क्रांति का अर्थ एवं व्यापकता - Meaning and scope of revolution
क्रांति का अर्थ एवं व्यापकता - Meaning and scope of revolution
क्रांति शब्द संस्कृत की क्रम धातु से बना है जिसका अर्थ होता है गति अथवा चाल | क्रांति उस गति को कहते हैं जो समाज में बहुत बड़ी उथल-पुथल मचा देती है। मनुष्य अपने तथा समाज के विकास एवं कल्याण के लिए विभिन्न प्रकार की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं का निर्माण करती है, परंतु कालांतर में उनमें आडंबर आ जाता है और उनमें अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न हो जाते हैं। तब यह संस्थाएँ जन साधारण के लिए अभिशाप बन जाती हैं और उनका उन्मूलन आवश्यक हो जाता है, परंतु समाज में प्रायः ऐसे शक्तिशाली वर्ग उत्पन्न हो जाते हैं जो इन संस्थाओं का दुरूपयोग कर अपने स्वार्थ की सिद्धि करते हैं
और उनके अस्तित्व को बनाये रखने का यथाशक्ति प्रयत्न करते हैं। यह वर्ग प्रायः रूढ़िवादी तथा प्रतिक्रियावादी होते हैं। साधारण जनता कुछ काल तक इन भ्रष्ट तथा विकृत संस्थाओं के अत्याचारों को मूक होकर सहन करती है क्योंकि इन परंपरागत संस्थाओं के प्रति उसकी बड़ी श्रद्धा होती है और वह सहसा उनके विरूद्ध आंदोलन करने का साहस नहीं करती, परंतु प्रत्येक समाज में एक प्रबुद्ध वर्ग भी होता है जो बड़ा ही प्रगतिवादी विवेकशील तथा स्वतंत्र विचार का होता है। यह वर्ग सामाजिक दोषों की ओर से चैतयशील तथा जागरूक रहता है।
वह लोक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर सामाजिक समस्याओं पर विचार करने लगता है। इस प्रकार उसके मस्तिष्क में विचारों की उथल-पुथल अथवा क्रांति आरंभ हो जाती है। इसी को बौद्धिक क्रांति कहा जाता है। प्रबुद्ध वर्ग ध्वंसात्मक तथा रचनात्मक दोनों प्रकार के विचारों से ओतप्रोत हो जाता है। उसके मस्तिष्क में दूषित संस्थाओं की कुव्यवस्थाओं अत्याचारों तथा अंधविश्वासों का चित्र विद्यमान रहता है। जिनका वह विध्वंस करना चाहता है और साथ ही साथ स्वस्थ एवं कल्याणकारी काल्पनिक संस्थाओं का चित्र उसके मस्तिष्क में उपस्थित रहता है जिन्हें वह समाज के कल्याण के लिए स्थापित करना चाहता है। -प्रबुद्ध वर्ग अपनी मानसिक क्रांति को व्यवहारिक स्वरूप देने के लिये अपने विचारों, प्रवचनों तथा लेखों द्वारा जनता के सामने उपस्थित करता है।
वह दूषित संस्थाओं को अत्यंत वीभत्स और अपनी काल्पनिक संस्थाओं का अत्यंत मनोहर एवं कल्याणकारी चित्र जनता के सामने उपस्थित करता है और उसे आंदोलन करने के लिए प्रोत्साहित करता है जब जनता पुरानी भ्रष्ट व्यवस्थाओं को उन्मूलित करने के लिए आंदोलन कर देती है। तब उसे जनक्रांति के नाम से पुकारा जाता है। जन क्रांति द्वारा समाज में बहुत बड़े-बड़े राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक मौलिक परिवर्तन हो जाते है। यह परिवर्तन दो प्रकार से संपन्न किये जाते हैं। यह शांतिपूर्वक भी संपन्न हो सकते हैं और इसके संपन्न करने में भीषण रक्तपात तथा हत्याकांड भी हो सकता है। छठी शताब्दी ई. पू. में हमारे देश में एक बहुत बड़ी क्रांति हुई जिसका हमारे देश के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। यह क्रांति बड़े ही शांतिपूर्वक तथा अहिंसात्मक ढंग से संपन्न हुई थी।
क्रांति की व्यापकता
छठी शताब्दी ई. पू. न केवल भारत के वरन् विश्व के इतिहास में एक महान् क्रांति का युग माना जाता है। डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने इस काल के संबंध में लिखा है, “छठी शताब्दी ई. पू. मानव इतिहास का एक महत्वपूर्ण काल है। यह विभिन्न क्षेत्रों में जो एक दूसरे से अत्यधिक अलग थे असाधारण मानसिक तथा आध्यात्मिक अशांति का युग था। जिस समय हमारे देश में यह क्रांन्ति आरंभ हुई उसी समय ईरान, चीन तथा यूनान में भी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक सुधार के आंदोलन चल रहे थे जिनका उन देशों के इतिहास पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। हमारे देश में छठी शताब्दी ई. पू. में जो क्रांति आरंभ हुई उसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक था।
इस क्रांति का प्रभाव राजनीतिक सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। राजनीतिक क्षेत्र में यह मगध के साम्राज्यवाद का युग था। इस समय उत्तरी भारत में सोलह जन-जनपद विद्यमान थे जिनमें परस्पर संघर्ष चला करता था, परंतु थोड़े समय में छोटे-छोटे राज्यों को विनष्ट कर मगध साम्राज्य का निर्माण किया गया और राजनीतिक एकता स्थापित करने का स्वप्न सिद्ध हो गया। सामाजिक क्षेत्र में भी यह एक क्रांति का युग था। इन दिनों जाति प्रथा के बंधन अत्यंत जटिल हो गये थे और ऊँच-नीच तथा छुआछूत की भावना बड़ी प्रबल हो गई। ब्राह्मणों की समाज में प्रधानता थी और सर्वत्र उन्हीं का बोलबाला था। छठी शताब्दी ई. पू. में इन सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी आंदोलन आरंभ हुआ।
जाति प्रथा का घोर विरोध किया गया और ऊँच-नीच तथा छुआ-छूत की भावनाओं को दूर करने का भगीरथ प्रयास किया गया। क्षत्रियों ने ब्राह्मणों की प्रधानता का विरोध करना आरंभ किया और अपने को सर्वोच्च श्रेणी में रखने का प्रयत्न किया। सांस्कृतिक क्षेत्र में भी वह क्रांतिकारी युग था। इस काल में साहित्य तथा कला के क्षेत्र में बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। उसके पूर्व केवल संस्कृत ही साहित्यिक भाषा समझी जाती थी और उसी में ग्रंथों की रचना होती थी और धार्मिक उपदेश दिये जाते थे। यह ब्राह्मणों की भाषा थी और वही लोग इसे ठीक से समझ सकते थे, परंतु छठी शताब्दी ई. पू. में प्राकृत तथा पालि में भी, जो जन साधारण की भाषा थी, साहित्य रचना होने लगी और धर्मोपदेश दिये जाने लगे। जैन-धर्म ने प्राकृत को और बौद्ध धर्म ने पाली को माध्यम बनाकर अपने धर्म का प्रचार आरंभ किया।
फलतः प्राकृत तथा पाली भाषा में बहुत बड़े साहित्य की रचना हुई जो सर्वसाधारण के लिए भी बोधगम्य था। कला में भी बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। वैदिक काल में केवल मंडपों, यज्ञशालाओं आदि का निर्माण किया जाता था, परंतु इस काल में विहारों, गुहा- मंदिरों तथा स्तूपों और मूर्तियों का निर्माण बड़े जोरों के साथ आरंभ हुआ जिससे वास्तु-कला तथा शिल्प कला में बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन आरंभ हो गये, परंतु इस काल में सबसे बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन धार्मिक क्षेत्र में हुआ। वैदिक धर्म जिसे ब्राह्मण धर्म तथा सनातन धर्म भी कहते हैं, अत्यंत जटिल हो गया था और साधारण जनता न उसे समझ सकती थी और न उसका ठीक-ठीक पालन कर सकती थी? केवल ब्राह्मण वर्ग ही उसे समझता था और उसका पालन कर सकता था। वैदिक काल में यज्ञ ही मोक्ष के साधन समझे जाते थे,
परंतु यह इतने दुरुह हो गये थे और इनमें इतना अधिक धन व्यय करना पड़ता था और इतना अधिक समय लगता था कि साधारण जनता इन्हें कर नहीं सकती। अतएव एक अत्यंत सरल धर्म की आवश्यकता थी जिसे सभी लोग समझ सकें और सभी पालन कर सकें। फलतः सरल मार्ग को ढूँढने के लिए एक भयंकर धार्मिक क्रांति क्षत्रियों के नेतृत्व में आरंभ हुई जो दो प्रधान धाराओं में प्रवाहित हो चली। एक धारा आस्तिक कहलाई जो वैष्णव तथा शैव-धर्म के रूप में प्रस्फुटित हुई और एक दूसरी धारा नास्तिक कहलाई जो बौद्ध तथा जैन धर्म के रूप में प्रवाहित हुई। वैष्णव तथा शैव धर्म ने भक्ति तथा उपासना के अत्यंत सरल मार्ग को और बौद्ध तथा जैन धर्म ने उससे भी सरल सत्कर्म तथा सदाचरण मार्ग को ढूंढ निकाला जो सर्व साधारण के लिए अनुगमनीय था।
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