संस्कृति के प्रकार - types of culture

संस्कृति के प्रकार - types of culture


भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति


संस्कृति के सामान्यतः दो प्रकार हैं- (1) भौतिक एवं (2) अभौतिका (1) भौतिक संस्कृति


वे वस्तुएँ जिन्हें हम देख सकते हैं, छू सकते हैं एवं उठाकर संग्रहालय में रख सकते हैं भौतिक संस्कृति में सम्मिलित की जाती हैं।


भौतिक संस्कृति के उदाहरण


फर्नीचर, विद्युत सामान, मशीनें, खेल-कूद के सामान, चाय, मिठाइयाँ,

भोजन, अस्त्र-शस्त्र, बर्तन, मकान, पुस्तकें आदि विभिन्न भौतिक वस्तुएँ हैं जिनका हम प्रयोग करते हैं वे भौतिक संस्कृति के अंतर्गत आती हैं।


(2) अभौतिक संस्कृति


वे तत्व हम देख नहीं सकते पर जिनका अनुभव कर सकते हैं, जिन्हें हम छू नहीं सकते पर जिनका पालन कर सकते हैं, जिन्हें उठाकर संग्रहालय में नहीं रखा जा सकता वरन् जिन्हें पुस्तकों में लिखा जा सकता है ऐसे तत्व अभौतिक संस्कृति में सम्मिलित किये जाते हैं। अभौतिक संस्कृति के उदाहरण


कला, धर्म, विश्वास, विचार, कविता, लेख, रीति-रिवाज, कानून, प्रथाएँ, जनरीतियाँ, नैतिकता/ अनैतिकता, पाप पुण्य आदि अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत आती है।


कम्प्यूटर की भाषा में हार्डवेयर भौतिक संस्कृति का और सॉफ्टवेयर अभौतिक संस्कृति का उदाहरण माना जा सकता है।


भौतिक व अभौतिक संस्कृति में अंतर


भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं-



1. भौतिक संस्कृति के निर्माण में मानवीय मस्तिष्क एवं हाथ दोनों के संयुक्त श्रम का योगदान होता


है

जबकि अभौतिक संस्कृति में मानव मस्तिष्क ही प्रमुख रहता है। 2. भौतिक संस्कृति का स्वरूप मूर्त है जबकि अभौतिक संस्कृति का स्वरूप अमूर्त है।


3. भौतिक संस्कृति के पदार्थों को निश्चित ईकाइयों (नाप, तोल या आकार की) में मापा जा सकता


है, अभौतिक संस्कृति चूँकि आकारविहीन होती है अतः उसे निश्चित ईकाइयों में मापा नहीं जा


सकता।


4. भौतिक संस्कृति को समझने का प्रयोग सरल होता है।

अभौतिक संस्कृति चूँक अपेक्षाकृत अधिक जटिल होती है। अतः उसे समझना व प्रयोग में लाना कठिन होता है। टेलिफोन की कार्य-प्रणाली समझना व उसका प्रयोग करना आसान है, परंतु किसी धर्म के दर्शन को समझना व उसे अपनाना इतना आसान नहीं होता।


5. भौतिक संस्कृति की श्रेष्ठता व उपयोगिता को सरलता से प्रकट किया जा सकता है, परंतु अभौतिक संस्कृति की श्रेष्ठता को प्रकट करना आसान नहीं है। हम यह तो स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त कर सकते हैं कि एक रेलगाड़ी गति की दृष्टि से बेलगाड़ी से अधिक श्रेष्ठ है,

परंतु हम दो धर्मों की तुलना करके यह नहीं कह सकते कि दोनों में से कौन सा धर्म श्रेष्ठ है व कौन से धार्मिक विचार अधिक उपयोगी हैं, क्योंकि प्रत्येक का धर्म प्रत्येक की दृष्टि में श्रेष्ठ ही होता है।


6. भौतिक संस्कृति का विकास अपेक्षाकृत तीव्र गति से होता है, अभौतिक संस्कृति इतनी तीव्र गति से विकसित नहीं होती। भौतिक संस्कृति में गुणात्मक व गणनात्मक दोनों ही दृष्टि से तीव्र गति से विकास होता है। अभौतिक संस्कृति में केवल गणनात्मक विकास होता है और वह भी बहुत ही धीमी गति से होता है।


7. भौतिक संस्कृति में परिवर्तन की गति भी तीव्र होती है। अभौतिक संस्कृति में परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से होता है। भौतिक दृष्टि से भारत वासियों के रहन-सहन, पहनावे आदि में तीव्र गति से परिवर्तन हुआ व हो रहा है, परंतु अस्पृश्यता संबंधी हमारे विचारों में उतनी तीव्र गति से परिवर्तन नहीं हो पाया है।


8. भौतिक संस्कृति का प्रसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर शीघ्र हो जाता है। अभौतिक संस्कृति का प्रसार इतनी जल्दी नहीं होता।


9. भौतिक संस्कृति का प्रसार जब होता है तो उसके तत्वों को बिना किसी परिवर्तन के अंय समाजों में भी अपनाया जा सकता है।

इंग्लैंड में बने रेलवे एंजिन का प्रयोग उसी रूप में हम भारत में करते हैं, परंतु ईसाई धर्म का भारत में जब प्रसार हुआ तो भारतवासियों ने उसे ज्यों का त्यों ही नहीं अपनाया वरन् अपनी आवश्यकता व परिस्थितियों के अनुरूप उसमें कुछ परिवर्तन करके अपनाया। यहाँ तात्पर्य यह है कि अभौतिक संस्कृति प्रसारित होने के पश्चात सामान्यतः थोड़े- बहुत परिवर्तन के साथ अपनाई जाती है।


10. भौतिक संस्कृति की वृद्धि होने पर व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिलता है व समाज में अनौपचारिकताओं का प्रभुत्व हो जाता है।

अभौतिक संस्कृति की वृद्धि सामूहिकता के विकास में सहायक होती है व औपचारिकताओं को प्रश्रय देती है।


स्मरण रहे कि भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति में अंतर मात्र सुविधा के दृष्टिकोण से ही किया जाता है। वास्तव में तो दोनों ही तत्व संस्कृति के अभेद्य अंग ही हैं।



जब लिखित भाषा, विज्ञान, दर्शन, विशेषीकृत श्रम विभाजन, जटिल तकनीक एवं राजनैतिक प्रणाली सम्मिलित हो जाती है तो वह सभ्यता बन जाती है।