महाकाव्यों का रचनाकाल - period of creation of epics
महाकाव्यों का रचनाकाल - period of creation of epics
प्राचीन आर्यों की ऐतिहासिक गाथाएँ, आख्यान, अनुश्रुति दो मुख्य महाकाव्यों रामायण और महाभारत में संग्रहीत हैं। इन ग्रंथों का रचनाकाल के अनुसार रामायण अधिक प्राचीन है। इन महाकाव्यों के रचनाकाल को निश्चयपूर्वक बतलाना एक अत्यंत जटिल विषय है। इतिहासकारों ने यह स्पष्ट किया है कि मूल वाल्मीकीय रामायण में केवल पाँच कांड ही थे तथा उनमें से दो कांड प्रथम एवं सप्तम बाद में जोड़े गए हैं। मूल ग्रंथ में हम जिस काव्य का उल्लेख पाते हैं उनमें रामचंद्र को एक आदर्श पुरुष मानकर चित्रित किया गया है, किंतु शेष दोनों कांडों में उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। मूल ग्रंथ एवं बाद के दोनों कांडों के रचनाकाल में समय का अंतर होना एक साधारण सी बात प्रतीत होती है। कहा जाता है कि भाषा भी वैदिक काल के बाद की है।
आधुनिक विद्वानों की धारणानुसार महाभारत जैसे विशाल ग्रंथ की रचना किसी कवि द्वारा नहीं की गई है। इसमें समय-समय पर विभिन्न कवियों द्वारा संशोधन किया गया है। महाभारत की कविता रामायण के समान परिष्कृत नहीं है। यह ब्राह्मण एवं उपनिषद ग्रंथों से ही मिलती जुलती भाषा है किंतु कहीं-कहीं और प्राचीन है। मूल महाभारत में लगभग 8800 श्लोक थे। बाद में चौबीस हजार श्लोक हो गया। ये ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित थे। संभवतः महाभारत के मूल श्लोकों में अन्य वीर गाथाओं, धार्मिक एवं दार्शनिक विचारों को समय-समय पर काव्य के रूप में जोड़े गए।
अब इसमें एक लाख श्लोकों का संकलन पाया जाता है और ये विशाल रूप ले चुका है। इसे शतसाहस्त्री संहिता की संज्ञा दी गई है। मूल कथा की रचना महाभारत युद्ध के काल में अथवा ईसा से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व महर्षि व्यास द्वारा की गई थी। इस ग्रंथ में यवन, पह्नव, शक आदि विजातियों की भी चर्चा मिलती है, जिन्होंने ईसा के लगभग सौ वर्ष पूर्व इस देश में प्रवेश किया था।
आज के महाभारत का जो स्वरूप है उसके अनुसार लगता है कि इसके अधिकांश भाग ईसा के बाद के चार सौ वर्षों में संकलित किए गए।
इसमें सारी घटनाओं की व्याख्या अच्छे ढंग से की गई है। बहुत से तथ्य तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक इतिहास की रचना के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
विद्वान इतिहासकारों के अनुसार संपूर्ण महाभारत भिन्न-भिन्न कालों में लिखा गया। इसमें वर्णित सुसंगठित एवं विकसित समाज की चर्चा मौर्य एवं गुप्तकाल की है। भारत में सिंधु घाटी सभ्यता के बाद नगरीकरण का द्वितीय चरण डेढ़ हजार वर्ष के बाद छठी शताब्दी ईसा पूर्व से प्रारंभ हुआ।
अतः महाभारत में वर्णित भारतवर्ष के नगर छठी शताब्दी ई. पू. से लेकर ईस्वी सन् की चौथी पाँचवी शताब्दी के बीच के हैं।
महाभारत की बहुत ही प्रमुख उपपरिणामों में से एक है— श्रीमद्भागवत गीता, जिसमें कृष्ण समाज के सभी वर्णों को अपना कर्तव्य ईमानदारीपूर्वक करने का उपदेश देते हैं। उनके अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए अगर किसी की जान तक लेनी पड़े तो वह भी करना चाहिए। महाभारत में यह भी वर्णित है कि ही वैश्य पाप से मुक्ति पाते थे, जो अपने उपज का छठा भाग ब्राह्मणों को दान देते थे। बौद्धकाल से गुप्तकाल तक हम पाते हैं कि वैश्य ही मुख्य रूप से कर दाता थे।
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