गंधार कला के प्रमुख केंद्र - Main centers of Gandhara art
गंधार कला के प्रमुख केंद्र - Main centers of Gandhara art
गांधार कला का पहला केंद्र तक्षशिला पश्चिमी पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले में पूर्वी गंधार की राजधानी एवं व्यापार और कला का बड़ा केंद्र था। सर जान मार्शल ने इस स्थान की खुदाई से यहाँ गंधार- कला के कई महत्वपूर्ण अवशेष उपलब्ध किये थे। इनमें सबसे बड़ा अवशेष धर्मराजिका या चीर स्तूप है। इसको यह नाम इस स्तूप के शिरोभाग पर पड़ी एक दरार के कारण दिया गया है। यह गोल आकृति में ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया था, इसका बाहरी खोल पत्थर की शिलाओं से ढका हुआ था। इनमें अनेक प्रकार के अलंकरण और बोधिसत्वों की पूजा के लिए आले बने हुए थे। इसके पास ही एक बड़ा चैकोर विहार मिला है। तक्षशिला के आस पास का पूरा पहाड़ी इलाका इस प्रकार के अवशेषों से भरा हुआ है।
दूसरा केंद्र पुष्कलावती पश्चिमी गंधार की राजधानी थी। इसे हरतनगर भी कहते हैं। यहाँ हारिति का एक बड़ा मंदिर मिला है। इसके पास बालाहिसार में कुणाल का स्तूप है जहाँ अशोक के पुत्र कुणाल ने अपनी सुंदर आँखों का दान किया था। इसके निकट पल्टूडेरी से दीपंकर जातक की महाभिनिष्क्रमण की एवं बुद्ध और बोधिसत्व की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं। दीपंकर जातक की कथा इस प्रदेश में बहुत लोकप्रिय थी। इसमें सुमेध नामक युवक ने बुद्ध के पैरों को मलिन होने से बचाने के लिए कीचड़ पर अपने बालों को बिछाया था, तब बुद्ध का नाम दीपंकर था। पेशावर के निकट शाह जी की ढेरी नामक स्थान पर कनिष्क द्वारा निर्मित महान स्तूप के अवशेष मिले हैं।
चीनी यात्रियों ने इसका विस्तृत वर्णन किया है। इनके अनुसार इसका आधार पाँच खण्डों ( 150 फीट) में था। इसके ऊपर लकड़ी का स्तूप तेरह मंजिलों (400 फीट) में बना था। इस पर बिजली आदि से रक्षा के लिए एक लोहे का खम्भा था, इस पर 13 से 25 तक सोने का पानी चढ़े ताम्बे के छत्र (88 फीट) थे। इस प्रकार इस स्तूप की कुल ऊँचाई 638 फी थी। कुमारस्वामी ने इसे भारत के सामान्य स्तूप तथा बर्मा एवं चीन के पगोड़ों का मध्यवर्गी रूप माना है। यह प्राचीन काल का सर्वोत्तम स्तूप था। फाहियान ने लिखा है कि “यात्रा में अनेक स्तूप और मंदिर देखे, किंतु ऐसा मनोहर, भव्य कोई दूसरा स्तूप नहीं दिखाई दिया। ऐसा कहा जाता है
कि यह जंबुद्वीप में सर्वोत्तम स्तूप है। इस समय केवल इसका आधार ही मिला है। इसका व्यास 286 फीट है। यह सूचित करता है कि यह उस समय का सबसे बड़ा स्तूप था।
पेशावर से बैक्ट्रिया जाने वाले मार्ग पर नगरहार (जलालाबाद) नामक एक महत्वपूर्ण स्थान था। यहाँ बीमरान नामक स्थान पर सेलखड़ी के पात्र में रखी हुई सोने की मंजूषा मिली है। इसके निकट ही हड्डा नामक स्थान से गंधार कला शैली की पत्थर की तथा गचकारी की यूनानी शैली की अनेक मूर्तियाँ और एक स्तूप मिला है।
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