वेद - Veda
वेद - Veda
वेदों में ऋग्वेद सबसे अधिक प्राचीन है। ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना और उनके संकलन के बीच काफी लंबा अंतराल पड़ गया होगा। अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को सुव्यवस्थित संरक्षित और विशुद्ध रखने के लिए ही आर्यों ने ऋचाओं का संकलन किया। वेद के संहिता नाम से भी यही प्रकट होता है। इस प्रकार ऋग्वेद सर्वप्रथम संकलन है। इसमें कुल मिलाकर 1017 सूक्त हैं। 'सूक्त' का अर्थ होता है 'अच्छी उक्ति'। ऋग्वेद के समस्त सूक्त 10 मंडलों में विभक्त हैं। वेद के प्रत्येक सूक्त व ऋचा (मंत्र) के साथ उसके 'ऋषि' और 'देवता' का नाम दिया गया है।
ऋषि का अर्थ है मंत्रद्रष्टा या मंत्र का दर्शन करने वाला। जो लोग वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते हैं, उनके अनुसार वेदों का निर्माण तो ईश्वर द्वारा हुआ था, पर इस वैदिक ज्ञान को अभिव्यक्त करने वाले ये ऋषि ही थे, पर आधुनिक विद्वान इन वैदिक ऋषियों को मंत्रों के निर्माता समझते हैं। वैदिक देवता का अभिप्राय उस देवता से है, जिसकी उस मंत्र में स्तुति की गई है, अथवा जिसके संबंध में मंत्र में प्रतिपादन किया गया है।
ऋग्वेद के ऋषियों में सर्वप्रथम गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज और वशिष्ठ हैं। इन छह ऋषियों और इनके वंशजों ने ऋग्वेद के दूसरे, तीसरे,
चौथे, पाँचवे, छठे और सातवें मंडलों का दर्शन या निर्माण किया था। आठवें मंडल के ऋषि कण्व और आंगिरस वंश के हैं। प्रथम मंडल के पचास सूक्त भी कण्व वंश के ऋषियों द्वारा निर्मित हुए। अन्य मंडलों और प्रथम मंडल के अन्य सूक्तों का निर्माण अन्य विविध ऋषियों द्वारा हुआ, जिन सबके नाम इन सूक्तों के साथ मिलते हैं। इन ऋषियों में वैवस्वत, मनु, शिबि और औशीनर, प्रतर्दन, मधुछंदा और देवापि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ऋग्वेद के मंत्र रचयिता ऋषियों में में कुछ स्त्रियों के नाम भी हैं। इन स्त्रियों में लोपामुद्रा, घोषा, शाची, पौलोमी और काक्षावृती आदि प्रमुख हैं।
सामवेद में कुल 1810 मंत्र हैं। इसके दो भाग हैं पूर्वार्चिक और उत्तराचिका इसमें 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सामग्री ऋग्वेद संहिता से ली गई है।
सोमयज्ञ के समय उद्गाता ब्राह्मण इन मंत्रों को गाते थे। यदि देखा जाए तो ये 75 मंत्र भी अन्य वैदिक साहित्य में पाए जाते हैं। इन मंत्रों को गाने योग्य बना कर ऋषि गाते थे। इनके अध्ययन से पता चलता है कि आर्य संगीत प्रिय थे।
यजुर्वेद के दो प्रधान रूप इस समय मिलते हैं, शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेदा शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी संहिता भी कहते हैं। जिसकी दो शाखाएँ उपलब्ध हैं— काण्व और माध्यन्दिन ।
कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएँ प्राप्त होती हैं, काठक संहिता, कपिन्थल संहिता, मैत्रायणी संहिता और तैत्तिरीय संहिता। विविध ऋषिवंशों व संप्रदायों में श्रुति द्वारा चले आने के कारण वेद मंत्रों के मूल पाठ में भेद का हो जाना असंभव नहीं था। संभवतः यजुर्वेद की विविध शाखाएँ इसी कारण बनीं। इनमें यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता सबसे महत्वपूर्ण है, बहुत से विद्वान उसे ही असली यजुर्वेद मानते हैं। यह चालीस अध्यायों में विभक्त है। इसमें उन मंत्रों का अलग-अलग संग्रह किया गया है जो विविध याज्ञिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त किए जाते थे। यजुर्वेद का अंतिम अध्याय ईशोपनिषद है, जिसका संबंध आध्यात्मिक चिंतन से है।
अथर्ववेद में कुल मिलाकर 20 काण्ड और 732 सूक्त हैं। सूक्तों के अंतर्गत मंत्रों की संख्या 6000 के लगभग है। बहुत दिनों तक अथर्ववेद को वेद माना ही नहीं गया, लेकिन अब ऐसा नहीं है। यद्यपि ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टि से यह ऋग्वेद से मिलता जुलता है, फिर भी इसका अपना मूल्य अवश्य है। इसमें भूत-प्रेत आदि को वश में करने के अनेक मंत्र दिए गए है। अथर्ववेद की दो शाखाएँ इस समय मिलती हैं, शौनक और पिप्पलाद। इसमें शौनक शाखा अधिक प्रसिद्ध है, उसे ही प्रामाणिक रूप से स्वीकार किया गया है।
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