ऋग्वैदिक धार्मिक जीवन - Rigvedic religious life
ऋग्वैदिक धार्मिक जीवन - Rigvedic religious life
वैदिक कालीन धार्मिक जीवन का अध्ययन करने के लिए हम वैदिक काल को दो भागों में विभाजित करते हैं। ऋग्वैदिक काल एवं उत्तर वैदिक काल। ऋग्वैदिक काल में ऋग्वेद की रचना एवं उत्तर वैदिक काल में यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की रचना हुई थी।
ऋग्वेद में आर्यों की अविकसित धार्मिक विचारधारा से लेकर सम्यक् रूप से विकसित धार्मिक विचार प्रणालियों का स्पष्ट रूप से दिग्दर्शन होता है। ऋग्वेद के प्रथम, द्वितीय और सप्तम मण्डलों में इनके धार्मिक जीवन संबंधी ज्ञान प्राप्त होता है।
इनके अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि ऋग्वैदिक काल में आर्यों का धर्म सादा और सरल था। अतः ऋग्वैदिक कालीन धर्म के विभिन्न अंगों का विवेचन निम्नलिखित है-
(1) प्राकृतिक शक्तियों का दैवीकरण
आर्यों ने बाह्य जगत में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को कार्यरत देखा, कुछ शक्तियों से वे भयभीत हुए तथा कुछ से वे आश्चर्यचकित और प्रभावित भी हुए। जिसके परिणामस्वरूप बाह्य प्रकृति की इन सभी शक्तियों के सामने वे नतमस्तक हो गये और उन्होंने इन शक्तियों को देवी-देवता मानकर उनकी स्तुति,
वन्दना और अराधना की। इस प्रकार आर्यों के प्राचीनतम धार्मिक विचार प्रारंभिक जीवात्मवाद के थे, जहाँ वे अपने चतुर्दिक स्थित शक्तियों में, जिन्हें वे नियंत्रित नहीं कर पाते थे या समझ नहीं पाते थे, दैवी भक्ति का उपयोग करके देव या देवता के रूप में उनकी उपासना और आराधना करने लगे थे। परिणामतः आर्य देवी शक्तियों और प्राकृतिक शक्तियों जैसे सूर्य, चंद्र, आकाश, ऊषा, मेघध्वनि, मारुत, वायु आदि की उपासना करने लगे। जहाँ कहीं भी आर्यों को किसी जीवित भक्ति का आभास मिला, वहीं उन्होंने एक देवता की सृष्टि कर दी। इस प्रकार अपने धार्मिक जीवन की प्रारंभिक दशा में आर्यों ने प्रकृति की विभिन्न शक्तियों और स्वरूपों का दैवीकरण किया। तथा उनके देवतागण भी प्रकृतिक शक्तियों के प्रतीक बन गये।
(2) ऋग्वैदिक देवता
ऋग्वैदिक काल में आर्ययुगीन देवी-देवताओं की तीन श्रेणियाँ या वर्ग थे प्रथम स्वर्गस्थ, द्वितीय अंतरिक्षवासी और तृतीय पृथ्वीवासी। प्रथम वर्ग में द्यौस, अश्विन, सूर्य, वरुण, आप, सविता, मित्र, पूषन, विष्णु, आदित, उषा आदि थे। द्वितीय वर्ग में इंद्र, वायु, मारुत, पर्जन्य, रुद्र आदि थे और तृतीय वर्ग में पृथ्वी, सोम, अग्नि, बृहस्पति, सरस्वती आदि थे।
द्यौस (आकाश) पिता, नभ का चमकता हुआ देवता तथा पृथ्वी माता, आर्यों के सबसे प्राचीनतम देवता हैं। इस प्रकार आर्यों ने सर्वप्रथम आकाश और पृथ्वी की उपासना की।
प्रकृति की दो शक्तियों का उन्होंने दैवीकरण किया। उन्होंने पृथ्वी और द्यौस (आकाश) को जगत्माता-पिता कहा है और 6 ऋचाओं में इनका गुणगान हैं। कालांतर में नभ के देवता वरुण तथा मेघ गर्जन व वर्षा के देवता इंद्र ने इन देवताओं को पृष्ठभूमि में डाल दिया। प्राचीन वैदिक देवगणों में वरुण सर्वोत्कृष्ट देवता था। ऋग्वेद में वर्णनानुसार आकाश और पृथ्वी के मध्य में जितनी भी वस्तुएँ विद्यमान हैं, उनमें वरुण का वास माना जाता था। वह यथार्थता, सत्य और नैतिकता का अधिपति माना जाता था। विश्व के त्रिकालदार्शी शासक के रूप में उसकी कल्पना की गयी थी। वह आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता माना गया।
सूर्य उसके नेत्र, आकाश वस्त्र और प्रभन्जन उसका श्वांस है। वह सर्वत्र एवं सर्वसाक्षी माना गया। कोई भी पापी उसकी सतर्क दृष्टि से नहीं बच सकता। पाप-शांति के लिए लोग उससे क्षमा-याचना करते थे, जैसा कि बाद में विष्णु से करने लगे थे। आर्यों की धारणा थी कि वरुण व्रत पालन और यज्ञ कर्म से प्रसन्न होता था और प्रसन्न होने पर वह सुख, समृद्धि और वैभव देता था। वरुण के प्रति आर्य ऋषियों ने कुछ अत्यंत सुंदर और शालीन सूक्त रचे और गाये हैं। ऋग्वेद का सातवाँ मण्डल वरुण स्रोतों से भरा पड़ा है। कालांतर में वरुण एकमात्र जल का देवता हो गया।
वरुण के पश्चात् इंद्र का स्थान है। इंद्र आँधी, तूफान, बिजली और वर्षा का देवता था। यह सर्वाधिक लोकप्रिय देवता था। यह सर्वमान्य और सर्वाधिक शक्तिशाली देवता समझा जाता था।
इसकी स्तुति में सबसे अधिक ऋचाएँ ऋग्वेद संहिता में गायी गयी हैं और इनकी संख्या लगभग 250 हैं। ऋग्वेद की समस्त ऋचाओं का एक चतुर्थांश भाग केवल इंद्र की स्तुति से भरा है। यह इस बात का द्योतक है कि ऋग्वैदिक काल में सब देवताओं में इंद्र का महत्व सबसे अधिक था। वैदिक देवताओं में उसे प्रमुख स्थान प्राप्त था। वह देशों का अग्रणी तथा अपरिमित शक्तिशाली था। ऋग्वेद में कहा गया है कि इंद्र आकाशस्य राक्षसों से, जो वर्षा का जल चुराये जाने वाले समझे जाते थे, युद्ध करता है।
उसने उस पर बज्र प्रहार कर उन्हें पराजित कर उनसे जल छीन लिया जो उसके उपासकों के देश में धाराओं में गिरा। इस प्रकार इंद्र वर्षा करता था। इंद्र के अलावा आर्यों ने सूर्य को भी अपना देवता माना। ऋग्वेद में सूर्य को चर-अचर कर रक्षक और समस्त सत्-असत् कर्मों का दृष्टा माना गया। सूर्य देवता की उपासना मित्र ( सूर्य के दानशील रूप का मानवीकरण), सूर्य (प्रकाशक), सवित् (उत्तेजक), पूषण (पोषक), विष्णु उरुक्रम (विस्तृत मार्ग पर चलने वाला सूर्य), सविता और अश्विन् (संभवत: प्रातः और संध्या के तारे और कालांतर में चिकित्सा के देवता) के रूप में होती थी। प्रथम वर्ग के देवताओं में सूर्य के साथ विष्णु का भी महत्व था । विष्णु को ऋग्वेद में संसार का संरक्षक माना गया। वायुमण्डल के प्रमुख देवताओं में महान् हैं इंद्र ( तूफान के देवता), वायु एवं वात (पवन देवता),
रुद्र (झंझावात व विद्युत के देवता) एवं पर्जन्य (वर्षा के देवता) थे। मरुत दैत्यों के तितर-बितर करने में इंद्र की सहायता करता था। रुद्र, भयानक, भीषण चमक वाला तथा अत्यंत क्रोधी देवता माना जाता था। उसकी उपासना में लेषमात्र भूल हो जाने से वह क्रुद्ध हो जाता था। कालांतर में रुद्र ने शिव का रूप धारण कर लिया।
पार्थिव देवताओं में अग्नि, सोम तथा सरस्वती प्रमुख माने गये हैं। अग्नि देवता को प्रमुख तथा संवादवाहक माना जाता था, क्योंकि भक्तों द्वारा दी गई आहुति को देवताओं तक वहीं पहुँचाता था।
अग्नि को आहुतियों का स्वामी और धर्मों का अध्यक्ष बनाया गया है। यज्ञ में अग्नि का विशेष महत्व होता था और उसी के द्वारा वरुण, इंद्र, मरुत आदि देवताओं को आमन्त्रित किया जाता है। इससे अग्नि का विशेष महत्व माना गया। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त का यही देवता है। लगभग दो सौ से अधिक मन्त्र अग्नि की स्तुति और उपासना के विषय में हैं। सोमरस आर्यों का सर्वोत्तम पेय था। सोम एक पौधे का रस होता था जो पहाड़ियों और उनके ढालों पर उत्पन्न होता था। इस पौधे से विस्तृत कर्मकांड करके एक प्रकार का रस निकाला जाता था जो एक मादक पेय पदार्थ था।
इसका प्रयोग धर्म-विधि के अनुसार किया जाता था और यह रस देवताओं को भेंट किया जाता था। सोमरस को पीने से आर्यों को उत्तेजना, आनंद, उल्लास, स्फूर्ति आदि प्राप्त होते थे। उन्हें उसके प्रभाव में अपनी योग्यता और क्षमता से परे कार्यों को करने की प्रेरणा भी मिलती थी। आर्यों की ऐसी धारणा थी कि सोमरस का प्रयोग करने वाला व्यक्ति इसके स्फूर्ति और आनंददायक प्रभाव के कारण स्वर्गद्वार तक पहुँच जाता था। इन्हीं सब बातों से आर्यों के सोमरस में किसी देवता के रूप और शक्ति का अभाव पाया तथा सोम को देवता का रूप दे दिया। उसकी स्तुति और वन्दना की जाने लगी। उपर्युक्त देवताओं के पश्चात् धातु (संस्थापन करने वाली), विधात्री (निर्दिष्ट करने वाली), विश्वकर्मन (सब का सृजन करने वाला), प्रजापति (प्राणियों का स्वामी), त्वष्टा, श्रद्धा (विश्वास) और मन्यु (कोप) नामक सूक्ष्म और अमूर्त देवता बाद में प्रकट हुए।
(3) ऋग्वैदिक देवियाँ
ऋग्वैदिक काल में आर्यों के द्वारा कुछ देवियों का भी सृजन किया गया था, जैसे उषा और सरस्वती आर्यों ने अरुणोदय को उषा देवी का रूप दिया। प्रभात की मनोरम आभा और छटा को देवी का रूप देना आर्यों की सुंदरतम कल्पना है।
आर्यों की दूसरी देवी अदिति थी। यह सर्वव्यापी प्रकृति का देवी रूप है। यह आर्यों की सार्वभौम भावना की देवी है। सिंधु नदी को भी उन्होंने देवी रूप दे दिया। उन्होंने वन देवी को भी माना और उसका के नाम आख्यानी रखा। मनुष्य के ज्ञान, बुद्धि और विवेक को भी उन्होंने देवी रूप दिया और इसके लिए सरस्वती की प्रतिष्ठा हुई।
(4) धार्मिक विधियाँ
(अ) स्तुति और प्रार्थना
आर्यों की धार्मिक क्रिया विधि का प्रमुख अंग में देवी-देवताओं की स्तुति, आराधना और मुख्य थी। स्तुति और प्रार्थना विधि बड़ी सरल थी। प्रत्येक देवी-देवताओं के लिए भिन्न-भिन्न प्रार्थना ऋचाएँ थीं और उनको गाकर ही देव-स्तवन होता था। आर्यों की ऐसी धारणा थी कि उनके देवता प्रार्थना, उपासना और उपहार तथा भेंट से प्रसन्न होते है और सुख-समृद्धि देते हैं। इसलिए आर्य प्रार्थना द्वारा देवताओं की उपासना के अतिरिक्त घृत, दूध, दही, अन्न, माँस तथा सोम का उपहार देकर उन्हें प्रसन्न और संतुष्ट किया करते थे। यह क्रिया सरल थी।
इसमें मन्त्रोच्चारण के साथ-साथ यज्ञ की अग्नि में दूध, घी, धान्य, माँस आदि की आहुति दी जाती थी। आर्यों का विश्वास था कि प्रज्ज्वलित अग्नि अपनी उत्तुंग ज्वाला और उत्तुंग धूम्रराशि द्वारा इन वस्तुओं को देवताओं तक पहुँचा देगी। इस प्रकार देवताओं के प्रसादन के निमित्त आर्य यज्ञों का अनुष्ठान करते थे। (ब) यज्ञ
ऋग्वैदिक युग में यज्ञ स्वर्ग के देवों के मिलन का स्थान माना जाता था, तथा स्वर्ग की, परलोक की, इहिलोक की सर्व शक्तियाँ यज्ञ में सम्मिलित होती थीं। ऋग्वेद कालीन समय में यज्ञ दो प्रकार के होते थे प्रथम नित्य और द्वितीय नैयमिक।
नित्य यज्ञों में पाँच सहायक थे। इनके नाम हैं- ब्रह्म-यज्ञ, देव-यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत-यज्ञ और मनुष्य यज्ञ । ब्रह्म-यज्ञ से तात्पर्य है वेदों की ऋचाओं का अध्ययन करना और शिष्यों को वेद और वेदांग निःशुल्क पढ़ाना। स्वाध्याय और अध्यापन ब्रह्म यज्ञ माना गया था। ब्रह्म-यज्ञ को ब्राह्मणों के लिए परम तप माना गया था और यह दिन के द्वितीय भाग में होता था। इस समय वेदाभ्यास और स्वाध्याय होता था। ब्रह्म-यज्ञ से स्वर्ग लोक की प्राप्ति मानी जाती थी। देव-यज्ञ में अग्नि जलाकर उसमें समाधि डालकर अन्न, दूध, घी, धान्य आदि की आहुति देकर होम किया जाता था। वह देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किया जाता था। पितृ-यज्ञ में पितरों को तर्पण देने के साथ-साथ श्राद्ध किया जाता था। अन्न, फल, मूल तथा अंय दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं से तर्पण किया जाता था।
(स) पितृ-पूजा
ऋग्वैदिक युग में देवपूजा के साथ-साथ पितृ पूजा भी प्रचलित हो गयी थी। ऋग्वेद के दसवें मण्डल में एक ही स्थल पर देवताओं और पितरों का साथ-साथ विवरण है। देवताओं के समान पितरों की भी स्तुति की जाती थी और उनके लिए सोम, हवि और स्वधा का समर्पण किया जाता था। पितरों से आशा की जाती थी कि वे प्रसन्न होकर अपने वंशजों की रक्षा करेंगे, उन्हें शांति देंगे, उनकी सहायता करेंगे और हानि व कष्ट से उन्हें बचायेंगे। पितरों से धन और शक्ति प्राप्ति की आकांक्षा रखी जाती थी। उनके पथ-प्रदर्शन की आशा की जाती थी।
(द) दाह संस्कार
ऋग्वैदिक काल में किसी मनुष्य की मृत्यु के पश्चात् उसके शव को चिता पर ले जाते थे और मृतक के शव के साथ उसकी पत्नी एवं अय संबंधी भी होते थे। शव को चिता पर रख दिया जाता था। उसकी पत्नी उसके समीप तब तक बैठी रहती जब तक कि उसे "अरे महिला! उठो, और जीवित लोगों के लोक में जाओ" कहकर हटाया नहीं जाता था। स्पष्ट है कि ऋग्वैदिक काल में सतीप्रथा का प्रचलन नहीं था। इसके पश्चात् उस व्यक्ति के परिवार के अग्निस्थल से लायी हुई आग से चिता प्रज्ज्वलित की जाती थी। इसके बाद मृतक के लिए यह ऋचा पढ़ी जाती थी, "पुरखाओं के मार्ग पर जाओ" अग्नि में शव के पूर्णतया भस्म होने पर शरीर की अस्थियाँ एकत्रित कर ली जाती थीं और उन्हें धोकर स्वच्छ कर एक कलश में रखकर पृथ्वी में गाड़ दिया जाता था।
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