उपनिषद - Upanishad
उपनिषद - Upanishad
ब्राह्मण ग्रंथों के भाग को ही उपनिषद कहते हैं। बाह्य जगत के कोलाहल से दूर बहुत से आचार्य एकांत में जंगल जाकर चिंतन करने लगे। सृष्टि के क्रियाकल्पों पर वे चिंतन करनेलगे। विचार के उपरांत वे जिन निष्कर्षों पर पहुँचते थे, उन्हें अपने शिष्यों को निकट बैठाकर सुनाते थे। इस तरह तैयार हुई रचना को उपनिषद कहा जाता है। उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है 'निकट बैठना। अतः इसके वास्तविक अर्थ हैं कि जिज्ञासु शिष्य अपने गुरु के पास बैठता है और विचार-विनिमय करता है। मुख्य रूप से ब्रह्म और जीव के संबंध पर विचार किया जाता था। यह ज्ञान केवल सुयोग्य पात्रों को ही दिया जाता था।
800 ई. पू. से 500 ई. पू. के मध्य विभिन्न ऋषियों ने 108 उपनिषद लिखे थे। उपनिषदों में अनेक विद्वानों के मत हैं, जो दर्शन के जानकार थे। ब्रह्म तथा आत्मा इन उपनिषदों के मूल तत्व हैं। उपनिषदों में पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार किया गया है। ऐतरेय उपनिषद ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण का एक भाग है। ऋग्वेद के दूसरे ब्राह्मण ग्रंथ कौषीतकि ब्राह्मण के अंत में भी आरण्यक भाग है, जिसे कोषीतक आरण्यक या कौषीतकि उपनिषद कहते हैं। यजुर्वेद का अंतिम अध्याय ईशोपनिषद के रूप में है।
शुक्ल यजुर्वेद के ब्राह्मण-ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण का अंतिम भाग भी आरण्यक रूप से है, जिसे बृहदारण्यकोपनिषद् कहते हैं। कृष्ण यजुर्वेद के ब्राह्मण ग्रंथों के अंतर्गत कठ उपनिषद, श्वेताष्वतरोपनिषद, तैत्तिरीय उपनिषद और मैत्रायणीय (Maitraiyaniya) उपनिषद हैं। सामवेद के ब्राह्मण ग्रंथों के साथ संबंध रखने वाली उपनिषदें केन (Kena) और छांदोग्य ( Chandogya) हैं। अथर्ववेद के साथ मुण्डक उपनिषद और माण्डूक्य उपनिषद का संबंध है।
उपनिषदों में कोई एक ही दार्शनिक धारा नहीं है। ब्रह्म तथा आत्मा की दो कल्पनाओं का उपनिषदों में समावेश किया गया हैं।
इनमें कुछ ज्ञानपूर्ण कथाओं एवं वार्तालापों का संकलन भी हैं। एक स्थान पर ईश्वर की एकता के सिद्धांत की पुष्टि की गई है। आत्म मनन और आत्म चिंतन से आत्मज्ञान की प्राप्ति हो सकती है, इस पर प्रकाश डाला गया है। उपनिषदों में आत्मा के अस्तित्व के अतिरिक्त कर्म एवं फल पर भी प्रकाश डाला गया है। इस ग्रंथ के अनुसार अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे कर्म का फल बुरा होता है। इसके अनुसार मृत्यु के पश्चात् आत्मा उसके शरीर को छोड़कर किसी और के शरीर में प्रवेश कर जाती है। उपनिषद ग्रंथ में बार-बार मरने और जन्म के बंधन से मुक्ति पाने के सिद्धांतों को भी बताया गया है। मोक्ष मिलने का अर्थ है — ईश्वर में लीन हो जाना एवं पुनर्जन्म से छुटकारा पाना । इसकी चर्चा आरण्यक में भी मिलती है।
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