स्मृति युगीन धर्म ,शाक्त संप्रदाय , गणपति संप्रदाय - Smriti era religion, Shakta sect, Ganapati sect
स्मृति युगीन धर्म ,शाक्त संप्रदाय , गणपति संप्रदाय - Smriti era religion, Shakta sect, Ganapati sect
शक्ति के उपासक शाक्त कहे गये थे। इनके मत में शक्ति ही सृष्टि के उद्भव और विकास की मूल कारण है। प्राचीन धार्मिक साहित्य में शक्ति के दो रूप हैं एक तो शिव की सहयोगिनी है, जो सती, पार्वती, उमा आदि नामों से प्रसिद्ध है। दूसरी वह स्वतंत्र परा आद्या शक्ति है, जो संपूर्ण जगत की सृष्टि- स्थिति-प्रलय की कारण हैं। शाक्तों का शैवों के साथ घनिष्ठ संबंध हैं, क्योंकि शक्ति को शिव की सहयोगिनी के रूप में कल्पित कर लिया गया था।
शक्ति-पूजा के उद्भव का समय निश्चित करना कठिन है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि आर्यों की शक्ति-पूजा का रूप बहुत कुछ सिंधु घाटी सभ्यता की मातृदेवी की पूजा से मिलता है।
'ऋग्वेद' में अदिति को माता, पिता, पुत्र, विश्वेदेव आदि सभी कुछ माना गया है। आदित्य वर्ग के देवों की यह माता हैं और पृथ्वी को धारण करती हैं। 'अथर्ववेद' में शक्ति का निरूपण है। 'केनोपनिषद्' में हैमवती उमा को सर्वशक्तिसंपन्न देवी कहा गया है। वे आद्याशक्ति महामाया हैं।
'महाभारत' और पुराणों में शक्ति का स्तवन है। युधिष्ठिर और अर्जुन दुर्गा की स्तुति करते हैं। इनको दुर्गा, कुमारी, काली, कपालिनी, महाकाली, चंडी, कात्यायिनी कराला, विजया,
कौशिकी, कांतारवासिनी, महिषासुरमर्दिनी आदि नाम दिये गये हैं। इनको सुरा, माँस और पशुबलि प्रिय है। शाक्त उपासक शक्ति की उपासना इन्हीं द्रव्यों से करते हैं। संभावना यह भी की गई है कि शक्ति की उपासना का यह रूप गुप्त युग के बाद प्रचलित हुआ था। 'महाभारत' में ये वर्णन बाद में जोड़े गये थे। पुराणों के अनुसार दुर्गा या महिषासुरमर्दिनी का प्रादुर्भाव शिव, ब्रह्मा और विष्णु के प्रचंड तेज से हुआ। उनको चंडी और अंबिका कहा गया है। शुभ और निशुंभ असुरों का वध करने के लिए पार्वती के शरीर से अंबिका प्रसूत हुई। इस समय पार्वती का शरीर काला पड़ जाने से इनको कालिका कहा गया। चंड-मुंड असुरों का
विनाश करने से वे चामुंडा हुई। सिंह को इनका वाहन माना गया। स्मृति काल में देवी के विविध रूपों की उपासना प्रचलित हुई। इसके तीन रूप कहे गये -
( 1 ) सौम्य रूप, जिसका सामान्य जन पूजन करते हैं।
(2) प्रचंड रूप, जो कापालिकों को मान्य है। इस पर पशुबलि और नरबलि भी दी जाती है।
(3) कामप्रधान रूप, जो त्रिपुरसुंदरी रूप में विश्व का सृजन करती है। पूजा-पद्धति के आधार पर शाक्तों के दो मत हुए कौल और समयी कौल-उपासक माँस-मदिरा आदि पदार्थों से नारीसुलभ ऐद्रिक सुखों को अपनाकर शक्ति को प्रसन्न करते थे। कौलों का भैरवीचक्र प्रसिद्ध है। इसमें वर्णभेद नहीं रहता, परंतु इस चक्र के पूरा हो जाने पर सब पुनः अपने वर्ण के हो जाते हैं। समयी इन सबसे हैं और प्रतीकवाद का सहारा लेकर शक्ति की उपासना करते हैं।
गणपति संप्रदाय
गणेश या गणपति को पुराणों में शिव का पुत्र कहा गया है। अनेक विचारक गणेश का प्रारंभ आर्येतर कहते हैं, परंतु देवताओं के गणपति की उपासना ऋग्वैदिक युग में ही प्रारंभ हो गई थी। उत्तरवर्ती पौराणिक काल में गणेश को शिव का पुत्र मान लिया गया।
गणपति का पूजन भारत में छठी शताब्दी ई. में प्रारंभ हुआ था। ये बुद्धि के देवता थे और विघ्नविनाशक समझे जाते थे। प्रत्येक कार्य के आरंभ में विघ्नों के निवारण के लिए गणपति पूजन की परंपरा हो गई। इनका एक विशिष्ट रूप भी कल्पित हुआ। ये विघ्नविनाशक, स्थूलवदन, वरद, हस्तिमुख, वक्रतुंड,
एकदंत, लंबोदर तथा मोदकप्रिय रहे। मूषक इनका वाहन है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को इनका विशेष पूजन किया जाता है जिसको गणेश चतुर्थी कहते हैं। मंदिरों में शिव-पार्वती की मूर्ति के साथ गणेश की मूर्ति भी अवश्य होती है। गणेश का पूजन पुष्प, फल, फूल, मोदक, दही, दूध, धूप, दीप आदि से करना अनिवार्य है।
कार्तिकेय संप्रदाय
कार्तिकेय देवता की भी शिव के पुत्र के रूप में कल्पना है। अनेक समालोचकों ने कार्तिकेय को भी आर्येतर माना, परंतु इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है।
पुराणों के अनुसार कार्तिकेय का जन्म तारकासुर का विनाश करने तथा देवसेना का नेतृत्व करने के लिए हुआ था। इनके नाम स्कंद, कुमार और गुह भी हैं। गुप्त काल के अभिलेखों में इनको सुब्रह्मण्य भी कहा गया है। कार्तिकेय का यह नाम दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित हुआ।
कार्तिकेय की उपासना भारत में अतिप्राचीन काल से प्रचलित रही है। पतंजलि ने इनका उल्लेख किया है। गुप्तकाल में कार्तिकेय की उपासना अधिक प्रचलित रही होगी। गुप्त राजाओं के कुमारगुप्त, स्कंदगुप्त आदि नाम इसके सूचक हैं। कुलशेखर वर्मन् ने राजकीय प्रासादों के पास कार्तिकेय के मंदिरों का उल्लेख किया है। मयूरासीन कार्तिकेय की मूर्तियों का प्रथम द्वितीय शताब्दी ई. का नमूना मथुरा संग्रहालय में हैं। कालिदास के समय में कार्तिकेय का पूजन प्रचलित था। उसने मेघदूत' में इसका उल्लेख किया है। 'कुमारसंभव काव्य की रचना भी इसका पुष्ट प्रमाण है।
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