स्मृति युगीन धर्म, शैव संप्रदाय - Smriti Age Religion, Shaiva Sect
स्मृति युगीन धर्म, शैव संप्रदाय - Smriti Age Religion, Shaiva Sect
भारतवर्ष में शैव संप्रदाय का सबसे अधिक प्रचलन है। ये शिव को परम तत्व परमात्मा के रूप में मानते हैं। शिव की उपासना का मूल स्रोत वैदिक देवता रुद्र है। इस देवता के 2 रूप विकसित हुए- संहारक रुद्र और कल्याणकारी शिव शिव की उपासना के नाम पर शैव संप्रदाय का प्रवर्तन हुआ।
अनेक समालोचकों का विचार है कि भारत में शिवोपासना पर आर्येतर तथा अवैदिक प्रभाव है। एवं यह प्राग्वैदिक है। सिंधु घाटी सभ्यता में प्राप्त अनेक मुद्राओं पर एक देवता की आकृति अंकित है,
जिसका रूप पशुपति कहा गया है। इनमें लिंग का प्रतीक भी है। एक दूसरी आकृति ताम्रपट्ट पर मिली है। इसमें देवता को योगी के रूप में दिखाया गया है। इसके समक्ष दो सर्प बैठे हैं। गले में सर्पों की माला है। दोनों ओर व्याघ्र, हाथी, गैंडा और भैंसा हैं। सिंहासन के नीचे मृग चित्रित है। यहाँ बहुत संख्या में लिंग और योनियाँ प्राप्त हुई हैं। लिंगों की ऊँचाई एक से तीन फीट है। इन्हीं पाशुपति को आर्यों ने अपने वैदिक रुद्र देवता से तादात्म्य करके शैव धर्म का विकास किया। अब लिंगोपासना का समावेश रुद्र की उपासना में सम्मिलित हो गया।
सर्वप्रथम 'श्वेताश्वर उपनिषद्' में शिव की उपासना ईश्वर के रूप में मिलती है। शिव संसार के शासक, अनन्यतम देव हैं। वे सृष्टि के रचयिता,
पालक और संहारक हैं। वे परब्रह्म सर्वव्यापक ईश हैं। शैव संप्रदाय का विकास संभवतः यहीं से प्रारंभ हुआ है।
'महाभारत' में शिवोपासना के अनेक उदाहरण हैं। शिवोपासना से अर्जुन ने पाशुपत अस्त्र और अश्वत्थामा ने खड्ग पाया था। नर (अर्जुन) और नारायण (कृष्ण) ने उपासना करके शिव से वर प्राप्त किया। उमा और शिव सकल जगत के उत्पादक हैं। उनकी उपासना ब्रह्मा और शिव भी करते हैं।
‘महाभारत' के नारायणीय प्रकरण में पाशुपत का उल्लेख है।
पतंजलि ने शैव संप्रदाय का उल्लेख किया है। वे इनको शिवभागवत कहते हैं। ये उपासक अपने उपास्य देवता के आयुधों - लौहनिर्मित त्रिशूल और दंड को धारण करते थे। अजिन (मृगचर्म) पहनते थे। पतंजलि ने शिव, स्कंद और विशाखा की मूर्तियों का भी उल्लेख किया है। महाभाष्य' के उत्तरवर्ती साहित्य में शिव को परम ब्रह्मरूप कहा गया है। कालिदास इनके परम उपासक थे। शैवमत के संस्थापकों में लकुलीश या नकुलिन् या लकुलिन् थे। वे संभवतः ईसा की प्रथम
शताब्दी ई. में हुए इनको शिव का 28वाँ तथा अंतिम अवतार कहा गया है। इनके चार शिष्य थे- कुशिक, गार्ग्य, कौरुष और मैत्रेया इन्होंने पाशुपतों के चार संप्रदार्थों को जन्म दिया। 'वायु पुराण और 'लिंगपुराण में शिव में लकुलिन् रूप में अवतीर्ण होने की भविष्यवाणी है।
इन विवरणों से स्पष्ट है कि शैव या पाशुपत संप्रदाय का जन्म महाभारतयुग में हो चुका था। ईसा से पहले ही सारे भारत में इसका व्यापक प्रचार था। इसके बाद यह और भी अधिक विकसित हुआ। सारे भारत में शिव के मंदिरों का निर्माण हुआ तथा 12 ज्योतिर्लिंगों की कल्पना हुई। इनके नाम हैं- मांधाता में ओंकार, उज्जयिनी में महाकाल, नासिक के पास त्रयम्बक, एलोरा में घृष्णेश्वर, अहमदनगर से पूर्व नागनाथ, सह्याद्रि पर्वत में भीमा नदी के उद्गमस्थल पर भीमेश्वर या भीमशंकर, गढ़वाल में केदारनाथ, वाराणसी में विश्वेश्वर, सौराष्ट्र में सोमनाथ, परली के पास वैद्यनाथधाम में वैद्यनाथ, श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन और दक्षिण में रामेश्वर ।
शैवमत में शिव परम परमेश्वर हैं, परंतु इनके परिवार की भी कल्पना है।
इनकी पत्नी सती या पार्वती हैं। दो पुत्र हैं - गणेश और कार्तिकेय । इनका वाहन नंदी वृषभ है। समालोचकों का विचार है कि शिव का यह परिवार आर्येतर कल्पना है। सिंधुघाटी की सभ्यता में छोटी-छोटी स्त्री-मूर्तियाँ मिलती हैं। इस संस्कृति में मातृदेवी की उपासना प्रचलित थी। यही देवी आर्य-परंपरा में आकर शिव की पत्नी पार्वती प्रसिद्ध हुई। अब शिव अर्धनारीश्वर के रूप में प्रसिद्ध हुए। संपूर्णानंदने गणेश को आर्येतर देवता सिद्ध किया है। ये अनावों के देवता थे तथा विघ्नहर्ता थे। आर्यों ने इस देवता को स्वीकार करके विघ्न विनाशक का रूप दिया। देवता के रूप में स्वीकृत हो जाने पर वैदिक साहित्य, सूत्र-ग्रंथ, उपनिषद साहित्य में इनका देवता के रूप में स्मरण किया जाने लगा। स्कंद (कार्तिकेय) को भी अनेक विद्वान् समालोचक आर्येतर मानते हैं।
स्कंद को साहित्य में चोरों, डाकुओं और तस्करों का आराध्य कहा गया है। विद्वानों की यह भी मान्यता है कि द्रविड़ों के युद्ध तथा वीरता के देवता मुरुगवको आर्यों ने कार्तिकेय बना दिया। शिव तथा उनके परिवार के पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी को इस प्रकार आर्येतर माननेवाले विद्वानों ने जो भी युक्तियाँ दी हैं, वे अनुमान पर ही आश्रित है। वस्तुतः इन सब देवताओं के संकेत वैदिक साहित्य और सूत्र ग्रंथों में हैं। पुराण-साहित्य में इनके साथ अनेक गाथाओं की कल्पना हुई तथा इनको विशुद्ध आर्य देवताओं के रूप में प्रचारित किया गया। शक्ति, गणेश और कार्तिकेय के उपासकों के अलग संप्रदाय भी बन गये।
शैव धर्म (संप्रदाय) अनेक शाखाओं में विभक्त हुआ था। इनमें पाशुपत, माहेश्वर और शिवभागवत प्राचीन हैं। कालांतर में कापालिक, वीरशैव (लिंगायत), कालमुख, जंगम, भारशिव, रसेश्वर, शिवाद्वैत आदि संप्रदायों का आविर्भाव हुआ। शैवदर्शन तथा उसकी शाखाएँ भी विकसित हुई।
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