ऋग्वैदिक काल - राजनीतिक जीवन - Rigvedic period - political life

 ऋग्वैदिक काल - राजनीतिक जीवन - Rigvedic period - political life


आर्यों के अधिकार में बहुत बड़ा क्षेत्र था। ऋग्वेद से उस काल की राजनीतिक अवस्था का चित्रण किया जाता है। सबसे छोटी इकाई के रूप में 'गृह', 'कुल' या 'परिवार' आता था, उसके बाद 'ग्राम' या गाँव, "विश्' या कबीला, 'जन या लोग। ग्राम का प्रमुख 'ग्रामणी' होता था। 'जन' का नेता राजा होता था। ऋग्वेद में 'राजन' शब्द का प्रयोग कई बार किया गया है। राजा संभवत: पहले निर्वाचित होता था, परंतु बाद में वंशानुगत होने लगा था। राजा की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र उत्तराधिकारी होता था। राजा आक्रमण के समय और रक्षा के समय प्रजा का नेतृत्व करता था।

ऋग्वेद में राजा को 'जनस्य गोपा (प्रजा का रक्षक) और "पुरामभेत्रा' (नगरों पर विजय पाने वाला) कहा गया है। राजा का जनता में सम्मानित स्थान था। 'विश्वस्य भुवनस्य राजा' अथवा 'सम्राट' का उल्लेख भी ऋग्वेद में मिलता है। राजपद गौरवशाली समझा जाता था। राजा प्रजा से स्वामिनिष्ठा और आज्ञाकारिता की आशा करता था।


इस समय छोटे और बड़े अनेक राज्य थे, परंतु प्रतीत होता है कि छोटे राज्यों का बड़े राज्यों में विलय होना प्रारंभ हो गया था। देवताओं को भेंट की गई आहुति या प्रसाद को ऋग्वेद में 'बलि' कहा गया है। प्रजा स्वयं राजा को उसका अंश स्वेच्छा से दे देती थी।


राजा न्यायाधीश के रूप में भी काम करता था। जनता की सर्वोच्च कार्यकारिणी शक्ति होने के कारण वह 'दंड' या 'राजदंड प्रयोग करता था। वह स्वयं दंडमुक्त था। राजा की सेवा में बहुसंख्यक अधिकारी और सेवक रहते थे।


राजकीय पदाधिकारी


राजकीय कार्यों में राजा की सहायता करने के लिए अनेक पदाधिकारी थे। धार्मिक संस्कारों तथा अनुष्ठानों के लिए पुरोहितों को नियुक्त करता था। ऋग्वैदिक पुरोहित से ही कालांतर में राजमंत्री के पद का विकास हुआ।

ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर पुरोहित अपने राजा को राजकीय विषयों पर परामर्श देता हुआ वर्णित है। राजकीय एवं सामूहिक कल्याण के लिए पुरोहित यज्ञ कराता था। राजनैतिक मामलों में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता था। रणभूमि में भी वह राजा के साथ जाता था और उसकी सुरक्षा व विजय के लिए तत्पर रहता था। इस प्रकार ऋग्वैदिक पुजारी का पद अत्यधिक महत्वपूर्ण था। वह पुरोहित के साथ-साथ राजमंत्री, पथ प्रदर्शक, दार्शनिक और योद्धा भी था।


अन्य महत्वपूर्ण पद ‘सेनापति' का होता था। इसका कार्य 'सैनिक' का होता था, राज्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी इसके ऊपर रहती थी।

राज्य के युद्ध के समय वह स्वयं युद्धभूमि में जाकर सेना का उत्साह बढ़ाता था। सेनापति और पुरोहित के साथ ग्रामणी, सूत, रथकार और कर्मार की चर्चा भी ऋग्वेद में की गई है। राज्याभिषेक के अवसर पर ये सभी उपस्थित रहते थे। इन्हें 'रनिन' कहा गया है। ग्रामणी गाँव का मुखिया रहता था। ये गाँव में शांति और सुव्यवस्था रखता था। अभिषेक के पूर्व राजा रत्निन' की पूजा करता था। यह लोकमत के सम्मान का ज्वलंत उदाहरण है। इन सभी के अतिरिक्त पुरूष, दुर्गपति, स्पश और दूत का वर्णन भी मिलता है। इन सभी की नियुक्ति राजा के द्वारा होती थी।


सभाएँ सभा और समिति


ऋग्वेद में कई स्थानों पर 'सभा' और 'समिति' का उल्लेख मिलता है। इनके वास्तविक अर्थ को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। 'सभा' का उल्लेख तो मिलता है, पर इसकी रचना और कर्तव्यों के संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है। सभा संबंधी जो भी चर्चाएँ मिलती हैं, उनसे इसका ग्राम संस्था होना सिद्ध होता है। इसे सम्मेलन के पर्याय के रूप में भी प्रयुक्त किया गया है। कदाचित् विचार विमर्श के अतिरिक्त सभा ग्राम निवासियों के मनोरंजन का भी केंद्र होती थी। सामाजिक और सार्वजनिक सभाओं के सम्मेलन कक्ष के लिए भी 'सभा' शब्द का प्रयोग किया गया है। सभा के प्रसिद्ध व्यक्ति' को सभासद कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक 'सभा' सामंतों या बड़े बूढ़ों की सभा थी।


ऋग्वेद में कई जगह 'समिति' का भी उल्लेख किया गया है, लेकिन स्पष्ट चित्रण नहीं मिलता। कुछ विद्वानों के अनुसार 'समिति' संस्था थी और 'सभा' उसका अधिवेशन स्थान। ऐसा उल्लेख मिलता है कि राजा 'समिति' से घनिष्ठ रूप से संबंधित था और उसमें उपस्थित होना उसका कर्तव्य था। एक अन्य स्थान पर ऐसा वर्णन है कि राजा 'समिति' से भेंट कर उसके सदस्यों का मन जीत लेता है। ऐसा वर्णन भी है कि राज्य की समृद्धि के लिए राजा और 'समिति' का एकमत होना आवश्यक है। कदाचित् 'सभा' ग्राम संस्था थी और समिति' केंद्रीय संस्था। ऐसा प्रतीत होता है

कि राज्यों की स्थापना के बाद राज्य के अंतर्गत अनेक ग्राम आ गए तो सार्वजनिक विषयों की देखभाल करने के लिए समिति' नामक केंद्रीय प्रशासकीय संस्था की स्थापना की गई। ऋग्वेद में वर्णन मिलता है कि सारी प्रजा या उसकी उपस्थिति में 'समिति' 'राजन' या राजा का निर्वाचन या पुननिर्वाचन करती थी। समिति एक केंद्रीय राजनीतिक संस्था थी। ऋग्वेद में हमें समिति के अंतर्गत राजनीतिक कार्यों के अतिरिक्त सामाजिक कार्यों के संपादित होने का भी आभास मिलता है।