जैन धर्म के सिद्धांत - principles of jainism

 जैन धर्म के सिद्धांत - principles of jainism


बौद्ध धर्म की भाँति जैन धर्म भी निवृत्तिमार्गी था। महावीर ने मानव संस्कृति को अहिंसा, त्याग तथा तप का जो वरदान दिया है, वह एक महत्वपूर्ण आदर्श रहा है। महावीर के सिद्धांत अधिकांशतः प्रायोगिक हैं, परंतु दार्शनिक भी हैं।


तत्व इस विश्व में सात प्रकार के तत्व हैं-


जीव - जैन जीव को अनादि और अनन्त मानते हैं। आत्मा या जीव के तीन स्वाभाविक गुण हैं।


- सम्यक् ध्यान, सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् आचरण । परंतु समस्त आत्मा में ये तीनों गुण अपने स्वाभाविक रूप में इसलिए नहीं मिलते कि कर्मों का आवरण उन्हें ढके रहता है। संसार में अनगिनत जीव हैं और सब समान हैं।

अजीव - अजीव अचेतन है। अजीव के अंतर्गत पाँच चीजें सम्मिलित हैं- पुद्गल (पदार्थ), आकाश, करता है। धर्म, अधर्म तथा काल (समय) विश्व जीव और अजीव के घात प्रतिघात से चलता तथा कार्य


आस्रव आस्रव अर्थात् कर्म संस्कार। राग, द्वेश व मोह आदि से प्रेरित होकर किए गए कर्मों की तरफ भी जीव का प्रवाह रहता है। इसे आस्रव कहा जाता है। शरीर, वाणी और मन से आस्रव स्फुटित होता है।


बन्ध - कर्म संस्कार द्वारा आत्मा शरीर का बन्ध नही बंधन कहलाता है। अतः कर्म ही बंधन का कारण है।

संवर- राग द्वेश आदि के प्रभाव से कर्म के आसव को रोकने को ही संवर कहते हैं। इसके द्वारा जीव पर कर्मों का प्रभाव रोकने का प्रयास किया जाता है।


निर्जरा - पूर्व जन्म के संचित कर्मों से छुटकारा पाने के लिए तप, योग करना ही निर्जरा है। 


मोक्ष - कर्म बंधन (भले बुरे हर प्रकार के कर्म) से मुक्ति पाने को मोक्ष कहते हैं। जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने पूर्व जन्म के कर्मों का नाश करना चाहिए तथा इस जन्म में कोई नए कर्म नहीं करने चाहिए। इस प्रकार वह मोक्ष प्राप्त कर जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो सकता है।


पंच अणुव्रत - जैन गृहस्थों के लिए भी पाँच व्रत प्रतिपादित किए गए, परंतु यह समझकर कि भिक्षुओं की भाँति गृहस्थ अति कठोर व्रत का पालन नहीं कर सकेंगे, इनके लिए कठोरता कुछ कम कर दी गई। उन्हें भी सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है। अहिंसा के अनुसार मन, वचन और कर्म से किसी भी प्रकार की हिंसा न करें, सदा सत्य एवं मधुर बोलना चाहिए। अपरिग्रह में उनसे आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ संग्रहीत नहीं करने को कहा गया है। गृहस्थों के लिए यह तो आवश्यक है कि वे धनोपार्जन करें, पर उसी में लिप्त हो जाना और अर्थ संग्रह के पीछे भागना उचित नहीं है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है, सभी प्रकार के काम अर्थात् विषयवासना को त्याग देना। विषयवासना की बात न तो मन में लाएँ और न ही इस विषय में बातचीत करें।


सात शीलव्रत - अणुव्रतों का पालन तो गृहस्थों को करना ही चाहिए, साथ ही समय-समय पर अधिक कठोर व्रतों को ग्रहण करना भी उपयोगी है। अतः सात शीलव्रत भी बताए गए हैं। इन शीलव्रतों के दो भाग हैं- पहला गुणव्रत और दूसरा शिक्षाव्रत। इनका पालन करके गृहस्थ अपना जीवन उन्नत कर सकते हैं।


पंच महाव्रत- महावीर ने सर्वसाधारण के लिए पाँच नियम बताए, जिसको पंच महाव्रत कहते हैं। अहिंसा महाव्रत जानबूझकर अथवा अनजान में भी किसी प्रकार की हिंसा नहीं होनी चाहिए। इसका तात्पर्य है मन, वचन तथा कर्म से किसी भी व्यक्ति को कोई कष्ट न पहुँचाना। असत्य त्याग महाव्रत भाषण सदा सत्य हो और साथ में मधुर भी।


अस्तेय महाव्रत अनुमति बिना किसी अन्य की वस्तु न ग्रहण करें और न ग्रहण करने की इच्छा भी करें। इसका तात्पर्य है- चोरी न करना ।


अपरिग्रह- इसके अनुसार किसी भी प्रकार का संग्रह नहीं करना चाहिए। इससे आसक्ति की उत्पत्ति होती है।


धन-धान्य, वस्त्राभरण सभी परित्याज्य हैं।


ब्रह्मचर्य - भिक्षु के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अति आवश्यक है।


त्रिरत्न - जैन धर्म के सिद्धांतानुसार मोक्ष प्राप्त करने का लक्ष्य 'त्रिरत्न' के अनुशीलन और अभ्यास से प्राप्त होता है। ये त्रिरत्न हैं-


(1) सम्यक् ज्ञान इसका तात्पर्य है सत्य का ज्ञान, जो तीर्थंकरों के उपदेशों के अध्ययन से प्राप्त होता है।


 (2) सम्यक् ध्यान – इसका तात्पर्य है मनुष्य को तीर्थंकरों के उपदेशों में विश्वास रखना चाहिए तथा दृढ़ता व निष्ठा के साथ उनकी पूजा करनी चाहिए।


 ( 3 ) सम्यक् आचरण इसका तात्पर्य है कि मनुष्य को सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य इन



पाँच महाव्रतों के अनुसार जीवन बिताने का प्रयास करना चाहिए।


कर्म और पुनर्जन्म जैन धर्म कर्म व पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करता है।

इसके अनुसार पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार मनुष्य का निरंतर पुनर्जन्म होता रहता है तथा वह जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है। उसके सारे सुख दुःख कर्म के कारण ही हैं। अतः मनुष्य को अच्छे कर्म करके मोक्ष प्राप्त करके जन्म मरण के बंधन से छुटकारा प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। कर्मफल से विमुक्ति ही निर्वाण प्राप्ति का साधन है।


अनेकात्मवाद - जैन धर्म के अनुसार जिस प्रकार जीव भिन्न-भिन्न होते हैं, उसी प्रकार उनमें आत्मा भी भिन्न-भिन्न होती है। यह धर्म आत्मैक्य के ऊपर विश्वास नहीं करता है।

इनके अनुसार यदि समस्त जीवों में केवल एक ही आत्मा होती तो ये एक दूसरे से पृथक रूप में न पहचाने जा सकते और न ही उनकी गतिविधियाँ भिन्न-भिन्न होती। यह धर्म पेड़ पौधों में भी आत्मा मानता है। इनके अनुसार आत्मा अजर-अमर है।


द्वैतवाद - जैन धर्म के अनुसार मनुष्य का निर्माण शरीर तथा आत्मा से मिलकर होता है। शरीर नाशवान तथा आत्मा अमर है। कर्मों का फल भोगने के लिए आत्मा निरंतर नए शरीर धारण करती रहती है। जब किसी कर्म का फल भोगना शेष नहीं रहता है, तब आत्मा पवित्र होकर मोक्ष प्राप्त कर लेती है।


स्याद्वाद – स्याद्वाद या अनेकांतवाद के अनुसार प्रत्येक वस्तु के अनंत रूप पक्ष तथा गुण हैं. जिनका पूर्ण ज्ञान मोक्ष प्राप्ति के बाद हो पाता है। किसी भी वस्तु का एक ही पक्ष दिख पाता है। प्रत्येक पक्ष या दृष्टिकोण में सत्य का अंश अवश्य होता है। कोई भी मत पूर्ण नहीं होता। अतः व्यक्ति को दूसरे के मतों का भी सम्मान करना चाहिए। विद्वानों ने इस दृष्टिकोण को बहुत उदार माना है।


ईश्वर और सृष्टि जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्व में अविश्वास करता है, अतः उसे अनीश्वरवादी कहा गया है। जैन धर्म के अनुसार संसार वास्तविक है, इसका मूलतः कभी विनाश नहीं होता है।

जिसे सामान्य रूप से विनाश समझा जाता है, वह परिवर्तन है। संसार में मूलतः 6 द्रव्यों का समुदाय है- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। यह द्रव्य अनश्वर हैं और शास्वत हैं। मनुष्य की आत्मा में ही संपूर्ण शक्ति निहित है और इसमें ईश्वर का कोई हस्तक्षेप नहीं है। अतः संसार भी नित्य और अनश्वर है।


अहिंसा जैन धर्म परम अहिंसा में विश्वास करता था। उनके अनुसार पृथ्वीकाय, जलकाय, वायुकाय, अग्निकाय, वनस्पतिकाय और त्रस जीव (चलने फिरने वाले), इन सभी प्रकार के जीवों के प्रति संयमपूर्ण व्यवहार ही अहिंसा है।

इस परिभाषा के अनुसार प्राणी मात्र के प्रति मन, वचन और कर्म से किया गया कोई भी असंयत आचरण हिंसा है। कुछ जैन इस भय से अपने नाक मुँह पर पट्टी बाँधने लगे कि कहीं कोई किटाणु साँस लेते समय वायु के साथ भीतर जाकर मर न जाए। इसी प्रकार चलते समय भूमि पर झाडू लगाने लगे, जिससे कि कोई कीट उनके पैरों के नीचे पड़कर मर न जाए। 


काया- क्लेश- महावीर के अनुसार मनुष्य घोर तपस्या व उपवास द्वारा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रख सकता है। जैन धर्म का विश्वास है कि जीव के भौतिक तत्व का दमन करने के लिए काया-क्लेश आवश्यक है।

अतः जैन-शास्त्रों में घोर तप, व्रत व उपवास आदि पर बल दिया गया है।


श्वेतांबर और दिगंबर एक अनुश्रुति के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य के समय में एक बड़ा अकाल पड़ा। उस समय चंद्रगुप्त और भद्रबाहु नामक भिक्षु दक्षिण चले गए। इसलिए संघ का भार स्थलबाहु पर आ पड़ा। उनके अनुयायियों ने वस्त्र पहनने प्रारंभ कर दिए और भद्रबाहु के अनुयायी नंगे रहते थे। इस प्रकार श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय का प्रारंभ हुआ। कुछ विद्वानों के अनुसार इनकी उत्पत्ति पानीथ के अनुयायियों से हुई थी। यद्यपि इन दोनों संप्रदायों के दार्शनिक विचार एक समान हैं, तथापि स्थूल रूप से दोनों संप्रदायों में अनेक भिन्नताएँ भी हैं। इन


दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी निर्वस्त्र जबकि श्वेतांबर अनुयायी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। दिगंबर संप्रदाय रुढ़िवादी संप्रदाय है जबकि श्वेतांबर संप्रदाय उदारवादी संप्रदाय है और व्यावहारिक परिवर्तन में विश्वास करता है। दिगंबर संप्रदाय त्रियोंको मोक्ष की अधिकारिणी नहीं मानता, श्वेतांबर स्त्रियों को भी मोक्ष की अधिकारिणी मानता है। दिगंबर महावीर को अविवाहित मानते हैं, जबकि श्वेतांबर उन्हें विवाहित तथा एक पुत्री का पिता मानते हैं। दिगंबर परंपरा के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के बाद व्यक्ति को भोजन नहीं करना चाहिए, किंतु श्वेतांबर परंपरा के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के बाद अन्न ग्रहण किया जा सकता है। इन दोनों संप्रदायों में जैनों के धार्मिक ग्रंथों के नामों में भेद है। इनके अतिरिक्त भी अन्य साधारण बातों में दोनों संप्रदायों में भेद हैं, परंतु तात्विक भेद नहीं हैं।