सूत्रयुगीन समाज - Sutra-age society
सूत्रयुगीन समाज - Sutra-age society
परिवार
परिवार सामाजिक जीवन की महत्वपूर्ण इकाई माना जाता था। पारिवारिक जीवन सामाजिक संगठन का मूल आधार था संयुक्त परिवार प्रथा थी और परिवार पितृसत्तात्मक होते थे। सभी गृहस्वामी या बयोवृद्ध व्यक्ति की आज्ञा का पालन करते थे। इस युग में परिवार की विशेषता यह थी कि कन्याओं का जन्म और उनका बाहुल्य कष्टदायक माना जाता था। पुत्री का महत्व पुत्र की अपेक्षा कम था और पुत्र- जन्म की अधिक कामना की जाती थी। फलतः पुरुष का स्थान स्त्री से ऊँचा था।
वर्ण व्यवस्था
सूत्र काल में वर्ण-व्यवस्था पूर्ण रूप से संगठित कर दी गयी थी। प्रत्येक वर्ण के लोगों के कर्तव्यों और अधिकारों को निर्धारित कर दिया गया था
और प्रत्येक मनुष्य से ऐसी आशा की जाती थी कि वह नियमों और कर्तव्यों का पालन करेगा। समाज में चारों वर्णों में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और प्रभुत्व मान लिया गया था। ब्राह्मणों की विद्वता और पवित्र चरित्र के कारण सूत्रकारों ने उन्हें समाज में सर्वश्रेष्ठ, अदण्ड्य, अवहिष्कार्य तथा अवध्य बताया और उन्हें राज्य की ओर से कर मुक्त कर दिया गया। ब्राह्मण ही राजपुरोहित होते थे। गौतम के सूत्र ग्रंथों में ब्राह्मणों के तीन प्रमुख कार्य माने गये थे अध्यापन, याजन ( यज्ञादिकर्म) और प्रतिग्रह। परंतु अधिकांश ब्राह्मण अपनी अल्प शिक्षा के कारण ये सभी धार्मिक कार्य नहीं कर सकते थे। इसलिए सूत्रकारों ने उन्हें अंय वर्णों के कार्य करने की छूट दे दी थी। गौतम और बौधायन के मतानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के कार्य भी कर सकते थे। ब्राह्मण व्यापारी भी होते थे। गौतम का कथन है कि जीविका के अंय साधन उपलब्ध न होने पर आपत्तिकाल में ब्राह्मण शूद्र कर्म भी करते थे। बौधायन धर्म-सूत्र से प्रतीत होता है कि ब्राह्मण कृषक, गड़रिये, नौकर तथा नट के काम भी करते थे।
ब्राह्मणों के बाद समाज में क्षत्रियों का प्रभाव और प्रभुत्व था। क्षत्रियों पर ब्राह्मणों की प्रभुता आरोपित की गयी थी। क्षत्रियों का मुख्य कार्य लोगों की रक्षा करना, युद्ध करना और प्रशासन के कार्य करना था । यदि समाज की नैतिक, बौद्धिक और धार्मिक प्रगति का भार ब्राह्मणों पर था, तो भौतिक सुरक्षा और प्रगति का भार क्षत्रियों पर था। परंतु आपत्ति काल में क्षत्रियों को भी वेदों का अध्ययन-अध्यापन करने व यज्ञ करने का अधिकार था। आवश्यकता होने पर क्षत्रिय वैश्य के काम भी करते थे। क्षत्रिय के पश्चात् वैश्य वर्ण के लोग थे। वैश्यों का प्रधान कार्य कृषि, पशु-पालन और वाणिज्य-व्यवसाय था, परंतु आपत्ति काल में वैश्य वेदों का पठन-पाठन यज्ञ आदि कार्य करते थे।
चौथा, वर्ण शूद्रों का था। शूद्र वर्ण में अनार्य लोग एवं आर्यों की वर्णसंकर जातियाँ थीं। अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के परिणामस्वरूप जो संतान होती थी, वह वर्णसंकर कहलायी सूत्र-ग्रंथों में शूद्र वर्ण के अंतर्गत अनार्य लोग और अम्बष्ठ, आयोगव, चांडाल, निषाद, मागध, रथकार, वैदेहक, सूत, वेण, पौल्क्स आदि जातियाँ थीं। समाज में शूद्र नितांत अधिकारहीन और सम्मानरहित अपवित्र लोग थे। समाज में उनका स्थान निम्नतम था और उनका मुख्य कार्य अंय वर्ण के लोगों की सेवा था। गौतम ने अपने सूत्र ग्रंथ में लिखा है कि शूद्रों को अपने से ऊँचे वर्ण के लोगों के वस्त्रों, आसनों, जूतों, चटाइयों, जूठे भोजन आदि का उपयोग करना चाहिए। वे धार्मिक और बौद्धिक अधिकारों और कार्यों से भी वंचित कर दिये गये थे। वे वेदों के पठन-पाठन और यज्ञ नहीं कर सकते थे।
गौतम के मतानुसार यदि कोई शूद्र वैदिक मंत्रों का उच्चारण करे, तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए, यदि वह उन्हें कंठस्थ करे तो उसकी देह के दो भाग कर देने चाहिए और यदि वह भूल कर या जानबूझ कर भी वेद के मन्त्र सुने तो उसके कानों में सीसा अथवा लाख गला कर भर दी जाय। दंड विधान में भी शूद्रों के साथ इस प्रकार का कठोरता का व्यवहार किया जाता था। उच्च वर्ण के अपराधियों की अपेक्षा शूद्रां े को समान अपराधों के लिए अधिक कठोर दंड दिया जाता था। इस प्रकार शूद्रों से घृणा की जाती थी, समाज में उनका निम्नतम स्थान था।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों की शुद्धता पर अधिक बल दिया गया था।
द्विजों (ब्राह्मणों, क्षत्रिय व वैश्य लोगों) को शूद्रों के हाथ से भोजन ग्रहण करना और उनसे विवाह संबंध करना निषिद्ध था। उच्छिष्ट अथवा अपवित्र भोजन और अछूत वर्ग का स्पर्श वर्जित होता था। इन विषयों के लिए सूत्रों के विधान कड़े और स्पष्ट हो गये थे।
आश्रम व्यवस्था
आश्रम व्यवस्था को सूत्र ग्रंथों में सामाजिक जीवन में कार्यान्वित किया गया था। समस्त जीवन को चार भागों में विभाजित किया गया था और प्रत्येक भाग को आश्रम माना गया था। मानव जीवन की औसत आयु लगभग सौ वर्ष मानी गयी थी और प्रत्येक आश्रम की अवधि पच्चीस वर्षी इस प्रकार ब्रह्मचर्य आश्रम 25 वर्ष तक, गृहस्थ आश्रम 25 से 50 वर्ष तक, वानप्रस्थ आश्रम 50 से 75 वर्ष तक और सन्यास आश्रम 75 से 100 वर्ष तक माना गया था।
पर विभिन्न सूत्र ग्रंथकारों ने आश्रमों की अवधि में पाँच-दस वर्ष का अंतर कर दिया हैं। जैसे बौधायन ने सन्यास आश्रम को 70 वर्ष की आयु से माना है। आश्वलायन के मतानुसार ब्राह्मण के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम की अवधि 20 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 23 वर्ष और वैश्य के लिए 24 वर्ष की हो जाती है। यह समस्त आश्रम व्यवस्था उपनयन धारण करने वाले द्विज लोग-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही अपना सकते थे। शूद्रों के लिए केवल गृहस्थ आश्रम की ही योजना थी।
ब्रह्मचार्य आश्रम
उपनयन संस्कार के पश्चात् बालक ब्रह्मचर्याश्रमप्रारंभ करता था। आश्वलायन ने अपने गृह-सूत्र में कन्याओं के लिए उपनयन माना है। कन्याओं को भी, उपनयन संस्कार होने के पश्चात् वेदों का पठन- पाठन तथा अय प्रकार की शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती थी
और ब्रह्मचर्य से रहना पड़ता था। ब्रह्मचर्या आश्रम की अवधि में व्यक्ति गुरु गृह या गुरु के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करता था। उसके भोजन, वस्त्र तथा अंय व्यय का भार समाज में गृहस्थियों पर था। यह नियमित रूप से भिक्षार्जन करता था। उसके जीवन और कार्यों के लिए जैसे शयन, शय्या, वस्त्र, स्नान, आहार, आचार, भिक्षार्जन, विद्याध्ययन, गुरु सेवा आदि के लिए नियम और विधान थे।
गृहस्थ आश्रम
अपना अध्ययन समाप्त करके गुरु को दक्षिणा दे, उसका आशीर्वाद लेकर युवक विवाह कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था। गृहस्थाश्रम समस्त आश्रमों में श्रेष्ठ और प्रमुख माना गया था।
शेष तीनों आश्रमों का भार गृहस्थ जीवन पर था। गृहस्थी ही ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी के पालन-पोषण, वस्त्र, भोजन आदि की व्यवस्था करता था। ऐसी कल्पना की गयी थी कि ऋषि ऋण, देव- व ऋण और पित्- ऋण से मुक्त होने के लिए गृहस्थ-जीवन अनिवार्य है। ऋषि ऋण से मुक्त होने के लिए धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, स्वाध्याय आवश्यक था, देव ऋण से मुक्त होने के लिए पाँच प्रकार के यज्ञ, हवन, अनुष्ठान तथा अंय धार्मिक कार्य करना एवं पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए, संतानोत्पत्ति करनी पड़ती थी। ऐसी कल्पना की गयी थी कि गृहस्थ जीवन के नियमों, उपनियमो, विधियों आदि का नियमित रूप से पालन करने पर ही व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है। सूत्रकारों ने गृह सूत्रों में गृहस्थजीवन के सभी कर्तव्यों का विशद रूप में उल्लेख किया है। अतिथि सत्कार और सेवा गृहस्थ जीवन का एक प्रमुख कर्तव्य माना गया था। सारे गृहस्थ जीवन का आधार विविध कर्तव्यों का पालन था।
वानप्रस्थाश्रम
गृहस्थाश्रम के पश्चात् वानप्रस्थाश्रम होता था। इस आश्रम काल में गृह को त्याग कर, सांसारिक जीवन को तिलांजलि देकर वन में वृक्षादि के नीचे रहना पड़ता था, वर्षा ऋतु में एक ही स्थान पर विश्राम करना पड़ता था, कन्दमूल फल तथा भिक्षा में प्राप्त अन्न से शरीर को बनाये रखना पड़ता था, शारीरिक तपस्या के समय एक ग्राम में एक रात से अधिक नहीं ठहरना पड़ता था आदि इस प्रकार वानप्रस्थाश्रम कठिन और साधनामय जीवन होता था।
संन्याश्रम
वानप्रस्थाश्रम के पश्चात् संन्यास आश्रम था। संन्यास आश्रम में जीवन बड़ा कठिन और विरक्तिपूर्ण होता था। संन्यासी को कम से कम तथा जीर्ण वस्त्र पहनने पड़ते थे, कभी-कभी काषाय वस्त्र या चमड़े के वस्त्र धारण करने पड़ते थे
और हाथ में दंड रखना पड़ता था। भिक्षा प्राप्त करके कम से कम भोजन करना पड़ता था और भिक्षा के निमित्त ही गाँव या नगर में एक ही बार जाने की आज्ञा थी, माया- मोह के बंधन में मुक्त होना पड़ता था। उसे सदाचारी, सत्यनिष्ठ, अल्पाहारी, अहिंसाव्रती, क्रोध व द्वेष- रहित, उदार और क्षमाशील होना पड़ता था।
संस्कार
संपूर्ण गृहस्थाश्रम को संस्कारों से बाँधा गया था। सूत्रकारों ने गृह सूत्रों में इन संस्कारो का विवेचन किया है। संस्कार वे सामाजिक और धार्मिक क्रिया-विधियाँ होती थी, जिनसे मनुष्य के शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक, चारित्रिक एवं सांस्कृतिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता था। व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास के लिए संस्कारों का विशेष महत्व था।
ये संस्कार स्त्री और पुरुष दोनों के लिए होते थे। प्रत्येक संस्कार के अपने-अपने मन्त्र और कर्मकांड होते थे। ये संस्कार जन्म से मृत्युपर्यन्त होते थे।
गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार, सीमन्तोनयन, जन्म या जातकर्म, नामकरण निष्क्रमण (शिशु को घर से बाहर लाने का संस्कार), अन्नप्राशन ( शिशु को अन्न खिलाना), चैल या चूड़ा कर्म (शिशु के केश काटना), उपनयन, समावर्तन संस्कार (विद्याध्ययन के बाद गुरु-गृह से लौटना), विवाह संस्कार, पाँच महायज्ञ करना (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और भूतयज्ञ), सात पाकयज्ञ, सात हविर्यस और सात सोमयज्ञ करना अन्त्येष्टि संस्कार आदि। उपर्युक्त विभिन्न यज्ञ करने का उद्देश्य था मनुष्य जीवन को पवित्र बनाना, सद्कार्य करना, अपने देवताओं, पूर्वजों, परिजनों, स्वजनों, अतिथियों आदि के प्रति अपनी कृतज्ञता, श्रद्धा-भक्ति प्रदर्शित करना एवं अपने विविध कर्तव्यों का पालन करना था।
आहार और वेशभूषा
सूत्र युग में चावल, जौ, गेहूँ, दूध, दही, मक्खन तथा उनसे बनायी गयी वस्तुएँ, तिलहन, साग- सब्जी आदि प्रमुख खाद्य पदार्थ थे। माँस एवं सुरा का स्वतंत्रतापूर्वक उपयोग होता था, परंतु सुरापन निन्दनीय माना जाता था। मधु तथा क्षार लवण को भी प्रयोग में लाया जाता था। ब्रह्मचारी तथा विद्यार्थी के लिए माँस व मदिरा वर्जित थे।
वेश-भ -भूषा साधारण होती थी। वेश-भूषा के दो प्रमुख वस्त्र थे प्रथम अंतरीय जो कमर के नीचे पहना जाता था और द्वितीय उत्तरीय जो कमर से ऊपर पहना जाता था। कोई विशेष सामाजिक व धार्मिक अवसर तथा संस्कार संपन्न होने के अवसर पर पगड़ी पहनी जाती थी। विद्यार्थीगण मृगचर्म अथवा अजाचर्म के वस्त्र पहनते थे।
ऊनी, सूती, रेशमी वस्त्रों का उपयोग होता था। ऊनी वस्त्र और कम्बल अधिक पवित्र माने जाते थे और इनको पिण्डदान में देते थे। यात्रा के समय जूते, छाते तथा डण्डे रखे जाते थे। लोगों में श्रंगार प्रसाधन के प्रति रुचि थी। नेत्रों में अंजन या काजल लगाया जाता था और सौंदर्य वृद्धि के लिए विविध आभूषण पहने जाते थे।
स्वच्छता
इस युग की यह विशेषता थी कि स्वच्छता पर अधिक बल दिया जाता था। लगभग सौ वर्ष की औसत आयु होने का अनुमान था। अतः स्वास्थ्य के नियमों, रोगों के निवारण के साधनों और स्वच्छता के विधानों को अधिक माना जाता था।
जीवन को संयमी बना दिया गया था। दैनिक जीवन में स्नान, स्वच्छता, पवित्रता आदि का विशेष महत्व था। गृह और उसके पाश्र्ववर्ती भागों को नितांत स्वच्छ रखा जाता था। फर्श को गोबर से लीपकर गन्दगी दूर की जाती थी। शौच और मल-मूत्र के लिए निवासगृह से दूर गाँव या नगर के बाहर जाना पड़ता था। कूड़े-कचरे फेंकने के लिए स्थान निद्रिष्ट थे। देवालय, अतिथिगृह, गौशालाएँ आदि स्थान भी निश्चित थे। अछूत और निम्नतम वर्ग का स्पर्श अपवित्र माना जाता था। जूठा, गन्दा और अपवित्र भोजन वर्जित था। संक्रामक रोगों के निवारक और रोकथाम तथा स्वास्थ्य व स्वच्छता के लिए ऐसे नियम आवश्यक थे।
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