मौर्ययुगीन स्थापत्य - Mauryan architecture
मौर्ययुगीन स्थापत्य - Mauryan architecture
उत्खनन से ज्ञात हाता है कि पाटलिपुत्र में मौर्य राजाओं का राजमहल विशाल एवं भव्य भवनों का एक बड़ा समूह था। मेगास्थनीज के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का राजमहल अत्यंत विशाल एवं राजसी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण था। इसका निर्माण लकिड़यों से हुआ था और उसमें बारीक नक्काशी की गयी थी। यद्यपि ईंटों की कुछ नीवों के अतिरिक्त इस राजमहल का कोई अवशेष आज उपलब्ध नहीं है, पर ऐसी कोई वजह नहीं है जिसके आधार पर यह मान लिया जाए कि मौर्ययुगीन भवन साधारण एवं आदिम किस्म के थे। मौर्ययुगीन एकाश्म स्तंभों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय के कारीगरों को पत्थर को तराशने एवं आकार देने में अद्भुत दक्षता हासिल थी।
पर यदि मौर्य युग में भवन निर्माण हेतु पत्थरों के स्थान पर लकड़ियों का ही अधिक प्रयोग होता था तो इसका कारण यही हो सकता है कि उस समय गंगा के मैदानी इलाको में पत्थरों का अभाव था जबकि लकड़ियाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थीं। उल्लेखनीय है कि लकड़ियों का बना होने के बावजूद यूनानी एवं रोमन लेखकों ने चंद्रगुप्त मौर्य के महल को सूसा एवं एकबातन के राजमहलों से अधिक भव्य माना है।
अशोक के पूर्व भारतीय वास्तुकारों ने भवनों की नींव को छोड़कर भवनों की अधिरचना तथा अंय भागों का निर्माण मुख्य रूप से लकड़ियों के द्वारा ही किया।
भवनों की नींव हेतु उन्होंने धूप में सुखायी गयी ईंटों का प्रयोग किया। पर लकड़ी के प्रयोग से भवनों की भव्यता अथवा उनके ऐश्वर्य में कोई कमी नहीं आयी। बल्कि लकड़ी के प्रयोग से बड़े-बड़े कमरों, बरामदों आदि पर बड़ी-बड़ी छतें बनाना संभव हो सका जो ईटों अथवा पत्थरों के द्वारा संभव नहीं था। बाद में वास्तुकला के क्षेत्र में जब चापों एवं मेहराबों का प्रयोग प्रारंभ हुआ तब ईटों एवं पत्थरों द्वारा भी बड़ी-बड़ी छतें बनाना संभव हो सका।
साहित्य से यह संकेत मिलता है कि अशोक ने अपने कई भवनों में पत्थरों का प्रयोग किया। इस बात के भी पर्याप्त साक्ष्य हैं
कि अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में पूर्व से विद्यमान लकड़ी के भवनों के स्थान पर अपेक्षाकृत अधिक ठोस एवं मजबूत इमारतों का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त उसने संपूर्ण साम्राज्य में ईटों एवं पत्थरों की सैंकड़ो खूबसूरत संरचनाएँ बनवायीं। भवन निर्माता के रूप में उसकी गतिविधियाँ इतनी चमत्कारिक थीं कि समकालीन लोग उसके द्वारा निर्मित भवनों, इमारतों एवं अय संरचनाओं को मानव निर्मित न मानकर उन प्रेतात्माओं द्वारा निर्मित मानते थे जो शाही जादूगर के आदेश पर राज्य के लिए कार्य किया करते थे।
स्तूप
स्तूप मौर्यकालीन स्थापत्य की एक महत्वपूर्ण देन है। अशोक ने गौतम बुद्ध अथवा प्रमुख बौद्ध भिक्षुओं की अस्थियों के ऊपर तक्षशिला,
कपिलवस्तु, कुशीनगर, वाराणसी, बोधगया, वैशाली आदि अनेक स्थानों पर स्तूप बनवाये। स्तूप की आकृति अर्द्धगोलाकार होती थी। उनका निर्माण कच्ची एवं पकी ईंटों द्वारा किया जाता था। स्तूप के ऊपर लकड़ी अथवा पत्थर की एक छतरी होती थी। स्तूप की परिक्रमा हेतु उसके चारों ओर एक प्रदक्षिणा पथ निर्मित होता था ।
कला की दृष्टि से साँची का स्तूप सर्वश्रेष्ठ है। यह 772 फुट ऊँचा तथा इसका व्यास 121 12 फुट है। मूल स्तूप का निर्माण ईटों द्वारा किया गया था, पर बाद के वर्षों में पत्थर आदि जोड़कर इसका आकार लगभग शुना कर दिया गया। नेपाल की सीमा पर अवस्थित पिपरहवा का स्तूप भी उल्लेखनीय है। यह स्तूप पत्थरों द्वारा निर्मित एक विशाल कक्ष के चारों ओर बनाया गया है। इसके संबंध में स्मिथ कहते हैं - "इस स्तूप में ईट अत्यंत निपुणता से लगायी गई हैं तथा अस्थियों के सम्मान में यहाँ सोने, चांदी तथा बहुमूल्य रत्नों के जो आभूषण रखे गये हैं, उनसे मौर्यकालीन कलाकारों की दक्षता एवं उनके कौशल का परिचय मिलता है।"
वार्तालाप में शामिल हों