जाति प्रथा की उत्पत्ति - Origin of caste system
जाति प्रथा की उत्पत्ति - Origin of caste system
जाति प्रथा का प्रारंभ किस रूप में और कब हुआ यह निर्दिष्ट रूप से ठीक-ठीक कहना दुष्कर है। विश्लेषण और अनुसंधान से प्रतीत होता है कि निम्नलिखित तत्व जाति प्रथा की उत्पत्ति और विकास का प्रमुख आधार रहा।
श्रम विभाजन
उत्तर- वैदिक युग में आर्यों के कबीलों के प्रमुख बड़े-बड़े शासक बन गये। ये शानदार राजप्रासादों और राज सभाओं में रहने लगे। युद्ध में बढ़ते हुए प्रशासन में वे अधिक संलग्न रहने लगे। फलतः वे अपने धार्मिक कार्य और यज्ञ आदि करने में असमर्थ थे।
इसी प्रकार साधारण मनुष्य भी अपने वैदिक कृत्यों में इतना अधिक संलग्न रहने लगा कि वह भी अपने धार्मिक कार्यों के करने में असमर्थ हो गया। धीरे-धीरे वेदों की पवित्र ऋचाओं और उनके वास्तविक उचित महत्व को भी समझना उनके लिए कुकर हो गया। इसी बीच धार्मिक कार्य करने वाले पुरोहितों ने कर्मकांड और धार्मिक क्रिया-विधियों में खूब वृद्धि कर दी, उन्हें अधिक जटिल, गूढ़ और रहस्यमय बना दिया। इसीलिए ऋग्वेद काल के पुरोहित वर्ग के उत्तराधिकारियों में धार्मिक कार्यों में सिद्धहस्त विशेषज्ञों के समुदाय का प्रादुर्भाव हुआ।
ये इतने प्रवीण थे कि नवीन परिवर्तित और परिवर्द्धित धार्मिक क्रिया-विधियों, यज्ञों, हवनों को समुचित रूप से कर सकते थे। इन विशेषज्ञों के हाथों में समाज के धार्मिक और आध्यात्मिक कार्य होने से इन्होंने यज्ञ, पूजन, स्तुति, आराधना, कर्मकांड आदि की विशद और विस्तृत क्रिया-विधियों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया एवं इनके लिए उन्होंने अपना समस्त जीवन अर्पण कर दिया। इस प्रकार इन्होंने धार्मिक कार्यों को उनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म विधान सहित संपादित करने के लिए विशिष्ट ज्ञान प्राप्त कर लिया। ऐसी दशा में यह स्वाभाविक ही था कि इन लोगों ने आर्यों के समाज के अंय लोगों की अपेक्षा, जो अपने सांसारिक कार्यों में अधिक संलग्न थे, अलग उच्च प्रतिष्ठित पद प्राप्त कर लिया था। समाज में वे अपने वेदों, धर्मशास्त्रों के अध्ययन, अध्यापन, यज्ञों व धार्मिक कार्यों के विधिवत् संपादन प्रकांड विद्वत्ता, सच्चरित्रता आदि के लिए सर्वोपरि और सर्वमान्य हो गये। ब्राह्मण जाति के बाद में होने वाले उत्कर्ष और सर्वोपरिता का यही कारण है।
श्रम विभाजन के आधार पर क्षत्रियों का भी प्रादुर्भाव हुआ। ऋग्वेद काल की प्रारंभिक सदियों में जातीय युद्धों के समय प्रत्येक स्वस्थ शरीर व्यक्ति रणक्षेत्र में अपनी जाति के प्रमुख या नेता के साथ जाता था और युद्ध करता था, शांति के समय वह कृषि और पशु-पालन के कार्य करता था, परंतु आर्यों के प्रसार एवं निरंतर वृद्धि और राज्य सीमाओं के विस्तार के फलस्वरूप आर्य नरेशों और शासकों को ऐसे प्रशिक्षित और रणकुशल सैनिकों को सदा अपनी सेवा में रखने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिनकी सेवाएँ किसी भी क्षण अवसर आने पर प्राप्त हो सकें। ऐसे व्यक्तियों के समुदायों पर ही रक्षा कार्य और युद्ध का भार पड़ा। इस प्रकार कालांतर में सैनिकों और योद्धाओं के इस वर्ग ने अपनी सामाजिक और राजनीतिक परंपराओं सहित अपने एक पृथक वर्ग का निर्माण कर लिया और ये क्षत्रिय नाम से प्रतिष्ठित हुए।
आर्यों के समाज के ब्राह्मणों और क्षत्रियों को छोड़कर शेष लोग जो वाणिज्य व्यापार, विविध उद्योग-धंदे तथा कृषि और पशुपालन करते थे वैश्य कहलाये। समाज में इन्हें क्षत्रियों की अपेक्षा निम्न स्तर प्राप्त हुआ। समाज में ऐसे श्याम वर्ग के अनार्य थे जो आर्यों से पराजित हो गये थे और आर्य इन्हें दस्यु कहते थे। यह दास वर्ण था। जब आर्यों ने इस वर्ण को अपना लिया तो ये शूद्र कहलाये। समाज का यह चतुर्थ वर्ग था जिसका कर्तव्य समाज से अंय तीन वर्गों के लोगों की सेवा करना था। ये ऐसे कार्य और पेशे भी करते थे जो हेय और निम्न स्तर के थे। मानव समाज में आर्थिक आवश्यकताओं के अनुसार वैश्य और शूद्र वर्णों के लोग अपनी क्षमता के अनुसार विभिन्न व्यवसाय करने लगे और उनके पेशेवर विविध समूह बन गये जो बाद में जातियाँ कहलायीं। इस प्रकार जाति प्रथा का आधार लोगों द्वारा अपनाये जाने वाले भिन्न-भिन्न पेशे थे, जैसे- पुरोहिती, लुहारी, सुतारी, दास-कर्म, बुनकरी आदि।
इस भाँति जाति प्रथा का निर्माण आवश्यकतानुसार श्रम विभाजन के आधार पर हुआ। विभेद और विभाजन का मूल व्यवसाय और उद्योग-धंदे थे। मनुष्य का वर्ग उसके व्यवसाय से निश्चित होता था। व्यवसाय जन्म से निश्चित नहीं होते थे। एक ही वर्ग या वर्ण के लोग भिन्न-भिन्न व्यवसाय कर सकते थे। ऋग्वेद की एक ऋचा के रचयिता का उल्लेख है कि “मैं ऋचाओं का रचयिता हूँ, मेरा पिता वैद्य हैं और माँ चक्की पीसती है। हम सभी विभिन्न कार्यों में लगे हैं।" यह कथन इस ओर संकेत करता है कि एक ही परिवार में लोग विविध व्यवसाय करते थे। व्यवसाय परिवर्तन सरल था। महाकाव्य काल तक विभिन्न या वर्णों में खानपान, सहभोज और वैवाहिक संबंधप्रचलित थे, परंतु तीन उच्च वर्गों और शूद्रों के निम्न वर्ग में परस्पर स्वतंत्र सामाजिक व्यवहार अनुचित समझा जाता था। धर्मशास्त्रों के युग और मनु के पश्चात् जाति प्रथा की जटिलता और संकीर्णता में वृद्धि होने लगी।
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