स्मृति युगीन धर्म - memory age religion
स्मृति युगीन धर्म - memory age religion
स्मृति कालीन संस्कृति में धर्म को बहुत महत्व दिया गया। धर्म के अंतर्गत न केवल ईश्वरोपासना, अध्यात्म और नैतिक व्यवहार हैं, अपितु मनुष्य का व्यक्तिगत आचरण, दैनिक कर्तव्य, पारस्परिक व्यवहार और सामाजिक व्यवहार भी इसकी मर्यादा में आते हैं। विविध संस्कार, विद्याध्ययन, विवाह, माता-पिता-गुरु की सेवा आदि का समावेश धर्म में हो जाता है।
वैदिकोत्तर धर्म
उत्तरवर्ती काल में जिन विविध धर्मों या उपासना पद्धतियों का विकास हुआ। उनमें कुछ वेदानुकूल (आस्तिक) हैं और कुछ वेदविरुद्ध (नास्तिक) हैं।
वैदिक संहिताओं पुराणों, विभिन्न दार्शनिक मतों आदि के संमिश्रण से मूल वैदिक धर्म के स्थान पर विभिन्न धार्मिक संप्रदाय प्रचलित हो गये, जो देव विशेष को अपना आराध्य मानते थे। इससे वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत, सौर आदि संप्रदायों ने तथा विभिन्न देवताओं की उपासना ने जन्म लिया। ये परस्पर-विरोधी होते हुए भी वेदों को ही प्रमाण मानते थे। कुछ समय बाद इनमें परस्पर सामंजस्य भी होने लगा। तीन प्रमुख देवता हुए ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रा अंय देवता इनके अधीन हो गये। कुछ की इनके परिवार के रूप में कल्पना हुई। शक्ति को शिव की पत्नी तथा गणेश को पुत्र मान लिया गया। इस प्रकार स्मृति काल में वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत, सौर तथा अंय देवताओं की उपासना के मत प्रचलित ईसा की चतुर्थ शताब्दी तक इन संप्रदायों का विकास हो चुका था।
वैष्णव संप्रदाय
वैष्णव संप्रदाय (धर्म), जिसको भागवत धर्म भी कहा जाता है, विष्णु की भक्ति को केंद्र मानकर विकसित हुआ। वैष्णव धर्म विशुद्ध वैदिक हैं, आर्य है या इस पर आर्येतर प्रभाव भी है, इस विषय पर मतभेद हैं। विष्णु देवता का पूजन सारे भारतवर्ष में तथा बाहर के देशों में भी प्रचलित रहा। अतः इसका व्यापकत्व तो स्पष्ट है ही तथापि इस पर आर्येतर प्रभाव विचारणीय है।
'ऋग्वेद' तथा अय वैदिक साहित्य में विष्णु देवता की उपासना तो है, परंतु वह सबसे प्रमुख 'देवता नहीं है। 'ऋग्वेद' के छः सूक्तों के देवता विष्णु हैं और इनकी स्थिति इस भौतिक जगत से परे भी स्वीकार की गई।
इन्होंने तीन पगों में सारे ब्रह्मांड को नाप लिया था तथापि ऋग्वेद का मुख्य देवता इंद्र ही है। विष्णु देवता का जो रूप ऋग्वेद में है, वह उत्तरवर्ती साहित्य में नहीं है। उत्तरवर्ती साहित्य में वे अधिक प्रभावी, शक्तिशाली तथा सृष्टि की स्थिति के कारण बन गये। इंद्र के छोटे भाई (उपेंद्र) होते हुए वे इंद्र से महान हो गये । उनको यज्ञरूप माना गया।
पुराणों में विष्णु का जो रूप है तथा उनका वर्ण नीलाभ है, इसको हेतु मानकर अनेक समालोचक वैष्णव धर्म को शुद्ध आर्य नहीं मानते। सुनीतिकुमार चटर्जी और रामधारीसिंह दिनकर का कथन है
कि द्रविड़ों के किसी नीलाभ देवता के साथ आर्यों के सूर्यवाचक पद का एकीकरण होकर विष्णु के स्वरूप की कल्पना की गई। विष्णु की उपासना के संकेत वैदिक साहित्य में अवश्य हैं तथापि यह धर्म प्राग्वैदिक परंपराओं के योग से विकसित हुआ है। भंडारकर महोदय का मत है कि वैष्णव धर्म का विकास तीन तत्वों - वैदिक विष्णु (जो सूर्य का भी वाचक है), नारायण और वासुदेव के संयोग से हुआ।
समालोचकों का विचार है कि प्रारंभिक युग में वैष्णव धर्म नारायणीय धर्म रहा था।
'ऋग्वेद' और उत्तरवर्ती साहित्य में नारायण को सृष्टि के आदि रचयिता के रूप में कल्पित किया गया है।
नारायण, वासुदेव और विष्णु एक हैं। कालांतर में विष्णु का कृष्ण के साथ तादात्म्य स्थापित हुआ। उनके भक्तों ने कृष्ण को केंद्र बनाकर भक्ति-संस्कृति का विकास किया। कृष्ण को नारायण तथा अर्जुन को नर का अवतार माना गया।
'ऋग्वेद' में विष्णु परमपद के अधिष्ठाता हैं और विद्वान् ही उनको देख सकते हैं। उस परम पद में मधु का उत्स है, जहाँ देवगण आनंद प्राप्त करते हैं।
ब्राह्मण-ग्रंथों में उपनिषदों में विष्णु सभी देवताओं में श्रेष्ठ और परम पद के अधिष्ठाता कहे गये हैं। पुराणों में वे परम ब्रह्म के स्वरूप हैं। कृष्ण के साथ तादात्म्य होकर यह वैष्णव धर्म 'भागवत' कहा जाने लगा। 'छांदोग्य उपनिषद्' के अनुसार देवकीपुत्र कृष्ण ने घोर आगिरस से शिक्षा प्राप्त करके नारायण धर्म की प्रतिष्ठा की। कृष्ण वासुदेव के पुत्र थे, अतः यह धर्म वासुदेव भी कहा गया। वासुदेव का उल्लेख घटजातक अष्टाध्यायी और महाभाष्य ने किया है। पुराणों में विष्णु के विशिष्ट रूप की कल्पना हुई। वे चतुर्भज हैं। चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पधारण करते हैं। गले में वनमाला तथा वक्ष पर कौस्तुभ मणि सुशोभित होती है। सिर पर मयूर मुकुट तथा शरीर पर पीताम्बर होता है। नाभि में कमल रहता है। शरीर का वर्ण नील है। ये शेष शय्या पर शयन करते हैं। इनके वामांग में लक्ष्मी विराजती हैं। इनका वाहन गरुड़ है।
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