छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सामाजिक परिस्थिति - Social situation in 6th century BC
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सामाजिक परिस्थिति - Social situation in 6th century BC
सामाजिक परिस्थिति
प्राचीन भारतीय सामाजिक जीवन का मूल तत्व वर्णाश्रम व्यवस्था थी। प्राचीन विचारकों ने समाज को चार वर्णों में विभक्त किया था। ई.पू. छठी शताब्दी में भी वर्ण व्यवस्था थी, जिस पर बौद्ध साहित्य से प्रकाश पड़ता है।
वर्ण व्यवस्था
छठी शताब्दी ई. पू. में बौद्धकालीन समाज में वर्ण व्यवस्था ऊँच-नीच की भावना से ग्रस्त होकर समाज को जर्जर कर रही थी। बुद्ध के प्रादुर्भाव के समय तक वर्ण व्यवस्था विकृत हो चुकी थी। बुद्ध साहित्य में इसकी कड़ी आलोचना की गई है, जन्म के स्थान पर कर्म को महत्व दिया गया है और सामाजिक ऊँच-नीच के विरुद्ध आवाज उठाई गई है।
आचार-विचार तथा सात्विक नैतिक जीवन को आधार माना गया। उस काल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों में सामाजिक स्थिति के संबंध में प्रतिद्वंद्विता का भी प्रारंभ हो गया था। बौद्ध धर्म का प्रारंभ पूर्वी भारत में हुआ था। बुद्ध के अनुसार जन्म से न कोई ब्राह्मण होता है और न कोई चाण्डाला कर्म के आधार पर ही किसी को ब्राह्मण या चाण्डाल कहना उचित है। बुद्ध के मतानुसार केवल ब्राह्मण ही स्वर्ग के अधिकारी नहीं होते, अपितु पुण्य कर्मों द्वारा क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी स्वर्ग को प्राप्त कर सकते हैं। बुद्ध द्वारा ब्राह्मणों की सर्वोच्च स्थिति के विरुद्ध आवाज उठाने का एक कारण यह भी था कि उस समय ऐसे ब्राह्मण भी थे, जो धर्म विरुद्ध कार्यों में लिप्त रहने लगे थे।
इस युग में ब्राह्मण की प्रतिष्ठा और सम्मान को बहुत आघात लगा, उनकी परंपरागत श्रेष्ठता को चुनौती दी गई।
यह भी माना गया कि किसी विशेष कर्म पर किसी विशेष वर्ण का एकाधिकार नहीं है। क्षत्रिय वर्ग का समाज में दूसरा स्थान रहा है, किंतु बौद्ध युग में उसने अपना प्रमुख स्थान बना लिया था। बुद्ध और महावीर जैसे बौद्धिक नेताओं के इसी वर्ण में जन्म लेने के कारण शक्ति प्रदर्शन के कार्यों के साथ क्षत्रिय वर्ग ने अपने को विद्या और शिक्षा के क्षेत्र से भी जोड़ लिया।
वैश्य वर्ण अत्यंत समृद्ध और संपन्न वर्ग था। यह धनी वर्ग समय-समय पर राजाओं की भी सहायता करता था। शूद्र की अवस्था दयनीय ही रही। समाज का इन पर अनेक प्रकार का अंकुश और नियंत्रण था तथा ये अधिकारविहीन व सम्मानहीन थे। जैन साहित्य द्वारा भी ज्ञात होता है कि महावीर ने भी जन्म की कर्म को महत्व दिया। में तुलना
स्त्रियों की स्थिति
बौद्ध ग्रंथों से छठी शताब्दी ई.पू. के समाज में स्त्रियों की स्थिति पर भी प्रकाश पड़ता है। सच्चरित्र स्त्री का समाज में मान होता था, घर में स्त्रियों का आदर था, पर्दा प्रथा नहीं थी, परंतु फिर भी स्त्रियों को समानता का स्तर प्राप्त नहीं था। प्रारंभ में गौतम बुद्ध ने स्त्रियों को संघ प्रवेश की आज्ञा नहीं दी थी। बाद में अपने प्रिय शिष्य आनंद के बहुत अनुनय विनय के बाद उन्होंने यह आज्ञा दे दी थी, परंतु इसके साथ ही उन्होंने संघ में प्रवेश करने के लिए स्त्रियों पर आठ प्रतिबंध भी लगा दिए थे। इन प्रतिबंधों के कारण स्त्रियों का संघ जीवन बहुत कष्टदायक हो गया, साथ ही उनका स्थान भी निम्न था। इस पर भी बुद्ध ने कहा था, "आनंद अब जब खियों का प्रवेश संघ में हो गया, धर्म चिरस्थायी नहीं रह सकेगा।" इसके साथ ही बौद्ध साहित्य में अनेक सुयोग्य और सुशिक्षित स्त्रियों के भी उदाहरण मिलते हैं। जैन ग्रंथों में भी विदुशी स्त्रियों का उल्लेख है।
विवाह का स्वरूप छठी शताब्दी ई.पू. में बौद्ध साहित्य समकालीन विवाह संस्था के स्वरूपों पर प्रकाश डालता है। विवाह के आठ प्रकारों में सबसे अधिक लोक-प्रतिष्ठित प्रकार प्रजापत्य विवाह का था। इसमें विवाह माता-पिता द्वारा नियोजित होता था, परंतु स्वयंवर तथा गन्धर्व विवाहों के भी अनेक उदाहरण बौद्ध साहित्य में मिलते हैं। इन्हें भी धर्मानुकूल माना जाता था। वत्स नरेश उदयन का अवन्ति नरेश प्रद्योत की कन्या वासवदत्ता के साथ गन्धर्व विवाह का उल्लेख मिलता है। इस काल में सजातीय विवाहों की ही प्रधानता थी, परंतु यदा-कदा अंतर्जातीय विवाह के उदाहरण मिलते हैं। कोसल के राजा प्रसेनजीत ने श्रावस्ती के माली की कन्या मल्लिका से वैवाहिक संबंध स्थापित किया था।
बालविवाह की प्रथा उस समय प्रचलित नहीं थी, कन्याओं का विवाह सामान्यतया सोलह वर्ष की आयु में किया जाता था। इस काल के विवाहों में दहेज की प्रथा भी प्रचलित थी। धम्मपद में एक उदाहरण मिलता है, जिसमें श्रावस्ती के श्रेष्ठी निगार ने अपनी कन्या के विवाह के अवसर पर अपार संपत्ति दहेज के रूप में दी थी। इस काल में बहुविवाह की प्रथा का भी प्रचलन था।
शिक्षा- छठी शताब्दी ई.पू. की शिक्षा के विषय में अनेक ग्रंथ प्रकाश डालते हैं। बौद्ध भिक्षुओं के शिक्षा केंद्र विहार थे, जहाँ अध्ययन, अध्यापन, मनन, पाठ आदि चलता था। उस समय तक्षशिला और काशी जैसे नगरों में बहुत से शिक्षा केंद्र या विद्यापीठ भी विकसित हो गए थे,
जिनमें विश्वविख्यात आचार्य कतिपय विशिष्ट विषयों की उच्च शिक्षा दिया करते थे। इन आचार्यों की विद्वता से आकृष्ट होकर दूर-दूर के प्रदेशों से विद्यार्थी उनके पास विद्याध्ययन के लिए आया करते थे। जातकों से ज्ञात होता है कि तक्षशिला में चिकित्साशास्त्र, धनुर्विद्या, राजविद्या, पशुभाषा ज्ञान, आखेट तथा अनेक शिल्पादि की शिक्षा दी जाती थी। ब्राह्मणों, क्षत्रियों और राजकुमारों की पृथक-पृथक शिक्षा-संस्थाएँ होती थीं। प्रसिद्ध शिक्षा केंद्रों में अध्ययन करने वाले विद्यार्थी अधिकांशतः ब्राह्मण और क्षत्रिय ही होते थे। वैश्य विद्यार्थियों की संख्या कम थी।
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