सम्राटों की मूर्तियाँ - statues of emperors
सम्राटों की मूर्तियाँ - statues of emperors
मथुरा की कला की एक विशेषता व्यक्तियों की विशाल मूर्तियों का निर्माण था। कला की दृष्टि से ये मूर्तियाँ बहुत ही भव्य हैं। मथुरा के पास 9 मील उत्तर में माट नामक गाँव में संभवतः कुषाण राजाओं की मूर्तियाँ रखने का एक बड़ा भवन था, इसे उस समय देवकुल कहते थे। यहाँ से कनिष्क, विम तथा चष्टन की मूर्तियाँ मिली हैं। कुषाण-सम्राटों का इसी प्रकार का एक अन्य देवकुल मध्य एशिया में किरगिज तान तोपरक्काला नामक गाँव में भी मिला है। इससे यह जान पड़ता है कि कुषाण सम्राटों ने अपने साम्राज्य के दोनों सिरों पर सम्राटों की मूर्तियाँ रखने वाले देवकुलों की स्थापना की थी। कुषाण सम्राटों की मूर्तियों में सबसे प्रसिद्ध प्रतिमा कनिष्क की है। यह मस्तकहीन खड़ी हुई मूर्ति (7 फीट 7 इंच) 1911 में माट ग्राम से मिली थी।
इस पर यह लेख अंकित है- महाराज राजाधिराजा देवपुत्रों कनिष्को। राजा घुटनों से नीचे तक का लंबा कोट पहने हैं, पैरों में भारी गद्दीदार जूते हैं, ये टखनों पर बद्धियों से कसे हैं राजा के एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में तीन फुट पाँच इव लंबी गदा या राजदंड हैं। तलवार की मूठ पर हंस की आकृति बनी है और म्यान पर तीन पदक या टिकरे हैं। गदा पर पाँच कड़े हैं और निचले कड़े पर मकरमुखी अलंकरण हैं। इस मूर्ति ने शीतप्रधान देशों के भारी जूतों वाली ऐसी पोशाक पहन रक्खी है जो मथुरा की गर्मी में सर्वथा अनुपयुक्त प्रतीत होती हैं। अतः रोलैंड ने यह कल्पना की है कि यह विशेष राजकीय समारोहों पर पहनी जाने वाली शाही पोषाक है। इसे कुषाण आक्रांता शीतप्रधान देशों से अपने साथ यहाँ लाये थे।
इसका उपयोग विशेष अवसरों पर ही किया जाता था, यह उनका राजकीय वेश था। रोलैंड के कथनानुसार असीरिया के अथवा रोम के किसी भी सम्राट को कोई मूर्ति मध्य एशिया से आए इस विजेता की प्रतिमा की अपेक्षा अधिक प्रबल रूप में सत्ता और शक्ति की गरिमा को प्रकट नहीं करती है। इसी प्रकार एक दूसरी बैठी मूर्ति विम कदफिसस की कही जाती है। यह एक सिंहासन पर आसीन है। इसने कामदानी के वस्त्र का सुंदर कढ़ाई वाला चोगा पहन रखा है। इसके नीचे एक छोटा कोट हैं। टांगों पर सलवार और पैरों में कनिष्क की मूर्ति की भाँति भारी गद्दीदार जूते हैं, जो आजकल भी गिलगित में पहने जाते हैं। इस प्रतिमा में भी सम्राट का गौरव भलीभाँति झलक रहा है। रोलैंड के विचार में यह मूर्ति हर्जफेल्ड द्वारा प्रकाशित पार्थियन युग के ईरानी सम्राटों की प्रतिमा से मिलती है। प्राचीन भारत में इस प्रकार सम्राटों की प्रतिकृति - प्रतिमाओं का एकमात्र उदाहरण यही मूर्तियाँ हैं। अतः यह कहा जाता है कि कुषाणों ने संभवत: ऐसी मूर्तियाँ बनवाने की परिपाटी भी रोम अथवा ईरान के पार्थियन सम्राटों से ग्रहण की होगी।
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