मथुरा कला - mathura art

मथुरा कला - mathura art


प्रथम तीन शताब्दियों में मथुरा, कुषाण युग की मूर्तिकला का महान केंद्र था। इसे कई कारणों से यह गौरव प्राप्त हुआ। यमुना तट पर बसी यह नगरी एक महान तीर्थस्थल रहा है। यहाँ अनेक व्यापारिक पथ मिलते थे। जिससे मथुरा को विलक्षण समृद्धि प्राप्त हुई। बिहार से बैक्ट्रिया तक फैले कुषाण साम्राज्य की राजसत्ता का भी भारत में यह एक बड़ा केंद्र था। इसके निकट रूपवास और सीकरी के पर्वतों ने मूर्तियाँ बनाने के लिए यहाँ के कलाकारों को सफेद चित्ती वाले लाल पत्थर का अक्षय कोष प्रदान किया था। कुषाण सम्राटों का राजसंरक्षण और प्रोत्साहन पाकर कलाकारों ने बहुत बड़ी संख्या में हर प्रकार की मूर्तियाँ तैयार करनी शुरू की। उस समय ये मूर्तियाँ दूर-दूर भेजी जाती थीं। भारतीय कला के इतिहास में मथुरा की अपेक्षा अधिक महत्व रखने वाले स्थान अल्प ही हैं।


कुषाण युग में मथुरा की कला की कई विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। पहली विशेषता यह थी कि इस काल में हिंदू बौद्ध और जैन तीनों ही धर्मों के देवी-देवताओं की मूर्तियों का निर्माण था। मौर्ययुग के अंत में मथुरा के शिल्पी यक्ष जैसी महाकाय प्रतिमाओं के निर्माण में सिद्धहस्त हो चुके थे। अब इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बौद्ध, जैन और ब्राह्मण धर्मों की मूर्तियाँ और स्तूप बनाए जाने लगे । विष्णु लक्ष्मी, दुर्गा सप्तमातृका, कार्तिकेय आदि की प्राचीनतम मूर्तियाँ मथुरा से ही उपलब्ध हुई हैं। जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों और स्तूपों के निर्माण का श्रीगणेश इस युग में हुआ।

दूसरी विशेषता बुद्ध की मूर्ति का निर्माण था। इससे पहले बुद्ध को सांची और भरहुत की कला में बोधिवृक्ष, स्तूप, चरण भिक्षापात्र आदि के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता था, अब पहली बार बुद्ध को मानव-रूप में प्रदर्शित किया गया। बुद्ध की प्रतिमा मथुरा की सबसे मौलिक देन थी। इससे मूर्ति कला के क्षेत्र में एक महान क्रांति हुई। तीसरी विशेषता उस समय प्रचलित विभिन्न लोकधर्मों के देवी-देवताओं की मूर्तियों का निर्माण था। इनमें यक्ष, यक्षिणी, नाग, नागी, श्री, लक्ष्मी, भद्रा, हारीती आदि की मूर्तियाँ हैं। चौथी विशेषता लोक-जीवन के सभी पक्षों का अभूतपूर्व सौंदर्य और स्वच्छंदता के साथ वेदिका स्तंभों पर चित्रण है। मथुरा में तत्कालीन आनंदमय जीवन का वेदिका स्तंभों पर जीता जागता अंकन मिलता है। कहीं वनों में स्त्री-पुरुषों द्वारा पुष्प-संचय किया जा रहा है, कहीं जलाशयों में स्नान और क्रीड़ा के दृश्य हैं,

कहीं सुंदरियों द्वारा मंजरी, पुष्प और फलादि दिखा कर पक्षियों को लुभाने का, कहीं स्त्रियों के केशों में गुथे हुए मुक्ता-जालों के लोभी हंसों का कहीं अशोक, कदम्ब आदि वृक्षों की शाखायें थामें सुंदरियों के ललित अंग-विन्यासों का चित्रण है। मथुरा जैसे सुंदर वेदिका स्तंभ तथा उद्यान- क्रीड़ाओं और जल क्रीड़ाओं के दृश्य अन्यत्र कहीं नहीं मिलते हैं। पाँचवी विशेषता मथुरा से मूर्तियों के प्रचुर मात्रा में निर्यात था। उन दिनों मथुरा के शिल्पियों की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। वे हर प्रकार की मूर्ति बनाने और प्रत्येक धर्म की आवश्यकता पूर्ण करने में समर्थ थे, अतः उनकी मूर्तियों की माँग सभी स्थानों से आने लगी और वे साँची, सारनाथ, कौशांबी, श्रावस्ती जैसे यूवर्ती स्थानों में अपनी मूर्तियों को भेजने लगे। कुषाण सम्राट कनिष्क, हुविष्क और वासुदेव का राज्य-काल इस कला का स्वर्ण-युग था । मथुरा में अब तक लगभग पाँच हजार प्राचीन अवशेष मिल चुके हैं। इनमें अधिकांश कुषाण युग के हैं।