स्मृति युगीन समाज - memory era society
स्मृति युगीन समाज - memory era society
आर्य और अनार्य
मनुस्मृति के अनुसार समाज में दो मोटे भाग थे, प्रथम आर्य लोग दूसरे अनार्य लोग। आर्य नगरों और ग्रामों में निवास करते थे, पर अनार्य प्रायः बस्तियों से बाहर रहते थे। उनमें से कई एक स्थान से दूसरे स्थान तक अपना सब सामान साथ लिये भ्रमण करते थे। इनका जीवन भ्रमणशील और अस्थायी था। वे अपने साथ गधे और कुत्ते भी रखते थे। ये सुसंस्कृत नहीं होते थे। कुछ अनार्य पहाड़ों और वनों की उपत्यकाओं में भी रहते थे। जो अनार्य गाँवों या नगरों में रहते थे उन्हें म्लेच्छ या दस्यु कहा जाता था। इसमें कुछ चांडाल और नीच कर्म करने वाले लोग भी सम्मिलित थे। इनमें से कतिपय शमशान के निकट भी करते थे। शवों को उठाने, लाने ले जाने में वे सहायता करते थे। सफाई के कार्य भी वे करते थे।
आर्य समृद्ध और संपन्न होते थे। जीवन के सभी क्षेत्रों में वे सर्वोपरि थे, समाज में उनका बोलबाला था। अनार्यों को वे हीन दृष्टि से देखते थे।
चतुर्वर्ण व्यवस्था
आर्यों के समाज का मूल आधार चतुर्वर्ण व्यवस्था थी। समाज में चार वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। सभी स्मृति ग्रंथों में इस चतुर्वर्ण-व्यवस्था का विस्तृत रूप से विवेचन है। प्रत्येक वर्ण के अधिकार, कर्तव्य, नियम, निषेध, विधि-विधान आदि स्मृतियों में प्रतिपादित किये गये हैं। समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वश्रेष्ठ था। मनुस्मृति में उनके छः प्रमुख कार्य बताये गये हैं जैसे वे स्वयं यज्ञ करना तथा अय व्यक्तियों से करवाना,
अध्ययन-अध्यापन, दान लेना एवं देना आदि। राज्य और समाज में ब्राह्मण सम्माननीय पदों पर रहते थे। वे पुरोहित, राजमंत्री, आचार्य, अध्यापक, न्यायाधीश, निर्धारक, निर्णायक, आमात्य आदि होते थे। याज्ञवल्क्य ने ब्राह्मणों की उन शालाओं और आश्रमों का उल्लेख किया है जहाँ ब्राह्मण वेदों के अध्ययन और अध्यापन कार्य में संलग्न रहते थे। ब्राह्मणों से ऐसी आशा की जाती थी कि उनका जीवन सादा, सरल, सच्चरित्र, संयमी और श्रेष्ठ होगा। वे प्रकांड विद्वान होंगे और अध्यात्मिकता के विषयों में प्रवीण होंगे। समयानुकूल वे सन्यासी जीवन भी व्यतीत करेंगे। उनकी इसी श्रेष्ठता और आध्यात्मिकता के कारण ही मनु ने उन्हें करमुक्त कर प्राणदंड से मुक्त किया है।
ब्राह्मणों से नीचे क्षत्रिय वर्ण के लोग थे। स्मृतियों में इनके विविध कर्तव्य बताये गये हैं, जैसे यज्ञ और अनुष्ठान करवाना, धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों का अध्ययन करना, अपने ज्ञान और बुद्धि-विवेक की वृद्धि करना, प्रशासन करना, शांति और व्यवस्था बनाये रखना, प्रजा की रक्षा करना, शौर्य और साहस से युद्ध करके देश और राज्य की रक्षा करना एवं सत्य और धर्म की रक्षा करना आदि। क्षत्रियों से नीचे वैश्य वर्ण के लोग थे। वैश्य वर्ण समाज का सबसे बड़ा अंग था। समाज में बहुसंख्यक लोग वैश्य थे। स्मृतियों में उनके अधिकारों और कर्तव्यों का उल्लेख है। उनके प्रमुख कर्तव्य थे कृषि करना और पशु-पालना, यज्ञ, - हवन तथा अंय धार्मिक कार्य करना,
आयात और निर्यात करना, व्यापार वाणिज्य करना, विविध व्यवसायों, उद्योगों और धंधों को करना, साझेदारी से व्यापार करना तथा अंय व्यवसाय करना, ब्याज पर ऋण देना, समयानुकूल व्यापार हेतु समुद्री यात्राएं करना आदि। वे देश और राज्य की धन-संपन्नता और समृद्धि की वृद्धि करने में योग देते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण में भी जातियाँ थीं। उनके भी कर्तव्य और अधिकार थे। इन तीनों वर्णों के लोग द्विज कहलाते थे। चैथे वर्ण में शूद्र थे। इस वर्ण में आर्य और अनार्य दोनों का ही संमिश्रण था। समाज में शूद्र लोग भी बहुसंख्यक थे। इसमें कुछ दास लोग भी थे। दासों या दस्युओं की भी विविध श्रेणियाँ थीं। मनुस्मृति में दासों की सात श्रेणियों का उल्लेख है, पर नारद-स्मृति में पंद्रह श्रेणियों का दास विविध प्रकार से बनाये जाते थे,
जैसे ऋण की धन राशि न देने पर बनाये गये दास, युद्ध बंदी में जो दास बनाये जाते थे, क्रय-विक्रय में प्राप्त दास, वसीयत में प्राप्त कुलागत दास आदि। दासों को संपत्ति रखने का अधिकार नहीं था। दासों और शूद्रों का प्रमुख कार्य तीनों वर्णों के लोगों की सेवा करना, निम्न स्तर के माने जाने वाले धंदे करना, ग्रामों और नगरों में स्वच्छता और सफाई के कार्य करना आदि। पर-पुरुष गमन, अनुपयुक्त स्त्रियों से विवाह, प्रतिलोम और अनुलोम विवाह के कारण जो वर्णसंकर उत्पन्न हो गये थे, उन्हें भी शूद्रों के वर्ण में सम्मिलित कर लिया गया था। समाज में वर्णसंकरों का एक अलग ही समुदाय बन गया था। हीन धंधों को करने वाले शूद्रों में म्लेच्छ, श्वपच और अंत्यज कहा जाता था।
ये अछूत से थे। स्मृति में उल्लेख है कि उच्च वर्ग के लोगों को म्लेच्छों और अन्त्यजों से परस्पर वार्तालाप करने का निषेध था। रात्रि के समय ऐसे शूद्र व्यक्ति ग्रामों या नगरों में नहीं आते थे। उन पर नियंत्रण था। उनकी वेश-भूषा और आने-जाने पर भी बंधन थे। शूद्रों को वेदों और धर्म-शास्त्रों के अध्ययन की आज्ञा नहीं थी। वे सभी संस्कार भी नहीं कर सकते थे, पर श्राद्ध कर सकते थे।
आश्रम प्रणाली
चतुर्वर्ण से संबंधित आश्रम - प्रणाली भी थी। इन दोनों के वर्णाश्रम धर्म कहा जाता था। लोगों का समस्त जीवन इस वर्णाश्रम धर्म पर आधारित था। समाज का संगठन वर्णाश्रम के सिद्धांतों पर किया गया था। द्विजों को ब्रह्मचर्य आश्रम,
गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम की प्रथा और प्रत्येक आश्रम के विधि-विधान का सविस्तृत विश्लेषण स्मृति ग्रंथों में है। ब्रह्मचर्य आश्रम की अवधि केवल विद्याध्ययन तथा चरित्र-निर्माण के लिए मानी गयी थी। मनु के उपनयन संस्कार के पश्चात् ब्रह्मचर्य आश्रम का प्रारंभ बताया है। उपनयन संस्कार की आठ वर्ष, क्षत्रियों के लिए म्यारह वर्ष और वैश्यों के लिए बारह वर्ष की आयु मानी गयी।
ब्रह्मचर्य आश्रम के पश्चात् गृहस्थाश्रम था। इस काल में विवाह करके पारिवारिक जीवन व्यतीत किया जाता था। गृहस्थ के विविध कर्तव्यों और अधिकारों का भी विस्तृत विवेचन स्मृति ग्रंथों में हैं। गृहस्थ को संतानोत्पत्ति, अतिथि सत्कार, यज्ञ, हवन, अनुष्ठान,
विविध संस्कार, धार्मिक और सामाजिक क्रियाविधियाँ आदि कार्य करने पड़ते थे। गृहस्थाश्रम को त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम और बाद में सन्यास आश्रम अपनाना पड़ता था। सन्यास आश्रम परब्रह्म और सत्य की खोज के लिए था। उसमें रहकर मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास किये जाते थे। मनु ने शूद्रों के लिए सन्यास आश्रम का निषेध किया है, परंतु विष्णु- स्मृति में "काल्पनिक" और शूद्र सन्यासियों का उल्लेख है।
नारी की स्थिति
विभिन्न स्मृति ग्रंथों में स्त्रियों के कर्तव्यों और अधिकारों के विषय में विविध मत प्रतिपादित किये गये है। मनु ने समाज में स्त्रियों को प्रतिष्ठित स्थान नहीं दिया। उन्होंने वैदिक युग में प्रचलित स्त्रियों की स्वतंत्रता पर नियंत्रण और बंधन लगा दिये।
उन्होंने स्त्रियों की परतंत्रता का समर्थन किया। उनका मत है कि विवाह से पूर्व कुमारी अवस्था में स्त्री की रक्षा पिता या भाई करता है, उन पर स्त्री आश्रित रहती है, यौवनावस्था में विवाह के पश्चात् वह पति के नियंत्रण और रक्षा में रहती है और पति की मृत्यु के बाद वह अपने पुत्रों पर आश्रित रहती है, वे ही उसकी रक्षा करते हैं। स्त्री की स्वतंत्रता में कमी करने के साथ-साथ मनु ने स्त्री को दुर्गुण वाली बताया। उनका कथन है कि स्त्रियाँ स्वभाव से ही मनुष्यों को बुरी आदतों में संलग्न कर देती हैं। उनके विचारों में स्त्रियों में स्थिरता और दृढता का अभाव होने से उन पर विश्वास भी नहीं किया जा सकता और वे साक्ष्य देने के योग्य नहीं है। परंतु अंय स्मृतिकारों ने स्त्रियों के सामाजिक स्तर को इतना नहीं गिराया। विवाह के संबंधमें विभिन्न स्मृतिकारों में मतभेद हैं।
मनुस्मृति में बाल विवाह का समर्थन किया गया है। आठ से बारह वर्ष की अवस्था में कन्या का विवाह करना मनु ने उचित बताया। विवाह के समय वर-वधू की आयु कितनी होनी चाहिए इस ओर भी मनु ने संकेत किया। कन्या की आयु से वर की दूनी या इससे भी थोड़ी अधिक आयु को मनु ने मान्यता दी। कुछ पिता विवाह के समय कन्यादान के बदले में वर-पक्ष से धन लेते थे। इस प्रकार कन्या का विक्रय होता था। मनु ने कहीं-कहीं कन्या के विक्रय का समर्थन किया है तो अंयंत्र उन्होंने उसका विरोध भी किया है। मनुस्मृति में यह भी लिखा है कि "एक दास को भी अपनी कन्या के लिए मूल्य नहीं लेना चाहिए।" इससे प्रकट होता है
कि तत्कालीन समाज में कुछ लोग वर पक्ष से धन लेकर कन्याओं का विवाह करते थे। स्मृतिकारों ने स्त्री के पातिव्रत्य धर्म और सतीत्व का अधिक महत्व बताया। स्त्री से श्रेष्ठ आदर्श, नैतिकता और पातिव्रत्य धर्म की अपेक्षा की जाती थी। पथभ्रष्ट और व्याभिचारिणी स्त्री के लिए मृत्युदंड की व्यवस्था मानी गयी थी। विधवा विवाह और नियोग के विषयों में भी स्मृतिकारों में मतभेद हैं। मनुस्मृति में विधवा विवाह और नियोग प्रथा दोनों का समर्थन नहीं किया गया। नियोग प्रथा से तात्पर्य है कि विधवा स्त्री पुत्र प्राप्ति की इच्छा से अपने देवर के साथ और यदि देवर न हो तो सगोत्र या सजातीय पुरुष के साथ संबंध स्थापित कर सकती है। पति के नपुंसक या असाध्य रोगी होने पर भी स्त्री पुत्र प्राप्ति के लिए नियोग कर सकती है, परंतु नारद और याज्ञवल्क्य स्मृति में विधवा-विवाह और नियोग दोनों का समर्थन किया गया है। मनु ने ब्राह्मण को शूद्र की कन्या से विवाह करने की अनुमति दे दी,
पर याज्ञवल्क्य ने ऐसे विवाह को ठीक नहीं माना है। यद्यपि स्मृतियों में स्त्रियों की स्वतंत्रता पर नियंत्रणों का अनुमोदन किया गया है, परंतु उनके मुख पर अवगुण्ठन या पर्दा प्रथा का कहीं पर समर्थन नहीं किया गया है। सती प्रथा का भी विस्तृत विवेचन नहीं है। इससे प्रतीत होता है कि समाज में सती प्रथा और पर्दा प्रथा प्रचलित नहीं था। स्त्रियों के अधिकारों के विषय में भी स्मृतिकारों में मतभेद हैं। मनुस्मृति में स्त्री को संपत्ति रखने या उसका क्रय-विक्रय करने का अधिकार नहीं दिया गया है। मनु स्त्री को केवल उस संपत्ति की अधिकारिणी मानते हैं जो उसे विवाह के समय प्राप्त हुई हो। इसे स्त्री-धन कहा गया है। मनु ने विधवाओं के संपत्ति अधिकार को नहीं माना, परंतु याज्ञवल्क्य ने विधवाओं के अधिकारों का स्पष्ट रूप से वर्णन किया है। याज्ञवल्क्य का मत है
कि स्त्री अपने पति की संपत्ति की उत्तराधिकारिणी है। विभिन्न स्मृतियों में वर्णित स्त्रियों के अधिकारों, कर्तव्यों और दशाओं का अवलोकन करने से प्रतीत होता है कि स्मृतियों के युग में स्त्रियों की दशा वैदिका काल की अपेक्षा अच्छी नहीं थी। वैदिक काल के समाज में स्त्रियों के जो समान अधिकार थे, उन्हें जो स्वतंत्रता थी, समाज में उनकी जो प्रतिष्ठा थी वह स्मृतियों के काल में कम हो गयी थी। उनकी दशा संतोषप्रद नहीं थी।
आचार-विचार की श्रेष्ठता
इस युग में जीवन का आदर्श सदाचार माना गया था। वशिष्ठ धर्मसूत्र (6-2-6) में कहा गया है कि यदि मानव का आचार-विचार ठीक न हो तो उसे स्वाध्याय,
यज्ञ, दान आदि भी पतन से नहीं बचा सकते। वशिष्ठ ने आचार-विचार की उच्च प्रतिष्ठा का समर्थन किया। उनके मतानुसार चारों आश्रमों के व्यक्तियों को ईष्र्या, द्वेष, निंदा, गर्व, अहं भाव, कुटिलता, आत्मप्रशंसा, लोभ, प्रवंचना, मोह, क्रोध, द्रोह आदि त्यागना चाहिए, दूरदर्शी बनना चाहिए सर्वोच्च पद की ओर लक्ष्य रखना चाहिए, इधर-उधर नहीं। बौधायन धर्मसूत्र में कहा गया है कि सदाचार के द्वारा स्वर्ग की प्राप्ति संभव है। यदि पुरुष उदार हो, उसका हृदय कोमल हो और उसमें आर्जव की आशा हो तो वह जहाँ रहता है, वहाँ स्वर्ग है।
जाति प्रथा की नींव
रामायण और महाभारत तथा स्मृति ग्रंथों की सामग्री से आभास होता है कि स्मृति काल में नवीन सामाजिक और धार्मिक विश्वासों और संस्थाओं की नींव रख दी गयी थी। जाति प्रथा भी इनमें से एक थी। भारतीय इतिहास और संस्कृति में जाति प्रथा का बड़ा हाथ रहा है।
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