शिक्षा के विषय - subjects of education
शिक्षा के विषय - subjects of education
डॉ. आर. के. मुकर्जी ने अपनी पुस्तक एन्शियंट इंडियन एजुकेशन में - प्राचीन काल में पढ़ाये जाने वाले शिक्षा-विषयों का निम्नानुसार वर्गीकरण किया है। उनके अनुसार चार वेदों से अतिरिक्त शिक्षा के विषय निम्नलिखित थे-
(1) अनुशासन इसके अंतर्गत छः वेदांगों शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष का अध्ययन कराया जाता था।
(2) विद्या- इसमें न्याय, मीमांसा आदि दर्शन अथवा सर्पविद्या, विष विद्या आदि सम्मिलित थे।
(3) वाकोवाक्य तर्कशास्त्रा
(4) इतिहास-पुराणा
(5) आख्यान कथायें।
(6) अन्वाख्यान पूरक कथायें।
(7) अनुव्याख्यान मंत्रों की व्याख्यायें ।
(8) व्याख्यान सूत्रों की व्याख्यायें ।
(9) गाथा - छंदोबद्ध रचनायें।
(10) नाराशंसी मनुष्यों से संबंधितगाथायें।
(11) ब्राह्मण ग्रंथा
(12) क्षत्रविद्या युद्धविद्या।
(13) राशि गणित।
(14) नक्षत्रविद्या।
(15) भूतविद्या वशीकरण, इंद्रजाला
(16) सर्पविद्या
(17) अथर्वाधिरस:- अथर्ववेद की विद्या। इसके अंतर्गत भेषज, यातु (जादूगिरी) तथा अभिचार हैं।
(18) दैव उत्पात ज्ञान।
(19) निधि निधि दर्शन के उपायों का ज्ञान।
(20) पित्र्य श्राद्ध-कल्प।
(21) सूत्र यज्ञ करने की शिक्षा।
(22) उपनिषद (23) श्लोका
(24) वेदानां वेद प्राचीन संस्कृत व्याकरणा
(25) एकायन नीतिशास्त्रा
(26) देवविद्या- देवताओं की उपासना की विद्या।
(27) ब्रह्मविद्या।
(28) देवयजनविद्या इसके अंतर्गत विविध कलाओं सुगंधि बनाना, रंगना, नृत्य, गान, बाद्य, क्रीड़ा, चिकित्सा आदि हैं।
'महाभारत' में शिक्षा के लिए प्रसिद्ध अनेक आश्रमों का वर्णन आता है। यहाँ टू-दूर से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे। आश्रमों में शिक्षा के अनेक विभाग होते थे। इनको स्थान कहा जाता था। इन स्थानों की गणना इस प्रकार है-
(1) अग्निस्थान- यहाँ यज्ञ किया जाता था और सामूहिक रूप से अग्नि की उपासना की जाती थी।
(2) ब्रह्मस्थान- यहाँ वेद-विद्या का अध्ययन कराया जाता था।
(3) विष्णुस्थान यहाँ दंडनीति, अर्थनीति और वार्ता की शिक्षा दी जाती थी।
(4) महेंद्रस्थान - यहाँ सैनिक शिक्षा का प्रबंध होता था।
(5) विवस्वतस्थान यहाँ ज्योतिष के अध्ययन का प्रबंध था।
(6) सोमस्थान- यहाँ वनस्पतिविज्ञान की पढ़ाई होती थी।
(7) गरुडस्थान यहाँ वाहनों और परिवहन से संबंधितशिक्षा दी जाती थी।
(8) कार्तिकेयस्थान यहाँ सैनिक संगठन की शिक्षा का प्रबंध था। वैदिक युग के उपरांत संस्कृति के विकास के साथ-साथ अध्ययन के विषयों का भी विस्तार हुआ। धार्मिक शिक्षा के साथ ही कला, विज्ञान और शिल्प के तकनीकी ज्ञान में वृद्धि हुई। विद्यालयों में अनेक लौकिक विषयों के अध्यापन का प्रबंध होने लगा। चौसठ कलाओं के शिक्षण की व्यवस्था की गई। इनमें चित्रकला, मूर्तिकला, नृत्य, गीत और वाद्य मुख्य थे। शिल्पों का शिक्षण होता था। 'नारदस्मृति' में शिल्पों के शिक्षण की पद्धति का विस्तृत वर्णन है। रामायण, भागवत पुराण, महाभाष्य, कामसूत्र एवं शुक्रनीति में 64 कलाओं का भी उल्लेख प्राप्त होता है। अतः संभवतः इन कलाओं का शिक्षण भी विद्यार्थियों को दिया जाता था।
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