मौर्ययुगीन कला - Mauryan Art
मौर्ययुगीन कला - Mauryan Art
चूँकि अशोककालीन भवन एवं स्मारक आज अधिक संख्या में विद्यमान नहीं हैं, इसलिए कला की तत्कालीन स्थिति का हमारा ज्ञान मुख्य रूप से अभिलेखों, एकाश्म स्तंभों एवं उनके शिखर पर निर्मित आकृतियों अथवा मूर्तियों पर ही आधारित है। अशोक के समय की कुछ गुफाओं से भी अशोक कालीन कला की जानकारी मिलती है। अशोक के अभिलेख इतने कलात्मक एवं परिष्कृत हैं कि वे भी मूर्तिकला के उदाहरण माने जाने योग्य हैं।
एकाश्म स्तंभ
भारतीय कला का एक अत्यंत प्राचीन इतिहास रहा है। पर एक कलाकार का शिल्प अशोक के दिनों में ही अपने चरमकर्ष पर पहुँचा।
यह उन कलाकारों की कृतियों, विशेषकर एकाश्म स्तंभों की चिकनी एवं चमकदार सतह, उनके शिखर पर अत्यंत बारीकी से तराशी गयी मूर्तियों एवं अशोक तथा दशरथ द्वारा दान में दी गयी गुफाओं के अभ्यंतर एवं अभिलेखों से स्पष्टतः परिलक्षित होता है।
कुमार स्वामी मौर्यकालीन कला को दरबारी कला एवं लोक अथवा देशी कला में विभक्त करते हैं। उनका मत है कि दरबारी कला के उदाहरण हम चट्टानों अथवा पत्थरों के उन एकाश्म स्तंभों एवं उनके शिखर को मान सकते हैं जिन्हें अत्यंत सूक्ष्म तरीके से काट और तराश कर तैयार किया गया है।
वस्तुतः इस प्रकार के पाषाण स्तंभ जिनके शिखर पर पशु अथवा किसी पवित्र चिह्न की आकृति निर्मित है, भारत में अत्यंत प्राचीन काल से ही विभिन्न धर्मों एवं संप्रदायों के अनुयायियों के द्वारा निर्मित किए जाते रहे हैं। इन स्तंभों को किसी चट्टान से एक खंड के रूप में काटकर एक अहाते में स्थापित किया जाता था और उसे धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता था। विन्सेंट आर्थर स्मिथ सासाराम अभिलेख का उल्लेख करते हैं। जिसके अनुसार राजाज्ञाओं अथवा अभिलेखों को पत्थरों के उन सभी स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाया जा सकता था जो कहीं भी पहले से विद्यमान थे। इसका स्पष्ट तात्पर्य है कि कम से कम कुछ पाषाण स्तंभ अशोक के शासनकाल के पहले भी विद्यमान थे।
अशोक द्वारा निर्मित एकाश्म स्तंभ टोपरा, मेरठ, प्रयाग, साँची, सारनाथ, लौरिया नन्दनगढ़, लौरिया अरेराज, रामपुरवा, रूम्मिनदेई आदि स्थानों में मिले हैं।
इन स्तंभों की ऊँचाई 40 से 50 फीट और वजन 50 टन तक है। आधार की ओर उनका व्यास अधिक है पर शीर्ष की ओर उनका व्यास क्रमशः कम होता गया है। स्तंभों पर पशुओं की सुंदर आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। प्रयाग, संकिसा एवं रामपूर्वा के स्तंभों को कमल, तालचित्र अथवा मधुमालती लता आदि के आकर्षक डिजाइनों से अलंकृत किया गया है। स्तंभों पर कलाकारों द्वारा ऐसी चमकदार पॉलिश की गयी है कि वे पत्थर की जगह किसी धातु के स्तंभ प्रतीत होते हैं।
स्तंभ दो प्रकार के पत्थरों से निर्मित हैं। इनमें से कुछ मथुरा से प्राप्त लाल एवं सफेद चित्तीदार बलुआ पत्थर के हैं तो अंय चुनार की खदान से प्राप्त पांडु अथवा हल्के पीले रंग के कठोर बलुआ पत्थर के।
अशोककालीन सिविल अभियांत्रिकी अत्यंत उच्च स्तर की थी। यही कारण था कि विशाल आकार के ऐसे स्तंभों का निर्माण हो सका एवं चट्टानों के इतने बड़े-बड़े पिंड एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाए जा सके।
मूर्तिकला
एकाश्म स्तंभों के शिखर मौर्यकालीन मूर्तिकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। स्तंभों के शिखर पर पत्थर को अत्यंत बारीकी से तराशकर मूर्तिकार ने एक प्रतिमा अथवा आकृति बनायी है। किसी स्तंभ में निर्मित यह प्रतिमा एक धार्मिक अथवा पवित्र आकृति के रूप में है
तो अंय में पशु आकृति अथवा चक्र के रूप में इस प्रतिमा की विशेषता है कि यह चारो ओर से दृष्टिगोचर होती है। कलाकार ने इस प्रतिमा के नीचे एक त्रिआयामी आधार फलक का निर्माण किया है जो पशु-पक्षी, लता- पुष्प, चक्र आदि के उभारदार चित्रों से अलंकृत है। लौरिया नन्दनगढ़ का आधार फलक इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है जिसपर उड़ते हुए हंसों की एक खूबसूरत कतार है।
मौर्य साम्राज्य में कलाकार को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी। यही कारण है कि स्तंभों के शिखर में विविधता है। कलाकार ने शिखर पर अवस्थित आधारफलक को कहीं आयताकार बनाया है
तो कहीं वृत्ताकार ताकि उसके ऊपर निर्मित प्रतिमा आधार फलक के आकार एवं प्रकार से मेल खा सके एवं समानुपातिक प्रतीत हो। स्तंभों के शिखर निम्नलिखित चार पशुओं में से किसी एक की आकृति से निर्मित हैं- अश्व, हाथी, वृषभ एवं सिंहा अश्व को छोड़कर अंय सभी पशु किसी न किसी स्तंभ के शिखर पर अभी भी विद्यमान है, पर प्रलेखों में इस बात का उल्लेख है कि रूम्मिनदेई के स्तंभ पर शिखर पर अश्व की आकृति बनी हुई थी। संकिसा अवस्थित स्तंभ के शिखर पर हाथी का एक सुंदर प्रतिरूप निर्मित है, जबकि रामपूर्वा स्थित दो स्तंभों के शिखर पर क्रमश: एक वृषभ एवं एक सिंह का प्रतिरूप बना हुआ है।
मूर्तिकला की दृष्टि से सारनाथ स्तंभ का भव्य शिखर सर्वोत्कृष्ठ माना जाता है।
इसकी रचना अशोक के शासनकाल के परवर्ती वर्षों में हुई। इस स्तंभ का निर्माण उस स्थान की स्मृति में किया गया था जहाँ गौतम बुद्ध ने अपना ख्यात् धर्मचक्र प्रवर्तन उपदेश सार्वजनिक रूप से दिया था। इसमें चार सिंहों की आकृतियाँ हैं जो परस्पर पीठ सटाए बैठे हैं। शेरों के नीचे निर्मित आधार फलक पर चार धर्मचक्र और चार घोड़ा, शेर, हाथी और बैल (नंदी) के चित्र उत्कीर्ण हैं और सबसे नीचे एक घंटी बनी है। समस्त शिखर पर काले रंग की एक चमकदार पॉलिश है। स्मिथ कहते हैं कि सारनाथ के शिखर में कलाकार द्वारा यथार्थ प्रतिरूपण एवं आदर्शवादी भव्यता का एक अद्भुत संमिश्रण किया गया है। स्मिथ की दृष्टि में प्राचीन विश्व में कहीं भी इस प्रतिमा का कोई जोड़ नहीं है।
यह सत्य है कि सारनाथ स्तंभ के शिखर का डिजाइन फारस से प्रभावित दिखता है,
किंतु इसमें संदेह नहीं है कि आधार फलक की नक्काशी को विशुद्ध रूप से भारतीय मनोभावों के अनुरूप डिजाइन किया गया है। यदि आधार फलक पर वित्रित पशुओं को देखा जाए तो उनमें जिस भारतीयता की झलक विद्यमान है, उसे देखकर ऐसा भी प्रतीत नहीं होता है कि इसका निर्माण एक एशियाई यूनानी ने किया। कलात्मक सौंदर्य की दृष्टि से सारनाथ शिखर की बराबरी मात्र वह शिखर कर सकता है जो अब स्तंभ से पृथक हो चुका है, पर कभी साँची स्तंभ के शीर्ष पर अवस्थित था। यह शिखर सारनाथ शिखर की प्रतिलिपि प्रतीत होता है और ऐसा माना जा सकता है कि दोनों कलाकृतियों का निर्माण एक ही कलाकार के द्वारा हुआ होगा।
गुफाएँ
चट्टानों को काटकर गुफा निर्माण की कला का उद्भव मौर्य काल में हुआ।
इन गुफाओं का निर्माण बिहार में गया के निकट बराबर और नागर्जुनी नामक पहाड़ियों में अशोक एवं परवर्ती मौर्य राजा दशरथ के द्वारा करवाया गया। अशोक द्वारा निर्मित गुफाओं में लोमस ऋषि की गुफा अत्यंत आकर्षक है। यह गुफा अंडाकार है तथा इसका मुख्य द्वार विशद् अलंकरण से युक्त है । दशरथ द्वारा बनवायी गयी गुफाओं में गोपी गुफा विशेष उल्लेखनीय है। यह गुफा एक आयताकार हॉल की तरह है जिसकी छत मेहराबदार है। इन सभी गुफाओं की विशिष्टता इनकी पॉलिश है जिसमें आज भी शीशे जैसी चमक है।
लोक कला
स्थानीय मूर्तिकारों द्वारा निर्मित मृण्मूर्तियाँ मौर्ययुगीन लोक कला का उदाहरण मानी जा सकती हैं।
मातृ देवी की मृण्मूर्तियाँ बनाने की परंपरा भारत में प्रागैतिहासिक काल से ही रही है। अहिच्छात्र में प्राप्त मृण्मूर्तियों से यह संकेत मिलता है कि यह परंपरा मौर्य युग में भी जारी रही। मौर्ययुगीन मृण्मूर्तियाँ विविध आकार की हैं और सामान्यतः पाटलिपुत्र एवं तक्क्ष शिला के मध्य स्थित क्षेत्र में पायी गयी हैं। इनमें से कुछ साँचे में बनी प्रतीत होती हैं, फिर भी इनमें कहीं कोई पुनरावृत्ति नहीं है। मृण्मूर्तियों में आदिम मूर्तियाँ, देवी-देवता, खिलौने, आभूषण एवं मनका प्रमुख हैं। खिलौनों में कई पहिया लगे पशु हैं। हाथी का खिलौना विशेष रूप से प्रिय रहा है। आभूषणों में मिट्टी का गोलाकार लॉकेट अत्यंत लोकप्रिय था जिसका प्रयोग संभवत: बुरी नजरों से बचाव के लिए किया जाता था।
कई अंय कलाकृतियों की रचना स्थानीय कारीगरों के द्वारा की गयी होंगी। पर चूँकि वे मिट्टी, लकड़ी एवं अंय नष्ट होनेवाली सामग्री से बनी हुई होंगी, इसलिए वे भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं रह पायीं ।
धौली स्थित एक चट्टान में उत्कीर्ण हाथी की आकृति भी लोक कला का उदाहरण प्रतीत होती है। संभवतः इसकी रचना स्थानीय कलाकारों ने की और इसमें उन राजकीय कारीगरों की कोई भूमिका नहीं थी जिन्होंने स्तंभों एवं शिखरों की रचना की। मौर्ययुगीन लोक कला के उदाहरण बेसनगर से प्राप्त यक्षिणी की मूर्ति, मथुरा के निकट मिली यक्ष की मूर्ति एवं दीदारगंज से प्राप्तयक्षिणी की मूर्ति के रूप में भी विद्यमान है। इन मूर्तियों में सौंदर्य की अपेक्षा आकार को बड़ा बनाने का विशेष आग्रह दिखता है।
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