सभ्यता का अर्थ - meaning of civilization

सभ्यता का अर्थ - meaning of civilization


संस्कृति शब्द के साथ ही सभ्यता शब्द का प्रयोग भी दृष्टिगोचर होता है। लोक में सामान्यतः सभ्यता और संस्कृति, इन दोनों पदों का प्रयोग समान अर्थ में कर दिया जाता है, परंतु यह यथार्थ नहीं है। दोनों शब्दों के वाच्य अर्थ में भेद है। संस्कृत-व्याकरण की दृष्टि से 'सभ्यता' पद की रचना इस प्रकार हुई है "सभायां साधु" 'अर्थ में सभा पद से यत् प्रत्यय लगाकर सभ्य पद निष्पन्न होता है। सभा यत्= सभ्या सभ्य पद का अर्थ है वह व्यक्ति, जो सभाओं में समाज में उचित आचरण करता है, सामाजिक व्यवहारों को जानता है और इनका पालन करता है

तथा अपने को समाज के अनुशासन में बाँधता है। "सभ्यस्य भावः " अर्थ में सभ्य शब्द से तत् प्रत्यय करके स्त्रीलिंग में सभ्यता पद की रचना होती है। सभ्य+तल्+टाप् सभ्यता। इस प्रकार सभ्यता पद का अर्थ है व्यक्तियों का सामाजिक नियमों और व्यवहारों को जानना, उनका पालन करना, समाज के योग्य समुचित आचरण करना और समाज के अनुशासन में रहना।


वर्तमान समय में सभ्यता पद का प्रयोग इससे कहीं अधिक व्यापक अर्थ में प्रचलित है। उस व्यक्ति या समाज को सभ्य कहा जाता है, जो अपने जीवन और व्यवहार में शिष्ट नियमों और परंपराओं का पालन करता हो तथा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सुधरे हुए उत्तम साधनों का प्रयोग करता हो।

किसी देश की सभ्यता उन्नत है, इसका अभिप्राय है कि उस देश में रहने वाला जन-समुदाय आचार- विचार की दृष्टि से सभ्य है, शिष्ट है। वहाँ का सामाजिक अनुशासन व्यवस्थित है। वहाँ जीवन निर्वाह के लिए, शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक सुधरे और समुन्नत वैज्ञानिक साधनों का प्रयोग होता है।


कई विद्वानों ने संस्कृति एवं सभ्यता में अंतर किया है। मेकाइबर ने मानवीय अनुभवों को संस्कृति एवं मानवीय क्रिया-कलापों को सभ्यता कहा है। मेकाइवर एवं पेज ने लिखा है “हितों का प्राथमिक तथा द्वितीयक रूप में वर्गीकरण करते हुए हम मानव के अनुभव तथा मानवीय क्रिया-कलाप इन दो महान क्षेत्रों का अन्वेषण करते हैं

जिन्हें हमने क्रमशः “संस्कृति" तथा "सभ्यता” के नाम दिये हैं। विभिन्न लेखकों की सभ्यता के संबंध में अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। कहा जाता है कि लिखने की एवं धातु के प्रयोग करने की कला के उदय के साथ सभ्यता का जन्म हुआ। जिस प्रकार लेखन कला के उदय के साथ इतिहास का जन्म हुआ उसी प्रकार उसी समय से सभ्यता का भी जन्म हुआ। सभ्यता का अर्थ नागरिक संगठनों से भी लगाया जाता था। चूँकि ऐसे संगठन बड़े नगरों में अधिक पाये जाते हैं इसलिये इन नगरों में रहने वाले लोगों को सभ्य कहा जाता था।

कुछ समाजशास्त्रियों ने संस्कृति को दो भागों में विभक्त किया है एक तो भौतिक संस्कृति जैसे मकान, कलम, रेडियो, वख, बर्तन, उपकरण, पुस्तकें एवं कलात्मक चित्र आदि एवं दूसरे अभौतिक संस्कृति जैसे भाषा, साहित्य, विज्ञान, कला, कानून, धर्म आदि मानव के अमूर्त निर्माणा इसमें मानव के जो भौतिक निर्माण हैं उन्हें अर्थात भौतिक संस्कृति को वे सभ्यता के नाम से पुकारते हैं व अभौतिक निर्माण अर्थात् अभौतिक संस्कृति को वे संस्कृति के नाम से पुकारते हैं। मेकाइवर एवं पेज ने सभ्यता का संदर्भ उपयोगी वस्तुओं से जोड़ा है। उनके अनुसार “सभ्यता से हमारा अर्थ अपने जीवन की स्थितियों को नियंत्रित करने के लिये मानव द्वारा योजित समस्त संगठन एवं यांत्रिकता है।

इस प्रकार सभ्यता में न केवल सामाजिक संगठन की हमारी प्रणाली ही सम्मिलित होती है वरन् हमारी तकनीक एवं भौतिक उपकरण भी सम्मिलित होते हैं। मत पत्र, टेलिफोन, रेलवे, विद्यालय एवं बैंक आदि सभी सभ्यता में सम्मिलित होंगे। सभ्यता में वे सब भौतिक प्रविधियाँ भी सम्मिलित होंगी जो हमारी आवश्यकता की पूर्ति के साधन के रूप में उपयोग में आती है। ए. डब्ल्यू. ग्रीन के अनुसार एक संस्कृति में (3) संस्कृति का सामाजिक गुण


सांस्कृतिक तत्व सामूहिक अनुभवों की उपज होते हैं। ये उन सामूहिक आदतों की उपज होते हैं जो समूह के व्यक्तियों में होती हैं।

व्यक्ति, व्यक्तिगत व्यवहारों के आदतन स्वरूपों को सीखता है। इसी प्रकार वह सामूहिक व्यवहार के आदतन स्वरूपों, जो प्रथात्मक सामाजिक संबंधों से उत्पन्न है को भी सीखता है। इस प्रकार संस्कृति सामाजिक संबंधों से उत्पन्न सामूहिक व्यवहारों की उपज होती है। (4) संस्कृति का आदर्शात्मक गुण


संस्कृति में सन्निहित सामूहिक आदतें बहुत सीमा तक आदर्श नियमों या आदर्श व्यवहार के यजमानों के रूप में मान्य होती हैं। इसका अर्थ यह है कि समूह के सदस्यों द्वारा संस्कृति एक आदर्श व्यवहार का ढाँचा मानी जाती है

जिससे वे सब सुसंगठित एवं एकरूपता में रहते हैं। व्यवहार में कार्यों एवं आदर्शों में अंतर दिखाई देता है, परंतु सांस्कृतिक आदर्शों की विद्यमानता इससे प्रभावित नहीं होती। (5) संस्कृति मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि करती है


संस्कृति मानव की जैवकीय व सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। एक विशिष्ट सांस्कृतिक गुण या प्रतिमान की निरंतरता उसके द्वारा पूर्ण की जाने वाली आवश्यकता पर निर्भर करती है। जिस प्रकार से व्यक्तिगत आदत तभी तक प्रचलित रहती है तब तक कि वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में मानव की चेतना या अचेतन आवश्यकताओं को पूर्ण करती है, उसी प्रकार समूह की सांस्कृतिक आदत को समूह की आवश्यकता संतुष्ट करना चाहिए।

(6) संस्कृति का अनुकूलन का गुण


संस्कृति के इस लक्षण में दो तत्व सम्मिलित हैं। (1) संस्कृति में परिवर्तन होता रहता है और (2) इस परिवर्तन के कारण संस्कृति का बाहरी शक्तियों से अनुकूलन होता है। भौगोलिक परिस्थिति के अनुरूप संस्कृति का अनुकूलन अत्यंत स्वाभाविक अनुकूलन है परंतु यह कहना बड़ा गलत होगा कि भौगोलिक पर्यावरण सांस्कृतिक विकास का निर्धारण करता है। अधिक विकसित संस्कृति पर भौगोलिक पर्यावरण प्रभावहीन होता है। कम विकसित संस्कृति को अवश्य अपने को भौगोलिक पर्यावरण के अनुरूप समायोजित करना पड़ता है।


(7) संस्कृति का एकरूपता का गुण


एक विशिष्ट संस्कृति के विभन्न भागों में एकरूपता या समन्वयन की प्रवृत्तियां होती हैं। समनर के शब्दों में एक संस्कृति के भागों में संपूर्ण संस्कृति के एक रूप होने की क्षमता होती है। एक सरल एवं पृथक संस्कृति में जिसमें बाहरी तत्व सम्मिलित नहीं होते एवं उसके मौलिक तत्वों में भी शीघ्र परिवर्तन नहीं होता, एकरूपता के गुण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।