ऋग्वैदिक काल - आर्थिक जीवन - Rig Vedic Period - Economic Life
ऋग्वैदिक काल - आर्थिक जीवन - Rig Vedic Period - Economic Life
ऋग्वेद द्वारा प्राचीन भारतीय आर्यों के आर्थिक जीवन की जानकारी भी मिलती है। ऋग्वैदिक सभ्यता ग्राम प्रधान थी। इनके आर्थिक जीवन के मुख्य आधार कृषि और पशुपालन थे। पशुओं में गाय, बैल, घोड़ा, बकरी, कुत्ते और गधे विशेष रूप से पाले जाते थे। आर्य लोग पशुओं को बड़ी संख्या में पालते थे और इनसे उनकी आर्थिक समृद्धि में बहुत सहायता मिलती थी। ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर पशु धन की वृद्धि के लिए देवताओं से प्रार्थनाएँ की गई हैं।
ऋग्वैदिक काल में आर्य लोगों ने कृषि क्षेत्र में अच्छी उन्नति कर ली थी।
जमीन को जोतने के लिए बैलों का प्रयोग किया जाता था। खेतों की उपज बढ़ाने के लिए खाद का प्रयोग भी होता था। सिंचाई के लिए झील, जलाशय, नदी व कुएँ का जल काम में लाया जाता था। खेतों में उत्पन्न होने वाले अनाजों में जौ, गेहूँ, धान, माष (Masha) व तिल प्रमुख थे। यद्यपि वैदिक आर्यों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि था, पर धीरे-धीरे अनेक प्रकार के शिल्पों और व्यवसायों का भी विकास हो रहा था।
तक्षक (बढ़ई), हिरण्यकार (सुनार), कर्मार (धातुशिल्पी), चर्मकार (मोची), तंतुवाय (जुलाहा ) आदि अनेक व्यवसायियों का उल्लेख मिलता है।
दास शिल्पियों को गुलाम रूप में रखकर आर्य गृहपति अनेक प्रकार के व्यवसायों का संचालन करने लग गए थे।
वैदिक युग के आर्य अनेक धातुओं का प्रयोग जानते थे। सभ्यता के क्षेत्र में वे आगे बढ़ चुके थे। सुवर्णों और रजत का प्रयोग वे आभूषणों और पात्रों के लिए करते थे, पर 'अयस्' नामक एक धातु को वे अपने औजार बनाने के लिए काम में लाते थे। संस्कृत भाषा में 'अयस' का अर्थ लोहा है पर अनेक विद्वानों का विचार है कि यह 'अयस' लोहा न होकर ताँबा है। इस धातु से कवच, शिरस्त्राण, बाण तथा अन्य हथियार और औजार बनाए जाते थे। इस प्रकार ऋग्वैदिक आर्य धातु गलाने और उसे पीटकर विभिन्न आकार देने में निपुण थे।
वस्त्र निर्माण का शिल्प इस युग में अच्छा उन्नत हो चुका था। आर्य सूत कातना और कपड़ा बुनना जानते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक काल में कताई, बुनाई और कढ़ाई के कार्य प्रायः नारियाँ करती थी। इस काल में संभवतः कपास, सन, आदि से वस्त्र बनते होंगे। समाज का निम्न, निर्धन तथा ब्रह्मचारियों, तपस्वियों का वर्ग, पशु चर्म और वृक्ष- त्वचा को भी धारण करता था।
अनेक स्थानों के उल्लेख से स्पष्ट होता है कि भिषक् (चिकित्सक अथवा वैद्य) का व्यवसाय काफी विकसित हो चुका था। इसमें शल्य चिकित्सा भी सम्मिलित थी।
ऋग्वेद में ऐसा उल्लेख नहीं मिलता जिससे यह स्पष्ट हो कि अमुक व्यवसाय किसी एक वर्ग के लिए ही निर्धारित था। समाज में समस्त कार्यों की प्रतिष्ठा थी । व्यवसाय के आधार पर ऊँच-नीच की भावना का अभी तक उदय नहीं हुआ था। इस काल में कदाचित् कुछ व्यवसायों ने अपने संगठन अथवा संघ बना लिए थे। परंतु उनकी कार्य प्रणाली स्फ्ट नहीं है।
व्यापार के लिए इस युग में वस्तु विनिमय का प्रयोग होता था। ऋग्वेद में 'गाय' मुद्रा के रूप में प्रतिष्ठित थी।
'गाय' को मूल्य की इकाई मान कर विनिमय का काम चलाया जाता था। धातु द्वारा निर्मित किसी सिक्के का चलन इस युग में था या नहीं, यह निश्चित नहीं हो पाया है। 'निष्क' नामक स्वर्ण मुद्रा का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, परंतु इस पर विद्वानों में मतभेद है। संभवतः उसका उपयोग मुद्रा की अपेक्षा आभूषण के रूप में अधिक था। वैदिक साहित्य में नौकाओं का अनेक स्थान पर वर्णन मिलता है। इनमें से कतिपय नौकाएँ विशाल भी हैं। संभवतः ऋग्वैदिक काल में स्थल एवं जल मार्ग द्वारा व्यापार के लिए दूर-दूर तक जाते थे।
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