स्मृति युगीन धर्म ,सौर संप्रदाय - memory age religion, solar sect

स्मृति युगीन धर्म ,सौर संप्रदाय - memory age religion, solar sect


सूर्य देवता के उपासक सौर कहलाते थे। प्राचीन भारत में सूर्य की उपासना भी बहुत प्रचलित थी। सूर्य की उपासना और उसका आवाहन वैदिक युग से प्रचलित रहा। 'ऋग्वेद' में सूर्य-संबंधी अनेक सूक्त हैं। यह चर-अचर के जीवन का आधार है। उत्तरवर्ती वैदिक साहित्य में भी सूर्य की विशेष स्थिति है। देवकीपुत्र कृष्ण के गुरु घोर आगिरस सूर्योपासक थे। उन्होंने सूर्य की उपासना के लिए विस्तृत निर्देश दिये थे।


अय समालोचकों का मत है कि सूर्य-पूजा तो वैदिक है, परंतु इस पर बाहर से आने वाली जातियों का भी प्रभाव है। सूर्य मंदिरों में शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को पुजारी नियुक्त किया जाता था।

मथुरा संग्रहालय में कुषाणकालीन सूर्य प्रतिमा की वेष-भूषा इसको विदेशी बताती है। हूणों के आक्रमण के समय सूर्य पूजा भारत में प्रचलित थी। यहाँ अनेक सूर्य मंदिर भी थे। ह्वेनसांग ने मुलतान में चंद्रभागा के तट पर विशाल सूर्य मंदिर देखा था। अलबेरूनी ने भी इसको देखा था। इसको अंग्रेजों ने तुड़वा दिया। काश्मीर के प्रसिद्ध मार्तंड मंदिर के भग्नावशेष अब भी विद्यमान हैं। उड़ीसा का कोणार्क का सूर्य मंदिर वास्तुकला का उत्तम नमूना है। गुप्त युग के अभिलेखों में सूर्य देवता का उल्लेख है।


पुराणों में सूर्य देवता की उपासना को महत्व दिया गया है।

पुराणों के अनुसार सूर्य की एक दिन की पूजा सैकड़ों यज्ञों के अनुष्ठानों से बढ़कर है। यह सबसे श्रेष्ठ देवता, सृष्टि का सर्जक और संहारक है। यह सारे जगत का माता-पिता और गुरु है।


अंय देवता 


'ऋग्वेद' में 33 देवता हैं जो तीन वर्गों में विभक्त हैं स्वर्गस्थानीय, अंतरिक्षस्थानीय और पृथ्वीस्थानीय । उत्तरवर्तीकाल में इनकी संख्या बहुत बढ़ गई और 33 करोड़ हो गई। पुराणों ने देवताओं की पूजा को बहुत महत्व दिया। देवताओं के स्वरूप और शक्तियों में भी बहुत परिवर्तन हुए। देवताओं के अतिरिक्त अनेक देवियों, अर्ध-देवताओं, स्थानीय देवता, नगरदेवता, वनदेवता आदि की कल्पना हुई।