स्मृति ग्रंथ (धर्मशास्त्र) - Smriti Granth (Theology)
स्मृति ग्रंथ (धर्मशास्त्र) - Smriti Granth (Theology)
स्मृति ग्रंथों में आर्यों की प्राचीन, राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था संबंधी कानूनों का विवेचन है। मुख्य स्मृतियाँ और ग्रंथ इस प्रकार हैं-
मनुस्मृति
स्मृति ग्रंथों की संख्या विभिन्न रूप से मिलती है। प्राचीन ग्रंथों के अवलोकन से 100 से अधिक स्मृतियों के नाम मिल जाते हैं, परंतु विश्वसनीय स्मृतियाँ कम ही हैं।
स्मृति-ग्रंथों में 'मनुस्मृति' सबसे महत्वपूर्ण है। 'मनुस्मृति का वर्तमान रूप ई. पू. चतुर्थ शताब्दी में आ गया था। 'उपलब्ध' मनुस्मृति में 12 अध्याय और 2694 श्लोक हैं।
इसमें लोक-जीवन से संबंधित सभी पक्षों पर विचार हुआ है। इस ग्रंथ पर मेधातिथि गोविंदराज और कुल्लूक भट्ट की टीकाएँ प्राचीन तथा प्रामाणिक हैं।
याज्ञवल्क्यस्मृति
‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ के रचयिता याज्ञवल्क्य कहे जाते हैं, परंतु यह स्मृति 'मनुस्मृति से भी बहुत बाद की है। यह तीन भागों में विभाजित है और इसमें 1010 श्लोक हैं। इसका दायभाग- प्रकरण अधिक मान्य हुआ था। इस पर अनेक टीकाएँ लिखी गई। उनमें विश्वरुप, विज्ञानेश्वर, अपरार्क और शूलपाणि मुख्य हैं।
पराशरस्मृति
इस स्मृति को पराशर मुनि के नाम से जाना जाता है। इसमें 12 अध्याय और 593 श्लोक हैं। टीकाकार माधव ने व्यवहार-संबंधी अंश बाद में जोड़ा है।
नारदस्मृति
'नारद स्मृति' को नारद के नाम से जाना जाता है। इसके लघु तथा बृहद् दो संस्करण मिलते हैं। इसकी रचना प्रथम शताब्दी ई. में हुई थी।
बृहद् 'नारदस्मृति' में 18 अध्याय और 1028 श्लोक हैं। इन पर असहाय की महत्त्वपूर्ण टीका है। इसका कल्याण भट्ट ने संशोधन किया था।
बृहस्पतिस्मृति- वृहस्पति स्मृति
'बृहस्पति स्मृति' की रचना चतुर्थ शताब्दी ई. में संभावित है। संपूर्ण ग्रंथ उपलब्ध नहीं हो सका है। 719 श्लोकों को एकत्र करके डॉ. जाली ने इसे संपादित किया था।
इन पर मनुस्मृति का बहुत प्रभाव इन स्मृतियों के अतिरिक्त कात्यायन, अंगिरा ऋष्यश्रृंग, दक्ष, पितामह, पुलस्त्य, प्रचेता,
प्रजापति, मरीचि, यम, लौगाक्षि, विश्वामित्र, व्यास, संवर्त, हारीत आदि ऋषियों द्वारा रचित स्मृतियों के उद्धरण अंय धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में पाये जाते हैं।
टीकाएँ
धर्मसूत्रों तथा स्मृतियों पर अनेक विद्वानों ने प्राचीन समय में टीकाएँ लिखी थीं। इनमें सहाय, भर्तृयज्ञ, विश्वरुप, भरुचि, श्रीकर, मेधातिथि, भोज, विज्ञानेश्वर, हलायुध, गोविंदराज, अपरार्क, हरदत्त, कुल्लूकभट्ट और बालकृष्ण के नाम उल्लेखनीय हैं।
वार्तालाप में शामिल हों