अपने मंत्री वत्सकार को वैशाली में लिच्छवियों में फूट डालने के लिए भेज दिया। वत्सकार ने जनता के बीच ऊँच- नीच का भेदभाव पैदा कर उनकी प्राचीन एकता की भावना को समाप्त कर दिया। इसके साथ ही अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण करने के लिए पाटलिपुत्र में एक नवीन दुर्ग का निर्माण भी करवाया, क्योंकि उसकी राजधानी राजगृह वैशाली से बहुत दूर थी।
इस प्रकार पूरी तैयारी के साथ अजातशत्रु ने वैशाली पर आक्रमण किया और लिच्छवि, जो आंतरिक टूट-फूट के कारण तितर-बितर हो चुके थे, शीघ्र परास्त हो गए। इस युद्ध में अजातशत्रु ने पहली बार महाशिलाकण्टक (Mahasilakantaka) तथा रथमुसल (Ratha-Musala) नामक दो भयानक अस्त्रों का प्रयोग किया था। लिच्छवियों पर विजय के साथ ही मल्ल, विदेह आदि छोटे गणराज्य भी मगध में सम्मिलित हो गए। साहित्यिक साक्ष्यों के अनुसार लिच्छवि नरेश ने अपनी सहायता के लिए काशी और कोसल राजाओं को भी आमंत्रित किया था, परंतु अजातशत्रु ने अपनी प्रबल वीरता और कूटनीति के कारण इन सबको परास्त कर दिया था। वैशाली, काशी, अंग विजय के पश्चात् अजातशत्रु ने साम्राज्य विस्तार के लिए तीसरा कदम उठाया। उसको एकमात्र खतरा अवन्ति राज्य से ही रह गया था ।
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