सूत्रयुगीन धर्म - Sutra-age religion

सूत्रयुगीन धर्म - Sutra-age religion


धार्मिक विकास की दृष्टि से सूत्र युग में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। शुंग युग का श्रीगणेश वैदिक धर्म के पुनरोहरण की लहर से और बौद्ध धर्म के विरूद्ध प्रबल प्रतिक्रिया के साथ हुआ, किंतु इस समय वैदिक युग के जिस धर्म को पुनरूज्जीवित करने का प्रयत्न किया जा रहा था, वह दुबारा लौटकर नहीं आ सकता था। बौद्ध धर्म ने जनता के विचारों में जो परिवर्तन किया था उसे मिटाया नहीं जा सकता था। छठी शताब्दी ई. पूर्व में बौद्ध और जैन धर्मों के रूप में पुराने वैदिक धर्म के विरूद्ध जो महान क्रांति हुई थी, उसका प्रभाव हिंदू धर्म पर पड़ना स्वाभाविक था। इन धर्मों के आक्षेपों और चुनौतियों का उत्तर देने के लिए हिंदू धर्म द्वारा अपने सिद्धान्तों और मंतव्यों को श्रृंखलाबद्ध एवं तर्कसंगत रूप दिया गया। विरोधियों के आक्रमणों से रक्षा करने के लिए धर्म एवं दर्शन संबंधी विचारोंको,

रामायण और महाभारत में तथा विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों में व्यवस्थित रूप से उपनिबद्ध किया गया। बौद्ध और जैन धर्म जिन तत्वों के कारण लोकप्रिय हो रहे थे, उनको अपने धर्म में समाविष्ट करके हिंदू धर्म को सुदृढ़ किया गया। इस समय न केवल वैदिक धर्म को नवीन रूप प्राप्त हुआ, अपितु बौद्ध धर्म को भी महायान संप्रदाय द्वारा एक नवीन रूप प्राप्त हुआ। हिंदू धर्म में भक्ति-प्रधान वैष्णव शैव संप्रदायों का विकास हुआ। सूत्र युग के धार्मिक विकास की सामान्य विशेषतायें निम्नलिखित हैं।


भक्ति प्रधान संप्रदायों का अभ्युदय


सूत्र युग की पहली विशेषता भक्ति-प्रधान संप्रदायों का अभ्युदय और प्राबल्य था।

वैष्णव और शैव धर्मों में भक्ति और प्रसाद के सिद्धांतों को महत्व दिया गया। भक्ति का आशय अपने आराध्य देवता के प्रति अगाध प्रेम, उपासना और पूर्णरूप से आत्मसमर्पण की भावना है। प्रसाद का तात्पर्य भक्त पर भगवान की अनुकम्पा और कृपा है। दीनवत्सल और दयालु भगवान भक्तों द्वारा नामस्मरण मात्र से ही उनका कल्याण करते हैं और उनके विभिन्न कष्टों का अंत कर देते हैं। वैष्णव और शैव धर्म इसी प्रकार की भक्ति भावना से ओतप्रोत थे। भक्ति की यह भावना केवल शैव और वैष्णव धर्मों तक ही सीमित नहीं थी, अपितु नास्तिक और निरीश्वरवादी बौद्ध एवं जैन धर्म भी इस भावना से प्रभावित हुए बिना न रह सके।


मूर्तिपूजा का व्यापक प्रसार


सूत्रयुग की दूसरी विशेषता मूर्तिपूजा का व्यापक रूप से प्रसार था। यह भक्तिवाद के अभ्युदय का स्वाभाविक परिणाम था, क्योंकि इसका पूजा का ढंग भिन्न प्रकार का था। वैदिक धर्म यज्ञप्रधान था, उसमें देवताओं की उपासना यज्ञों द्वारा की जाती थी। किंतु भक्तिवाद में भगवान की पूजा उसकी भूर्ति पर फल- फूल, नैवेद्य, धूप, दीप, पत्र, पुष्प से एवं वाद्य, नृत्य, गीत, बलि आदि द्वारा की जाती थी। इसे श्रीमतभगवद् गीता में पत्र, पुष्प, फल, तोय वाली पूजा कहा गया है। इससे पहले वैदिक युग में वैदिक देवी-देवताओं की कोई मूर्तियाँ नहीं बनायी जाती थीं, यद्यपि कुछ विद्वानों का यह विचार है कि उस समय कर्मकांड के प्रयोजनों के लिये इंद्र, रूद्र, वायु, वरूण आदि देवताओं की मूर्तियाँ बनायी जाती थीं, तथापि अधिकांश विद्वान् वैदिक युग में मूर्तिपूजा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं।

इस विषय में उनका यह भी कहना है कि वैदिक साहित्य में दस्युओं की निंदा करते हुए इसका एक कारण उनका लिंग पूजक होना बताया गया है। अतः उस समय मूर्तिपूजा को घृणा से देखा जाता था। मूर्तिपूजा प्रचलित न होने की पुष्टि इस बात से भी होती है कि ब्राह्मण ग्रंथों में वैदिक यज्ञों के विस्तृत विधि विधान बताये गये हैं, किंतु इनमें मूर्तियों की कोई चर्चा नहीं मिलती है। ऐसा समझा जाता है कि उस समय की वनेचर जातियों में नाना प्रकार के देवी-देवताओं की पूजा करने की जो परिपाटी थी, उसी से बाद में मूर्तिपूजा का विकास हुआ। तीसरी शताब्दी ई. पूर्व के एक बौद्ध ग्रंथ निद्देस में यह बताया गया है कि उस समय न केवल वासुदेव, बलदेव आदि की, अपितु पूर्णभद्र, आदि यक्षों की पूजा की जाती थी और हाथी, घोड़े, गौ, कुत्ता, कौवे की उपासना करने वाले पशुपूजक भी थे। नागों की पूजा भी प्रचलित थी। 


बहुदेववाद


सूत्र युग में परब्रह्म के ज्ञान के अतिरिक्त अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती थी। पाणिनि के अष्टाध्यायी से प्रतीत होता है कि सुत्र युग के आरंभ में वासुदेव नाम के देवता की आराधना प्रमुख थी। वासुदेव का संप्रदाय भी अस्तित्व में था। ऋग्वेद काल के कुछ देवताओं की भी आराधना होती थी, जैसे इंद्र सूर्य, अग्नि, सोम, रुद्र आदि। इसके अतिरिक्त रुद्र, शिव, पार्वती, रुद्राणी, शर्वाणी, भवानी आदि की में भी कल्पना की जा चुकी थी जिससे स्पष्ट होता है कि सूत्र युग में बहुदेववाद प्रचलित था। संभव है अनार्यों की कुछ धार्मिक विचारधाराएँ, प्रथाएँ और विधियाँ भी समाज में प्रचलित रही हों, जैसे यक्ष-पूजा, गन्धर्व-पूजा, राक्षस-पूजा, सर्प-पूजा आदि; क्योंकि पाणिनि के कुछ सूत्रों में इनके संदर्भ प्राप्त होते हैं। 


शैव संप्रदाय का प्रादुर्भाव


सूत्र युग में वासुदेव के साथसाथ रुद्र, शिव, पार्वती, रुद्राणी, शर्वाणी, भवानी आदि की भी कल्पना की जा चुकी थी जिससे आभास होता है कि सूत्र युग में शैव संप्रदाय का प्रादुर्भाव हो चुका था। देवी-देवताओं की पूजा हेतु मूर्तियाँ प्रतिष्ठित की गयी थीं। इनके लिए व्यक्तिगत और सार्वजनिक देवालय थे।


यज्ञ-कर्म


पाणिनि के सूत्र से इसका आभास होता है कि देवी-देवताओं की मूर्ति-पूजा के अतिरिक्त यज्ञ, बलि तथा अंय धार्मिक क्रियाएँ, विधियाँ आदि भी प्रचलित थीं। यज्ञमानों द्वारा विविध प्रकार के यज्ञ किये जाते थे।

इनसे शुभ परिणामों की अपेक्षा की जाती थी। लोगो में शुभ और अशुभ, पाप और पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष की कल्पना थी।


कर्मफल का सिद्धांत


सूत्र युग में कर्मफल का सिद्धांत सर्वमान्य था। अतः इस युग में मान्यता थी कि प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार उसे फल की प्राप्ति होती है। इसीलिए निवृत्ति मार्ग भी समाज में प्रचलित था। संसार त्याग कर लोग आत्मचिंतन एवं परब्रह्म की प्राप्ति के लिए तप करते थे। वान्प्रस्थ और संन्यास आश्रमों बड़ा महत्व था। तपस्वी और भिक्षु लोग भी होते थे। कुछ भिक्षु दंड भी धारण करते थे। विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा-उपासना से ऐसा प्रतीत होता है कि ज्ञान और तप मार्ग के साथ-साथ शक्ति-मार्ग भी प्रचलित था। वासुदेव संप्रदाय और अर्जुन संप्रदाय इसके द्योतक हैं। अर्जुन संप्रदाय में वे लोग थे जो वासुदेव के मित्र अर्जुन की आराधना और पूजा करते थे।


 प्रतिमाओं में यूनानी कला का प्रभाव


सूत्रयुग में न केवल हिंदू धर्म में अपितु बौद्ध धर्म में भी मूर्ति पूजा का श्रीगणेश हुआ। आरंभ में बुद्ध की कोई मूर्ति नहीं बनायी जाती थी। इस युग में सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्तियाँ बनाने की पद्धति का श्रीगणेश करने का श्रेय गंधार प्रदेश के यूनानी कलाकारों को दिया जाता था और यह माना जाता था कि भारतीयों ने मूर्तियाँ बनाने की कला यूनानियों से सीखी, किंतु अब यह माना जाता है कि बुद्ध की मूर्तियाँ बनाने की पद्धति का गंधार तथा मथुरा में सर्वथा स्वतंत्ररीति से एक साथ विकास हुआ। 


वैदिक धर्म का नया रूप


सूत्रयुग की अंतिम विशेषता वैदिक धर्म को एक नया रूप दिया जाना था। इस युग में यद्यपि वैदिक युग की पुनः स्थापना का प्रयत्न हुआ किंतु इस युग का सुधार आंदोलन बौद्ध धर्म की प्रमुख प्रवृत्तियों को अपनाये हुए था। बौद्ध धर्म यदि जनता के लिये था तो वैदिक धर्म का नया रूप उससे भी बढ़कर जनता की वस्तु बना।