धार्मिक आंदोलन - religious movement

धार्मिक आंदोलन - religious movement


छठी शताब्दी ई. पू. में हुई क्रांति के कारणों से उत्तरी भारत में चारों ओर तीव्र असंतोष उत्पन्न हो गया। लोग पुरातन धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था का विरोध करने लगे, उनकी कटु आलोचना करने लगे और तत्कालीन व्यवस्था में सुधार करने के लिए अपने-अपने मत प्रकट करने लगे। फलतः बौद्धिक और धार्मिक आंदोलन प्रारंभ हो गये। ईसा पूर्व छठी सदी में वैशाली, कपिलवस्तु आदि राज्यों में गणराज्य थे और उनमें प्रजातांत्रिक वातावरण था। इससे जनसाधारण में स्वतंत्रता की प्रवृत्ति जागृत हुई । इस प्रवृत्ति के साथ-साथ लोगों में सत्यान्वेषिणी दृष्टि और अद्भुत तर्कशीलता का विकास हुआ। इन्होंने अंध श्रद्धा पर आश्रित धार्मिक मान्यताओं और विश्वासों का खंडन किया,

पुरातन धर्म ग्रहण करने के पूर्व उसे भली-भाँति परख लेना चाहा, सत्य का अनुसंधान किया और सरल सादे पवित्र, व्यावहारिक धर्म की खोज की। फलतः अनेक धार्मिक आंदोलन प्रारंभ हुए।


विभिन्न विद्वानों, धर्माचार्यों, परिव्राजकों, प्रगतिवादियों, सुधारवादियों, धार्मिक प्रचारकों, मीमांसकों एवं स्वतंत्र विचारकों ने अपने अपने सिद्धांतों और मतों का प्रचार किया। फलस्वरूप कई संप्रदायों की उत्पत्ति हुई। इन संप्रदायों में जैन और बौद्ध संप्रदाय स्थायी हो गये। 


महावीर स्वामी


जैनों के अनुसार उनके धर्म का प्रारंभ सुदू अतीत में हुआ। उनका विश्वास है

कि महावीर अंतिम तीर्थंकर थे जिनसे पहले 23 तीर्थंकर और हो चुके थे, इनमें से प्राचीनतम के बाद वाले अर्थात् दूसरे पार्श्वनाथ ऐतिहासिक व्यक्ति ज्ञात होते हैं, परंतु अब तीर्थंकरों की आकार रेखाएँ नितांत अस्पष्ट और अतर्क्य जन विश्वासों से ढकी हैं। पार्श्वनाथ काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे और उन्होंने तप की तुष्टि के अर्थ राजकीय विलास का जीवन त्याग दिया। उनके मुख्य उपदेश चार थे (1) अहिंसा (2) सत्यभाषण (3) अस्तेय और (4) संपक्ति का त्याग। ज्ञात नहीं पाश्र्व कहाँ तक अपने प्रचार में सफल हुए, परंतु 250 वर्ष बाद होने वाले चैबीसवें तीर्थंकर महावीर ने निस्संदेह धर्म को विशेष प्रतिष्ठा दी। महावीर का प्राकृत नाम वर्धमान था।

वैशाली के समीप कुंडग्राम में उनका जन्म हुआ था। क्षत्रिय ज्ञात्रिक कुल के प्रधान सिद्धार्थ के वे पुत्र थे और उनकी माता त्रिशला उस लिच्छवि 'राजा' चेटक की भगिनी थी जिसकी कन्या चेल्लना राजा बिंबिसार की रानी थी। इस प्रकार वर्धमान का कुल अभिजातवर्गीय था और इस बात से उनके प्रचार कार्य में बड़ी सहायता मिली होगी। 30 वर्ष तक सुखी गृहस्थ का जीवन बिता वर्धमान प्रव्रजित हो गये, फिर उन्होंने कठिन तप किया और 12 वर्ष के लंबे तप से अपने शरीर को सर्वथा दुर्बल कर दिया। अंत में उनको 'कैवल्य' प्राप्त हुआ और उनकी संज्ञा निर्ग्रन्थ (बंधन रहित) अथवा 'जिन' (विजयी) हुई। इसी जिन से उनके अनुयायियों की जैन संज्ञा पड़ी।

इसके तीस वर्ष बाद 72 वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक महावीर मगध, अंग, मिथिला और कोशल में निरंतर अपने सिद्धांतों का प्रचार करते रहे। पाश्र्व के चारों सिद्धांतों को अपनाकर उन्होंने अपना पाँचवाँ शुद्ध पवित्रता का सिद्धांत जोड़ा । वसन त्यागकर वे दिगंबर घूमते रहे। कुछ विद्धानों ने जैनधर्म के श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों का उदय महावीर के इसी आचरण से माना, परंतु इसे स्वीकार करना कठिन है क्योंकि जैन संघ में विच्छेद तृतीय शती ई. पू. में हुआ जब भद्रबाहु के नेतृत्व में दक्षिण भारत को अकालपीड़ित गए हुए जैन लौटे। 527 ई. पू. के लगभग महावीर का देहांत आधुनिक पटना जिले की पावापुरी में हुआ। 


 जैन सिद्धांत


जैन वेद की सत्ता और प्रमाण को स्वीकार नहीं करते और न वे यज्ञों के अनुष्ठान को ही महत्व देते हैं। उनका विश्वास है कि प्रत्येक वस्तु में,

परमाणु तक में, जीव होता है और वह चेतन है। इसका फल हुआ उनका अर्थरहित अहिंसक दृष्टिकोण। छोटे से छोटे जीव के प्रति हिंसा का विचार उनके लिए अत्यंत अग्राह्य और असह्य हो उठा। परिणामतः हिंसा की दृष्टि से यह धर्म अदभुत वैषम्य का केंद्र हो उठा, क्योंकि ऐसी भी उदाहरण इतिहास में प्रस्तुत है कि जैन राजा ने पशु की हत्या के अपराध में मनुष्य को प्राणदंड की आज्ञा दे दी। जैन संसार के चेतन स्पष्टा, उसके पालनकर्ता अथवा व्यापक परमात्मा को नहीं मानते। उसके अनुसार 'ईश्वर उन शक्तियों का उच्चतम शालीनतम और पूर्णतम व्यक्तिकरण है जो मनुष्य की आत्मा में निहित होती है। जैन जीवन का लक्ष्य भौतिक बंधनों से मोक्ष है। आत्मा का बंधन कर्मों के फलस्वरूप है। पूर्वजन्म के कर्मों का नाश और इह जन्म में उनका अनस्तित्व ही मोक्षदायक है और कर्मों का नाश सम्यक् श्रद्धा, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचार के त्रिरत्नों के साधन से होता है। जैन कठोर तप 


को बड़ा महत्व देते हैं। यौगिक प्रक्रियाओं और आमरण अन्न त्याग का भी उनके यहाँ विशेष महत्व है। उनका विश्वास है कि तप और संयम से आत्मा को शक्ति मिलती है तथा निकृष्ट प्रवृत्तियाँ दबी रहती हैं। 2.3.5.3 महात्मा बुद्ध


जैन धर्म की भाँति बौद्ध धर्म भी एक मेधावी अभिजातकुलीय क्षत्रिय द्वारा प्रचारित हुआ। उसका गोत्र नाम गौतम था, परंतु प्रसिद्ध वह अपने आध्यात्मिक नाम बुद्ध से ही हुआ। कपिलवस्तु के समीप लुंबिनी वन (आधुनिक रुम्मिन्देह अथवा रूपदेहि गाँव) में माया की कोख से वह जन्मा।

उसका पिता शुद्धोदन मनस्वी शाक्य जाति का 'राजा' (प्रधान) था। अपने पुत्र की चिंतन प्रवृत्ति देख उसने उसका विवाह अल्पायु में ही गोपा (यशोधरा) से कर दिया और उसके प्रासाद को विलास के सारे साधनों से भर दिया, परंतु दुखी और विषादग्रस्त संसार के बीच भोग के इन उपकरणों से गौतम के आकुल चिंतन को शांति न मिली। तब सन्यस्त जीवन से शांति लाभ करने के अर्थ अपनी आयु के 29वें वर्ष में अपनी तरूणी भार्या गोपा और सद्यः जात शिशु राहुल को प्रासाद में छोड़ एक रात वह प्रव्रजित हो गया। आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त के आश्रय में कुछ काल निवास और अध्ययन कर चुके पर और युग के उन दो मेधावियों के अध्यापन से भी जब उसकी जिज्ञासा न मिटी तब गौतम आधुनिक बोधगया के समीप उरबेला के घने वन में घोर तप के अर्थ प्रविष्ट हुआ।

वहाँ उसने अपनी काया को असाधारण यातना देकर इतना तपाया कि वह अस्थि-पंजर मात्र रह गई परंतु अपने लक्ष्य से वह फिर भी उतना ही छू रहा जितना पहले था। तब उसने तप से विरक्त होकर शरीर यातना छोड़ दी और सुजाता द्वारा लाए स्वादु भोजन को अंगीकार कर वह अभितृप्त हुआ। सुजाता वृक्षदेवता को तुष्ट करने के लिएपायस लेकर आई थी, फिर पीपल के नीचे तृण के आसन पर बैठे हुए एक रात उसे सहसा सत्य के दर्शन हुए। अपनी आयु के 35वें वर्ष में गौतम ने बुद्धत्व प्राप्त किया। पहले ही इस विषय में उसके प्रबुद्ध मन का बड़ा तर्क-वितर्क हुआ कि वह असाधारण सत्य तृष्णागत मानवों को देना कहाँ तक उपादेय होगा, परंतु अंत में अपने ज्ञान का आलोक उन तक पहुँचाने का निश्चय कर बुद्ध ने सारनाथ में धर्म-चक्र का पहला प्रवर्तन किया।


बुद्ध के नए धर्म के पहले श्रद्धालु वे ही पंचभद्रवर्गीय ब्राह्मण हुए जिन्होंने उसे उरूबेला में तप से विरक्त होते देख तृष्णा से अभिभूत जानकर त्याग दिया था। उसके भावी जीवन के शेष पैतालिस वर्ष अनवरत् श्रम और सक्रियता के थे। उसने अपना संदेश जनता से उसकी नित्य की बोली में कहा और अपने उपदेशों की शालीनता, करूणा, आचारजन्य गौरव तथा गहरी संवेदना से उसने अपने श्रोताओं के चित्त हर लिए। राजा और रंक सबने उसे अपना अनुराग दिया और अल्पाकाल में ही उसके अनुयायियों का एक शक्तिमान संघ संगठित हो गया।


दीर्घ काल तक अनवरत् प्रचार के बाद धर्म का यह महारथी रूका और अस्सी वर्ष की परिपक्व आयु में कुशीनगर (गोरखपुर जिले में उसने निर्वाण प्राप्त किया। 


बौद्ध सिद्धांत


बुद्ध के उपदेश सर्वथा सरल और प्रायोगिक हैं। उन्होंने घोषणा की कि संसार में सब कुछ अनित्य है क्षणभंगुर (सर्वअनिच्च) अपने समकालीन दार्शनिकों की भाँति वह भी जन्म को दुःख मानते थे, परंतु दुःख और विषाद की कठोरता से वह नितांत व्यथित थे। इसी कारण दुःख के विश्लेषण और उसके शमन के उपाय के प्रति वह अधिक दत्तचित्त हुए। अत्यंत मनोयोग से उन्होंने चार आर्यसत्यों का प्रचार किया। चार आर्यसत्य निम्नलिखित थे (1) दुःख है (2) दुःख का कारण (दुक्ख समुदाय) है - (3) दुःख का निरोध है और (4) दुःख के निरोध के मार्ग (दुक्ख निरोधगामिनी-प्रतिपदा) है। बुद्ध के अनुसार सारे मानव दुःखों का कारण तृष्णा (तन्हा) है और इसका नाश ही दुःख का अंत करने का एकमात्र उपाय है। 'तन्हा' का नाश 'अष्टांगिक मार्ग के सेवन से ही साध्य है।

यह अष्टांगिक मार्ग निम्नलिखित हैं- (1) सम्यक् दृष्टि (विश्वास) (2) सम्यक् संकल्प (विचार) (3) सम्यक् वाक् (वचन) (4) सम्यक् कर्मात (कर्म) (5) सम्यक आजीव (वृत्ति) (6) सम्यक् व्यायाम (श्रम) (7) सम्यक् स्मृति और (8) सम्यक् समाधि। बुद्ध ने इसे मध्यम मार्ग (मज्झिम-मग्ग) कहा क्योंकि यह अत्यंत विलास और अत्यंत तप दोनों के बीच का था। उनको मनसा, वाचा, कर्मणा, सर्वथा पवित्रता रखनी थी। इस अर्थ बुद्ध ने दस प्रकार के निम्नलिखित निषेध किए जिनमें से पहले पाँच साधारण उपासक के आचरण में भी वर्जित थे (1) परद्रव्य का लोभ (2) हिंसा (3) मद्यपान (4) मिथ्या भाषण (5) व्याभिचार (6) संगीत और नृत्य में भाग लेना (7) अंजन, फूल और सुवासित द्रव्यों का प्रयोग (8) अकाल भोजन (9) सुखप्रद शय्या का उपयोग और (10) द्रव्य ग्रहण।

इस प्रकार बुद्ध ने आचार के काफी कड़े नियम बनाए, परंतु दार्शनिक चिंतन को आध्यात्मिक उन्नति में बाधक कह कर निषिद्ध किया। बुद्ध की सबसे क्रांतिकारी घोषणा यह थी कि उसके सन्देश सबके लिए हैं। नर और नारी, युवा और वृद्ध, श्रीमान् और कंगाल सभी समान रूप से उस पर आचरण कर सकते हैं।


जैन और बौद्ध धर्मों की तुलना


दीर्घकाल तक लोगों का विश्वास था कि जैन संप्रदाय बौद्ध संप्रदाय की अथवा बौद्ध संप्रदाय जैन धर्म की शाखा है। अब इस प्रकार के विचार अप्रमाणित हो गए हैं यद्यपि दोनों संप्रदायों की पारस्परिक समानताएँ अनेक हैं।

दोनों वेदों को प्रमाण नहीं मानते और कर्मकांड के विरोधी हैं। दोनों ईश्वर के प्रति उदासीन रहे और दोनों ने वर्ण व्यवस्था पर प्रहार किया। दोनों ने अहिंसा पर जोर दिया और व्यक्ति के पुनजैम का कारण कर्म बताया। दोनों ने जन विश्वासों को प्रश्रय दिया। इसमें संदेह नहीं कि ये समानताएँ असाधारण हैं, परंतु इनकी पारस्परिक विषमताएँ भी कम महत्व की नहीं हैं। बौद्ध संप्रदाय 'अनात्मवाद' को मानता है, परंतु इसके विरोध में जैन प्रत्येक वस्तु में जीव का निवास मानते हैं। शरीर की यातना को जहाँ जैन इतना गौरव प्रदान करते हैं, बौद्ध अत्यंत विलास और अत्यंत तप के बीच के मध्यम मार्ग को सराहते हैं। बंधच्छेद और निर्वाण के संबंध में भी उनके विचार सर्वथा समम नहीं हैं। समान काल में उदित समान देश में प्रचारित होने के कारण जैन और बौद्ध संप्रदायों में समानता स्वाभाविक थी, परंतु उनके पारस्परिक विरोध भी इतने गहरे थे कि दोनों में प्रायः स्पर्धा और ईष्या के भाव जग उठते थे।