प्राचीन भारत में विज्ञान - science in ancient india

प्राचीन भारत में विज्ञान - science in ancient india


आज जिन विषयों की गणना विज्ञान के अंतर्गत की जाती है, उनसे संबंधित प्राचीन साहित्य आज इतना कम उपलब्ध है कि भारत में उनका विकास और प्रसार किस रूप में हुआ, यह सहज भाव से नहीं कहा जा सकता। इस विषय की जो कुछ थोड़ी बहुत जानकारी आज उपलब्ध है, वह मुख्यतः गणित, ज्योतिष और आयुर्वेद तक ही सीमित है। रसायन और खनिज विज्ञान का कुछ अनुमान आयुर्वेद संबंधी ग्रंथों के सहारे ही किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त प्राचीन काल में शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र और राजनीति विषयक साहित्य भी प्रस्तुत हुए थे। गार्डन चाइल्ड का कथन है- 'वन परंपरा में वनस्पति विज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान तथा जलवायु विज्ञान का मूल अंतर्निहित हैं। अग्नि पर नियंत्रण तथा उपकरणों का आविष्कार उन परंपराओं का प्रारंभ करते हैं जिनसे कालांतर में भौतिकी एवं रसायन शास्त्र का उदय हुआ।' 


गणित


आज की अंक लेखन पद्धति में केवल नौ अंकों और शून्य के सहारे बड़ी से बड़ी और छोटी-से- छोटी संख्या का बोध सहज रूप से किया और कराया जा सकता है। एक ही अंक को विभिन्न स्थानों पर रख कर, उससे एक, दस, सौ, हजार, लाख करोड़ आदि का बोध किया जा सकता है, किंतु पुराकाल में यह सहज पद्धति अज्ञात थी। उन दिनों प्रथम नौ संख्याओं के अतिरिक्त दस, बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर, अस्सी, नब्बे, सौ हजार आदि के लिए भी अलग-अलग चिह्न थे जिनके कारण आलेखन और अभिव्यक्ति दोनों में दुरूहता थी। यह दुरूह पद्धति बारहवीं शती तक यूरोप में प्रचलित रही। तदनंतर यूरोपवासियों को अरब के माध्यम से आज वाली लोकप्रचलित नौ अंकों और शून्यवाली

दशम पद्धति का ज्ञान हुआ, चूँकि इसका ज्ञान उन्हें अरब द्वारा हुआ, इस कारण उन लोगों ने इस पद्धति को अरबी संख्या-पद्धति का नाम दिया है। वस्तुतः यह आविष्कार अरब का अपना नहीं है। उसे इस पद्धति का ज्ञान भारत से हुआ था। इसी कारण अकों को अरबी में हिंदसा कहते हैं। यह पद्धति भारतीय है और इसका आविष्कार भारत में हुआ, यह अरब लेखकों, यथा इब्न बतूता (नवी शती ई.), अल्-मसूदी (दसवीं शती ई.), अल-बरूनी (ग्यारवीं शती ई.) ने स्पष्ट रूप से लिखा और स्वीकार किया है।


अंकों की इस दशम पद्धति का आविष्कार भारत में कब हुआ और किसने किया, इसका कोई उल्लेख कहीं प्राप्त नहीं है। 1881 ई.

में पेशावर के निकट बकशाली नामक ग्राम में उत्खनन करते समय एक किसान को एक प्राचीन ग्रंथ प्राप्त हुआ था। जो अत्यंत जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था और उसका रूप खंडित था। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि वह गणित-ग्रंथ है और उसकी रचना संभवत: तीसरी शती ई. में हुई थी। इस ग्रंथ में सर्वप्रथम उक्त दशम अंक पद्धति का प्रयोग हुआ है। इससे धारणा बनती है कि इस पद्धति का आविष्कार इससे पूर्व किसी समय हुआ होगा, किंतु कुछ विद्वान् इस पद्धति की इतनी प्राचीनता स्वीकार नहीं करते। उनकी धारणा है कि इस ग्रंथ में इस पद्धति का समावेश इस प्रति के प्रस्तोता ने पीछे से किया होगा। लिपि के आधार पर यह प्रति नवीं शती में तैयार की गयी जान पड़ती है। अतः इस धारणा के अनुसार इसका आविष्कार नवीं शती से पूर्व हुआ होगा। आर्यभट्ट (499 ई.) और वराहमिहिर (550 ई.) ने इस पद्धति का उल्लेख अपने ग्रंथों में किया है,

अतः इनके साक्ष्य से यह निस्संदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि इसका आविष्कार ही नहीं, वरन् प्रचार भी पाँचवीं शती तक इस देश में हो गया था। अतः यह कहना अनुचित न होगा कि गणित की यह पद्धति आरंभिक गुप्त काल की देन है।


कशाली से प्राप्त गणित ग्रंथ जिसका उल्लेख ऊपर हुआ है, अब तक ज्ञात भारतीय गणित का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इसमें भाग, वर्गमूल आदि गणित के सामान्य सिद्धांतों के अतिरिक्त गणित के अनेक उच्चस्तरीय प्रश्नों की भी चर्चा और समाधान है, जिससे तत्कालीन गणित के विकसित ज्ञान का परिचय मिलता है।

तदनंतर गणित संबंधी उल्लेख आर्यभट्ट रचित आर्यभट्टीय में मिलता है। यह ग्रंथ मूलतः ज्योतिष ग्रंथ है तथापि इसमें गणित, बीजगणित और ज्यामिति की पर्याप्त चर्चा हुई है जो तत्कालीन गणित शास्त्र के विस्तार की जानकारी प्रस्तुत करती है। इसमें संख्या, वर्ग, धन आदि गणित की बातों, बीजगणित के समीकरणों तथा ज्यामिति संबंधी वृत्त और त्रिभुज संबंधी अनेक महत्त्वपूर्ण गुणों और प्रमेयों की चर्चा है। आर्यभट्ट ने पाई () का जो मूल्य (3.1416) प्रस्तुत किया है वह तत्कालीन ज्ञात मूल्यों में सर्वाधिक शुद्ध है। बीजगणित के प्रसंग में चार अज्ञात तत्वों को लेकर समीकरण के प्रश्नों को हल किया गया है। 


 ज्योतिष विज्ञान


तीसरी शती से पूर्व इस देश में पैतामह सिद्धांत का प्रचलन था और वह बहुत कुछ वेदांग ज्योतिष का ही रूप था। उसके अनुसार 366 दिन का वर्ष था और 5 वर्ष के युग में दो अधिक मास हुआ करते थे।

उसकी गणना राशि से न होकर नक्षत्रों से हुआ करती थी। 300 ई. के लगभग वशिष्ठ सिद्धांतका विकास हुआ। इसमें नक्षत्रों का स्थान राशि ने लिया और लग्न की कल्पना भी गयी। इस सिद्धांत के अनुसार वर्ष 365.2591 दिन का होता है जो पैतामह सिद्धांत की अपेक्षा अधिक शुद्ध है, पर ग्रहण के संबंध में कोई जानकारी इस सिद्धांत में नहीं है। 380 ई. के लगभग पौलिश-सिद्धांत का विकास हुआ जिसमें सूर्य और चंद्रग्रहण की गणना की मोटी रूपरेखा प्रस्तुत की गयी है। तदनंतर 400 ई. के आस-पास रोमक- सिद्धांत प्रस्तुत किया गया। जैसा इसके नाम से प्रकट होता है यह रोम के माध्यम से भारत तक पहुँचने वाले पाश्चात्य ज्योतिष सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें 2850 वर्षों को युग कहा गया है। तदनंतर सूर्य सिद्धांत का विकास हुआ। इसमें ग्रहण की गणना के कुछ नियम और कतिपय खगोल संबंधी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है,

किंतु इस ग्रंथ का मूलस्वरूप क्या था, यह अनुमान करना आज संभव नहीं है। इसमें परवर्ती काल में अत्यधिक परिवर्तन-परिवर्धन किये गये।


इन सभी ज्योतिष सिद्धांत ग्रंथों के रचयिताओं के संबंध में किसी प्रकार की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। वराहमिहिर ने अपने ग्रंथ में इन सिद्धांतों का सार प्रस्तुत किया है, उसी से इनके संबंध में कुछ जाना जा सका है। वराहमिहिर ने इनके प्रस्तोता के रूप में देवताओं और ऋषियों का उल्लेख किया है। इस प्रकार ज्योतिष पर लिखने वाले अब तक ज्ञात सर्वप्रथम ऐतिहासिक व्यक्ति आर्यभट्ट हैं जो कदाचित् पाटलिपुत्र के निवासी थे। इनका जन्म शकसंवत् 398 (476 ई.) में हुआ था और उन्होंने 24 वर्ष की अवस्था में अपनी सुविख्यात पुस्तक आर्यभट्टीय प्रस्तुत की थी। इस ग्रंथ के दो खंड हैं - (1) दशगणिकासूत्र और (2) आर्याष्टशत। कुछ लोग इनको आर्यभट्टीय से भिन्न स्वतंत्र ग्रंथ मानते हैं।

इन्होंने अपने पूर्ववर्ती भारतीय ज्योतिर्विदों के सिद्धांतों और पद्धतियों का सूक्ष्म रूप से अध्ययन तो किया ही था, साथ ही अलेक्जेंड्रिया के यवन ज्योतिषियों के सिद्धांतों और निष्कर्षों की भी उन्हें पूर्णरूपेण जानकारी थी। उन्होंने दोनों का ही मनन किया, किंतु उनमें से किसी का अन्धानुकरण उन्हें स्वीकार नहीं हुआ। वे स्वयं अध्ययन, मनन और शोध से जिस निष्कर्ष पर पहुँचे, उसका उन्होंने अपने ग्रंथ में प्रतिपादन किया। श्रुति, स्मृति और पुराणों के प्रति आदर भाव रखते हुए भी ग्रहण के संबंध में राहु-केतु के ग्रसने वाली अनुश्रुति में उनका तनिक भी विश्वास न था। उन्होंने उसे पृथ्वी की छाया के बीच अथवा पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा के आने का परिणाम बताया। इसी प्रकार उन्होंने अलेक्जेंड्रिया के यवन ज्योतिष के परिणामों को भी आँख मूँद कर स्वीकार नहीं किया वरन् अपने निरीक्षण और गणनाओं के आधार पर उनमें संशोधन परिवर्तन उपस्थित किये। 

आर्यभट्ट


गुप्त काल में संस्कृति के अंय पक्षों के साथ-साथ ज्योतिष एवं खगोल विद्या का भी सर्वांगीण विकास हुआ। इस समय तक खगोल विद्या का अध्ययन इतना अधिक लोकप्रिय हो गया था कि कालिदास जैसे कवियों ने भी इसका अनेकशः उल्लेख किया।


आर्यभट्ट, प्रथम भारतीय खगोलशास्त्री हैं जिन्होंने पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने की बात कही। उन्होंने दिनों के घटने और बढ़ने की गणना करने का शुद्ध नियम भी प्रस्तुत किया। उन्होंने ग्रहण के संबंध में अनेक तथ्यों का उद्घाटन किया। इस प्रकार उन्होंने ज्योतिष शास्त्र की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण अनुसंधान प्रस्तुत किये,

किंतु उनके इन अनुसंधनों के साधन क्या थे, इनके संबंधमें कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं होती। जो भी हो, आर्यभट्ट भारत के महान् वैज्ञानिकों में एक थे।


आर्यभट्ट के अनेक शिष्य थे जिनमें निश्शंक, पांडुरंगस्वामिन, विजयनंदी, प्रद्युम्न, श्रीसेन, लाटदेव, लल्ल आदि के नाम मिलते हैं। लाटदेव के संबंधमें कहा जाता है कि वे सर्वसिद्धांतगुरु थे और उन्होंने पौलिश और रोमक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है। लल्ल के संबंधमें कहा जाता है कि उन्होंने शिष्यधीवृद्धि नाम से अपने गुरु के ग्रंथ आर्यभट्टीय पर टीका उपस्थित की थी। 


वराहमिहिर


गुप्तकालीन अंय प्रख्यात ज्योतिर्विद के रूप में वराहमिहिर का नाम ज्ञात है।

उनका जन्म कांपिल्य (जिला फरुखाबाद, उ. प्र.) में हुआ था और उनके पिता का नाम आदित्यदास था। उन्होंने अपनी गणना के लिए 506 ई. को आधार बनाया, इसलिए कुछ लोगों का अनुमान है कि यह उनके जन्म का समय होगा। एक उल्लेख के आधार पर, जिसकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं है, कहा जाता है कि उनकी मृत्यु 587 ई. में हुई। वे अपने पिता से शिक्षा प्राप्त कर उज्जयिनी नरेश के यहाँ चले गये थे, ऐसा अनुश्रुतियों से ज्ञात होता है। उनका उल्लेख विक्रमादित्य के नवरत्नों में भी पाया जाता है, पर तत्संबंध में कुछ प्रामाणिक रूप से नहीं कहा जा सकता।


वराहमिहिर के कथनानुसार ज्योतिषशास्त्र के तीन अंग हैं- (1) तंत्र (खगोल और गणित), (2) होरा अथवा जातक (कुंडली) और (3) संहिता (फलित ज्योतिष)। इन तीनों ही विषयों पर उन्होंने छः ग्रंथ प्रस्तुत किये थे,

किंतु उनमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे विज्ञान को उनकी मौलिक देन कहा जा सके, किंतु ज्ञात सामग्री को व्यवस्थित रूप से एक स्थान पर प्रस्तुत करने के कारण वे अपने क्षेत्र में सदैव स्मरण किये जाते हैं। अपनी पचसिद्धांतिका में उन्होंने पैतमिह, रोमक, पौलिश, वशिष्ठ और सूर्य सिद्धांतों का संक्षेप में परिचय प्रस्तुत किया है। इसी से इनके संबंधकी जानकारी प्राप्त होती है। इस कारण इतिहास की दृष्टि से इस ग्रंथ का विशेष महत्व है। बृहत्संहिता के रूप में उन्होंने एक विश्वकोष प्रस्तुत किया है। उसमें सूर्य, चंद्र तथा अंय नक्षत्रों की गति और उनका मानव जीवन पर प्रभाव की चर्चा तो है ही, साथ ही भूगोल, वास्तुकला, मूर्ति निर्माण, तड़ाग उत्खनन, उपवन-निर्माण, विभिन्न वर्ग की स्त्रियों और पशुओं के गुण दोष आदि अनेक विषयों के संबंध में बहुत-सी उपयोगी बातें भी हैं।

इसे उन्होंने काव्यमयी भाषा में छंदोबद्ध प्रस्तुत किया है। विवाह संबंधी शुभ मुहूर्त से संबंधितउनके दो ग्रंथ बृहद् और लघु विवाहपटल हैं। योगमाया नामक ग्रंथ में उन्होंने युद्ध संबंधी शकुनों की चर्चा की है। लघु और बृहज्जातक में उन्होंने कुंडली पर विचार किया है। इस विषय पर शतपंचाशिका नाम से एक ग्रंथ उनके पुत्र पृथुयशस का बताया जाता है।


वराहमिहिर पर यवन-ज्योतिष-शास्त्र का बहुत प्रभाव है। उन्होंने यवन ज्योतिर्विदों की भूरि-भूरि सराहना की है। उनका कहना है कि यद्यपि वे म्लेच्छ हैं तथापि वे खगोल-शास्त्र के अच्छे जानकार हैं, अतः पुराकालीन ऋषियों के समान ही वे भी आदरणीय हैं।

फलित ज्योतिष पर सारावली नामक एक ग्रंथ कल्याणवर्मन नामक किसी राजा ने प्रस्तुत की थी। उसे भी लोग छठी शताब्दी के अंत की रचना अनुमान करते हैं।


पृथुयशस


वराहमिहिर का पुत्र पृथुयशस भी ज्योतिष शास्त्र में बड़ा विद्वान था। उसने फलित ज्योतिष पर अधिक कार्य किया। उसने प्रश्न और जातक अथवा होरा (कुंडली) पर होराषट्रपन्चाशिका" नामक ग्रंथ लिखा।


कल्याण वर्मा


गुप्तयुग के उत्तरार्द्ध में कल्याणवर्मा नामक एक अंय विद्वान ज्योतिषी हुआ। उसका जन्म सन् 578 ईस्वी में हुआ था। वह गुप्त सम्राटों के अधीन देव ग्राम का एक छोटा राजा बतलाया जाता है। उसने यवन ज्योतिषियों के होरा शास्त्र के सार पर सारावली" नामक एक गरथ लिखा।