राजपूत कालीन नारी - Rajput carpet woman
राजपूत कालीन नारी - Rajput carpet woman
पुत्री के रूप में
राजपूत काल के साहित्य से ज्ञात होता है कि पुत्री की स्थिति अब परिवार में पुत्र की अपेक्षा बहुत गिर गई थी। ‘कथासरित्सागर' में लिखा है कि पुत्र सुख का प्रतीक है और पुत्री दुख का मूल है। इस काल में प्रायः सभी विधायक पुत्री को पिता की संपत्ति में कुछ भाग दिलाने के पक्ष में थे। शुक्र का मत था कि यदि पिता अपने जीवन काल में अपनी संपत्ति का बँटवारा करे तो इस अनुपात में बाँटे पत्नी। भाग, प्रत्येक पुत्र भाग व प्रत्येक पुत्री आधा भाग। मेधातिथि पुत्री को दाय देने के विरूद्ध था।
पत्नी के रूप में
इस काल के स्मृतिकार यह आशा करते थे कि पत्नी हर प्रकार से पति की सेवा करे जैसे कि पैरों की मालिश करना,
परंतु पति से भी यह आशा की जाती थी कि वह अपनी पत्नी के सुख का पूर्ण ध्यान रखे। पति और पत्नी दोनों ही एक दूसरे पर अत्याचार होने पर राजा के द्वारा कानूनी कार्यवाही करके उस अत्याचार का प्रतिकार कर सकते थे। पत्नी के भरण-पोषण का पूरा उत्तरदायित्व पति पर समझा जाता था। मेधातिथि का मत था कि अपराध करने पर भी पति को पत्नी को अपने घर से बाहर नहीं निकालना चाहिए। मत्स्य पुराण के अनुसार मनु की भाँति पत्नी को ठीक रास्ते पर लाने के लिए पति उसे रस्सी या बाँस से मार सकता है, किंतु मेधातिथि पत्नी को पीटने के पक्ष में नहीं है।
वह उसे डाँटने-फटकारने के पक्ष में है। बहुत ही बड़ा अपराध होने पर यदा-कदा उसको पति मार सकता था। वह उस पर जुर्माना भी कर सकता था। किसी बड़े अपराध, जैसे कि पर-पुरुषगमन करने पर यदि स्त्री का परित्याग भी करना पड़े तो मनु के अनुसार पति को उसके निर्वाह के लिए आवश्यक धन देना चाहिए यदि पति पतिव्रता स्त्री को अकारण छोड़ दे तो राजा को उसे दंड देना चाहिए।
पति के विदेश से दीर्घ काल तक न लौटने पर पत्नी को क्या करना चाहिए। इस विषय में तत्कालीन धर्मशास्त्रकार एकमत नहीं हैं। कुछ कहते हैं
कि उसे ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे समाज में उसकी निंदा न हो। कुछ दूसरा विवाह करने की भी अनुमति देते हैं। स्मृतियों के टीकाकारों का मत था कि पति और अंय मनुष्य संबंधियों को स्त्रियों पर नियंत्रण रखना चाहिए। पतियों को अपनी पत्नियों को वस्त्र व आभूषण देकर प्रसन्न रखना चाहिए, किंतु सदा गृहकार्य में इतना व्यस्त रखना चाहिए कि वे अंय पुरुषों के विषय में सोच भी न सकें। इस काल में भी अभिजात वर्ग के मनुष्य कई पत्नियाँ रखते थे।
विधवा की स्थिति
विधवा को पति की स्मृति में पवित्र जीवन बिताना चाहिए।
वृद्ध हारीत ने लिखा है कि विधवा को बाल सँवारना छोड़ देना चाहिए। पान, सुगंधित वस्तुओं फूल, आभूषणों और रंगीन वस्त्रों का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए। अंजन नहीं लगाना चाहिए। इंद्रियों का दमन करना चाहिए। सदा हरि की पूजा करनी चाहिए और रात्रि को कुशा की चटाई पर सोना चाहिए। राजा को विधवा की संपत्ति की रक्षा करनी चाहिए। यदि विधवा संयम का जीवन न बिताये तो राजा उसे पति के मकान से निकाल सकता था।
इस काल में कुछ स्मृतिकार विधवा के सती होने के पक्ष में थे और कुछ इसके विरूद्ध। सुलेमान ने लिखा है कि विधवा स्त्रियाँ अपनी इच्छा से सती होती थीं,
किंतु यह प्रथा इस काल में भी उत्तर भारत के राजकीय घरानों तक ही सीमित थी। दक्षिण भारत में सती की प्रथा बहुत कम थी और सुदूर दक्षिण में अपवादस्वरूप। राजस्थान में 842 ई. में चाह्यान चंडमहासेन की माता सती हुई। कलचुरि वंश के चेदिराजा गांगेयदेव के साथ उसकी एक सौ पत्नियाँ त्रिवेणी में 1020 ई. में डूब गई। कश्मीर में भी सती के अनेक उदाहरण मिलते हैं। राजा कलश, उत्कर्ष और उच्छल की पत्नियाँ अपने पतियों के शवों के साथ सती हुई। ब्राह्मणों में 1000 ई. के बाद इस प्रथा का आरंभ हुआ। सातवीं शताब्दी में भी राजपरिवारों में सती के कई उदारहण मिलते हैं। हर्ष की माता यशोमती को जब यह ज्ञात हुआ कि प्रभाकर वर्धन का रोग असाध्य है तो वह पति की मृत्यु से पूर्व ही जल कर सती हो गई, किंतु बाणभट्ट सती के पक्ष में न था । अग्निपुराण में लिखा है कि जो स्त्री पति के शव के साथ अग्नि में प्रविष्ट होती है
वह स्वर्ग जाती है। 700 ई. के लगभग अंगिरस और हारीत स्मृतियाँ लिखी गई। वे सती की प्रशंसा करती हैं किंतु मेधातिथि सती प्रथा का विरोध करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस काल में सती प्रथा के विषय में सब विद्वान एकमत न थे।
पर्दे की प्रथा
कुछ धनी परिवारों में पर्दे की प्रथा इस काल में विद्यमान थी, किंतु अबूजैद के अनुसार भारतीय राजाओं की राज सभाओं में स्त्रियाँ विदेशी मनुष्यों की उपस्थिति में बिना पर्दे के उपस्थित होती थीं। इससे स्पष्ट है कि पर्दे की प्रथा देश के सभी भागों में न थी और जनसाधारण में तो इसका प्रचलन मुसलमानों के आने के बाद ही हुआ।
इसके दो कारण थे एक कारण तो यह था कि हिंदू स्त्रियाँ अपने सतीत्व की रक्षा के लिए पर्दा करने लगीं। दूसरे, हिंदू राजा शाही घरानों की देखा देखी अपनी पत्नियों से पर्दा करवाने लगे। शिक्षा
इस काल में कन्याओं की उच्च शिक्षा धनी परिवारों तक सीमित थी। उन्हें साहित्य के अतिरिक्त संगीत, नृत्य और चित्रकला की शिक्षा दी जाती थी। मंडन मिश्र की पत्नी अपने पांडित्य के लिए प्रसिद्ध थी। संस्कृत सुभाषितावलियों से हमें ज्ञात होता कि इस काल की कुछ स्त्रियाँ अपनी मनोहर काव्य-शैली के लिए प्रसिद्ध थीं जैसे कि शील भट्टारिका और गुजरात की देवी नाम की कवयित्री । राजशेखर ने विजयाँका की तुलना सरस्वती से की है। राजशेखर की पत्नी भी अपनी कविता और उच्चकोटि की साहित्य-समालोचना के लिए प्रसिद्ध है।
इस काल के स्मृतिकार साधारणतया यौवनारंभ से पूर्व विवाह करने के पक्ष में थे। बृहद्यम कहता है कि पिता को पुत्रियों का विवाह 8-9 वर्ष की अवस्था में कर देना चाहिए। उसके अनुसार जो पिता अपनी पुत्री का विवाह दस वर्ष की आयु होने से पूर्व नहीं करता वह महान पाप का भागी होता है। इस काल में भी कुछ गांधर्व विवाह होते थे। इनमें संस्कार वस्वधू के मिलने के बाद होता था ।
संपत्ति संबंधी अधिकार
सातवीं शताब्दी से स्त्रीधन का क्षेत्र अधिक विस्तृत हो गया।
देवल ने निर्वाह के लिए प्राप्त धन और लाभ को भी स्त्री-धन में सम्मिलित कर दिया। विज्ञानेश्वर ने आदि शब्द से पिता से दाय रूप में मिली संपत्ति खरीदी हुई संपत्ति, बँटवारे से मिली संपत्ति और जिस पर अधिक समय तक अधिकार रहने के कारण स्वामित्व हो गया हो ऐसी सभी संपत्ति को स्त्रीधन में सम्मिलित कर दिया। इस प्रकार बारहवीं शती ई. तक स्त्री धन का क्षेत्र बहुत विस्तृत हो गया। अधिकतर टीकाकार विज्ञानेश्वर के विचारों से सहमत थे। उन्होंने स्त्रियों के प्रति बहुत उदारता दर्शाई। इसमें संदेह है कि विज्ञानेश्वर विधवा स्त्री को अचल संपत्ति बेचने का अधिकार देना चाहता था। संभवतः वह यह चाहता था कि विधवा स्त्री इस अचल संपत्ति को • अपनी पुत्री को दे सके क्योंकि उसने स्पष्ट लिखा है कि स्त्रीधन पुत्रियों को मिलना चाहिए, उनमें भी पहले अविवाहित पुत्री को और फिर विवाहित पुत्रियों को
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